
विनोद शंकर
‘साहित्य में प्रतिरोध की क्या भाषा होनी चाहिए’, इसे नक्सलबाडी आंदोलन से निकली साहित्य की धारा ने भारत की सभी भाषाओं में बहुत ही मजबूती के साथ स्थापित किया है. सवाल है उस धारा पर चलने की, उसका विस्तार करने की, उससे बहुत कुछ सीखने की. नक्सलबाडी के जितने भी कवि हुए हैं, चाहे वे किसी भी भाषा के हो, शायद ही उन्होंने अपनी कविता में रोया-गिड़गिड़ाया हो, निराश हुआ हो, चाहे जनता पर या खुद उन पर कितना भी जुल्म या अत्याचार क्यूं न हुआ हो.
उनकी कविता पढ़कर हमें कभी बेचारगी महसूस नहीं होती है और न ही दिल में डर पैदा होता है. उनकी कविता पढ़कर तो दिल में सिर्फ लड़ने की और बदला लेने की भावना जागृत होती है. उदासी और निराशा को तो जैसे वे अपनी कविता में आस-पास भी फटकने नहीं देते हैं इसलिए आज भी जनांदोलनों की आवाज़ नक्सलबाडी धारा के कवि ही बने हुए हैं.
आज भी कविता में प्रतिरोध की भाषा नवारूण भट्टचार्या की कविता ‘मौत की घाटी नहीं है मेरा देश’ ही सकती है. ये कविता नक्सली होने के आरोप में कलकता में नौजवानों की हत्या किए जाने के विरोध में लिखी गई है. इसमें नवारूण भट्टचार्या रो सकते थे, गिडगिडा सकते थे, राज्य सत्ता के सामने हाथ जोड़ सकते थे, और नौजवानों को डरा सकते थे कि देखो नक्सली मत बनो नहीं तो तुम्हारा हश्र भी यही होगा, लेकिन उन्होंने ऐसे सोचा भी नहीं. सीधे राज्य सत्ता के आंखों में आंखें डाल कर बात किया. हत्यारों को चैलेंज किया, जिसे पढ़ कर आज भी हमें हौसला मिलता है. सवाल है आज के परिस्थिति में भी वैसी ही कविता लिखने की, न की जुल्म और अत्याचार देख कर हताश और निराश हो जाने की और कविता में प्रतिरोध के नाम पर रोने-धोने की.
अदनान ही नहीं हिन्दी के सभी कवियों की ऐसी कविता का मै विरोध करता हूं, जो आज के परिस्थिति में हताशा और निराशा से भरी कविता लिख रहे हैं, चाहे वो कोई भी हो. जब जनता लड़ रही है, शहादत दे रही है, तब डरने की और निराश हो जाने की क्या बात है ? ट्रेन में जो लोग शहीद हुए हैं, वो वैचारिक संघर्ष करते हुए मारे गए है, पर अदनान ने जिस तरह बेचारगी से भरा हुआ कविता उन पर लिखा है उस पर मेरी आपत्ति है.
पूरी कविता पढ़ लीजिये, प्रतिरोध का एक शब्द भी नहीं है उसमें. उस आरपीएफ जवान से वैचारिक बहस करते हुए उन लोगों ने भी आत्मसमर्पण नहीं किया होगा ? जैसा की अदनान अपनी कविता में कर देते हैं. मुझे मुसलमानों पर तो नहीं पर इस कवि पर जरूर दया आ रही है, जो खुद बहुत डर गया है और फासीवादियों के सामने अपनी कविता में ही सही हाथ जोड़ दिया है, नहीं तो वे हत्यारों को शुक्रिया कहने वाली पंक्ति क्यूं लिखता.
कविता पढ़ कर ऐसा लगता है जैसे कवि कोर्ट में हत्यारों के दवाब में अपना बयान बदल रहा है और अपनी हत्या के लिए खुद को ही दोषी बता रहा है. सच में जो लोग शहीद हुए हैं, अगर उन्हें कोर्ट में अपनी बात रखने का मौका मिलता तो वे भी ऐसे बयान नहीं देते, जैसा अदनान अपनी कविता में उनसे दिलवा रहे हैं, जिसे पढ़कर फासीवादियों के सामने सर झुकाने के सिवा कोई ख्याल ही नहीं आता है.
मजेदार बात ये है कि कुछ लोग मुझे ही घेर रहे हैं कि मैंने अदनान काफिल दरवेश की आलोचना कैसे कर दी ? मुसलमानों पर लिखी उनकी कविता पर सवाल कैसे उठा दिया ? जैसे कि वो आलोचना से परे हो और मुझ पर ही सवाल उठा रहे हैं कि ‘मुझमें कविता की समझ ही नहीं है. मेरे अंदर संवेदना नही है. इस देश में मुसलमानों पर क्या बीत रही है, इस के बारे में मुझे पता नहीं है. जो मुस्लमान होगा वही मुसलमानो का दर्द समझेगा.’
