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आरएसएस के शिक्षा क्षेत्र में सौ साल – शिक्षा का कर्मकांडी अनुकरणवादी मॅाडल

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आरएसएस के शिक्षा क्षेत्र में सौ साल - शिक्षा का कर्मकांडी अनुकरणवादी मॅाडल
आरएसएस के शिक्षा क्षेत्र में सौ साल – शिक्षा का कर्मकांडी अनुकरणवादी मॅाडल
जगदीश्वर चतुर्वेदी

आरएसएस इस साल अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है. इस दौरान सारे देश में जलसों की आंधी चलेगी. संघ के कार्यक्रमों की शुरुआत एक तरह से पीएम के नागपुर स्थित आरएसएस के मुख्यालय में जाकर किए गए उद्बोधन से हो चुकी है. हम यहां सिर्फ सौ साल में संघ ने शिक्षा में क्या किया ? इस पहलू तक ही अपने को सीमित रखेंगे.

संघ का शिक्षा का मॅाडल प्रचलित सभी मॅाडल से अलग है. इसका परंपरागत गुरुकुल मॅाडल, संस्कृत पाठशाला मॅाडल, आधुनिक शिक्षा मॅाडल से कोई संबंध नहीं है. यह तो इन सबसे भिन्न ‘कर्मकांडी अनुकरणवादी शिक्षा मॅाडल’ है. यह बुनियादी तौर पर धार्मिक तत्ववाद के दार्शनिक विचारों पर आधारित है.

कर्मकांडी अनुकरणवादी शिक्षा मॅाडल की विशेषता है विज्ञान का निषेध और कर्मकांड की स्थापना. हर स्तर पर संघ के नेताओं के भाषणों की पुनरावृत्ति या उसकी भाषा और नज़रिए से बोलना. संघ के विचार और सिद्धांतों का हर स्तर पर कठोरता के साथ पालन करना. अपने को हर स्तर पर संघी दर्शाना. पाठ्यक्रम को संघ की विचारधारा के मॅाडल में पिरोकर पेश करना.

इसमें अंधविश्वास और अनुकरण मूलकता ये दो बुनियादी तत्व हैं. जो कहा गया है उसे मानो. सब कुछ ज्ञान-विज्ञान हमारे यहां पहले से उपलब्ध है. इस आधार पर हरेक विषय के बारे में सोचो और इस आधार पर लिखो, पाठ्यक्रम बनाओ, इसी नज़रिए से कक्षा में पढ़ाओ, सेमिनार में भाषण दो, मंच से बोलो. तकनीक का इस सबके लिए जमकर इस्तेमाल करो. विज्ञान और वैज्ञानिक नज़रिए का हर स्तर पर विरोध करो.

इस मॅाडल की रचना प्रक्रिया बड़ी मजेदार है. मसलन्, पहले संघ के नेता के चरणों में जाओ, फिर शाखा में जाओ, उसके बाद विभिन्न पदों पर संघ के अनुसार काम करो और अंत में कर्मकांड में विलीन हो जाओ. इस पद्धति का अनुसरण करते हुए प्रोफेसरों का कर्मकांड में स्वैच्छिक रुपान्तरण चल रहा है.

पहले प्रोफेसर अपना ज्ञान में रुपांतरण करता था, इन दिनों संघ के क़रीब आने के बाद कर्मकांड में रुपान्तरण कर रहा है. जो जितना बड़ा कर्मकांडी उतना ही महान प्रोफेसर ! जिस प्रोफेसर ने जितनी बार संघ के नेताओं के भाषणों का विभिन्न विषयों पर आयोजित सेमीनार-संगोष्ठियों में इस्तेमाल किया, या पुनरावृत्ति की, वह उतना ही महान प्रोफेसर !

संघ के शिक्षा मॅाडल में महान प्रोफेसर का अनुकरणमूलक-कर्मकांडी होना प्राथमिक-अनिवार्य योग्यता है. यह नए किस्म का फंडामेंटलिज्म है जो कर्मकांड और भाषायी अनुकरण के ज़रिए विश्वविद्यालय-कॅालेज कैम्पस में आ गया है. इसके आधार पर छात्रों में भी कर्मकांडी-अनुकरणमूलक भाव पैदा किया जा रहा है.वही छात्र बेहतर माना जाता है जो कर्मकांडी-अनुकरणमूलक हो.

पिछले दिनों यूपी के एक विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष ने दायित्व संभाला. उसकी वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गयी है. वेद मंत्रों के सस्वर पाठ के ज़रिए उन्होंने नए अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाली. इस कार्यक्रम में जो पंडित बुलाए गए वे वेद के असामयिक मंत्रों का अशुद्ध उच्चारण कर रहे थे. उनको वैदिक मंत्रों के स्वरों का अशुद्ध प्रदर्शन करते देखकर आनंद गया.

इससे एक बात साफ़ हुई कि वैदिक मंत्र किस तरह लुंठित-प्रदूषित रुप में इस्तेमाल किए जा रहे हैं. सवाल उठता है जूता पहनकर वेद मंत्रों का उच्चारण करना और सुनना, जूता पहनकर वेद मंत्र पढ़ना कहां पर लिखा है ? क्या किस तरह का हिन्दूतंत्र है !

असामयिक अशुद्ध वेद मंत्रों का उच्चारण वैदिक परंपरा का उल्लंघन है. इस तरह की प्रदूषित हरकतें जब शिक्षितों में नज़र आती हैं तो मन खिन्न होता है. इस तरह के इवेंट विश्वविद्यालय के विभागों में कर्मकांडी फंडामेंटलिस्ट मॅाडल के जीवन्त बिम्ब हैं. ये बिम्ब आने वाले खतरे की सूचना दे रहे हैं.

मैंने निजी तौर पर संस्कृत माध्यम से संपूर्णानंद विश्वविद्यालय से सम्बद्ध माथुर चतुर्वेद संस्कृत महाविद्यालय,मथुरा में प्रथमा से लेकर आचार्य पर्यन्त संस्कृत माध्यम के ज़रिए विभिन्न विषयों की नियमित छात्र के रुप में शिक्षा पाई है. मैंने कभी अपने कॅालेज में हवन-कर्मकांड नहीं देखा. मथुरा में छह संस्कृत कॅालेज थे, किसी में भी हवन-कर्मकांड नहीं होता था.

संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में कभी हवन-कर्मकांड नहीं देखा जबकि देश के महान