अरे भाई मैं भी आदिवासी हूं और आदिवासियों पर इस देश में मुसलमानों से कम हमला हो रहा है क्या ? जहां तक मुझे पता है इस देश में जितना हमला आदिवासियों पर हो रहा है, उतना तो किसी पर नही हो रहा है पर हम तो राज्य सत्ता के सामने नहीं रो रहे हैं और न ही अपनी कविताओं में फासीवादियों के सामने हाथ जोड़ रहे हैं. क्यूंकि हमें पता है कि हमारे लोग लड़ रहे हैं, एक वर्ग विहीन और जाति विहीन समाज बनाने के लिए रोज ही शहादत दे रहे हैं. हमें उनकी बात पूरी दुनिया तक पहुंचनी है इसलिए हम लिखते हैं. हमें कविता लिखने की ताकत उनसे मिलती है इसलिए हम कभी उदास और निराश नहीं होते हैं. डरने की तो बात ही नहीं है.
सवाल यहां प्रतिरोध की भाषा का है, जिस पर सभी कवियों को विचार करना चाहिए. क्यूंकि अगर वे सच में फासीवाद से लड़ना चाहते हैं, जनता के साथ कंधा से कंधा मिला कर चलना चाहते हैं तो उन्हें नक्सलबाड़ी धारा के साथ-साथ दलित साहित्य के शुरुआती कवियों से बहुत कुछ सीखना होगा और कविता में प्रतिरोध के नाम पर ये रोने-धोने वाली अपनी भाषा छोड़ना होगा, जो दु:ख में डुबे हमारे देश को और दु:ख ही दे रहा है.
अदनान काफिल दरवेश, ये समय भयभीत और निराशा हो जाने का नहीं है और न ही ऐसी कविता लिखने का है, जो जनता में भय और निराशा पैदा करे ! प्रेमचंद ‘कर्मभूमि’ उपन्यास में लिखते हैं कि ‘भय और साहस संक्रामक रोग की तरह होता है. यानी एक व्यक्ति भयभीत हुआ तो उसको देख कर बहुत से लोग भयभीत हो जाते हैं. वही अगर एक व्यक्ति साहसी हुआ तो उसको देख कर बहुत से लोग साहसी हो जाते हैं.’
इसे हम मुसलमानों पर हो रहे हमलों में देख सकते हैं. ऐसे समय में एक लेखक या कवि का क्या कर्तव्य होता है ? अगर वो खुद उत्पीडित जाति, धर्म या समुदाय से हो ? क्या उसे भी डर जाना चाहिए और अपने समाज को और डराने के लिए कविता लिखना चाहिए ?
ऐसे रोने और गिड़गिड़ाने वाली कविताएं लिख कर वह किसके सामने दया की भीख मांग रहा है ? और किसकी सहानभूति हासिल करना चहता है ? क्या इस से उसके लोगों पर हमला बंद हो जायेगा ? क्या उनके अंदर का भय खत्म हो जायेगा ? ऐसी कविता लिखकर दरअसल वे फासीवादियों का ही काम आसान कर रहा होता है. वो तो यही चाहते हैं कि इस देश के मुस्लमान डर जाए और उनके रहमों-करम पर जिएं.
कवि का मतलब होता है उत्पीडित लोगों में साहस भरना. सत्ता के आंखों में आंखें डाल कर बात करना. जनता के दिल से उम्मीद और साहस को कभी न मरने देना. खुद आशावादी होना और अपनी कविता द्वारा जनता को आशावादी बनाना. लेकिन निराशावादी कविता लिख कर ऐसे कवि क्या कहना चाहते हैं ? खासकर अदनान काफिल दरवेश अपनी कविता द्वारा मुसलमानों में भय क्यूं फैला रहे है ? जो पहले से ही डरे हुए हैं, उन्हें और डरा कर वे क्या कहना चाहते हैं ?
मुसलमानों पर लिखी उनकी कविता पढ़कर दिल में सिर्फ बेचारगी का भाव आता है. क्या सच में इस देश के मुस्लमान अब सिर्फ हिन्दुओं और बाकी लोगों के दया पर जी रहे हैं ? क्या उन्होंने सच में फासीवादियों के सामने हार मान लिया है ? अगर हां तो अदनान ऐसे ही निराशावादी कविताएं लिखते रहे और हिन्दी के पाठक उनको पढ़ कर आहे भरता रहे. लेकिन मुझे लगता है ऐसा नहीं.
मुसलमानों ने फ़ासीवादी शक्तियों के सामने पूरे देश में कहीं भी हार नहीं माना है. वे अपनी-अपनी ताकत के अनुसार हर जगह प्रतिरोध कर रहे हैं. जरुरी है उन पर लिखने की और उनके साथ कंधा से कंधा मिला कर फासीवाद से लड़ने की. न की खुद निराश हो जाने की और न उन पर वैसी ही कविता लिखने की. अगर एक कवि की कविता जनता में साहस नहीं भरती, उसे लड़ने की प्रेरणा नहीं देती, कभी हार न मानने वाली जिद पैदा नहीं करती तो उसे लिखना बंद कर देना चाहिए.
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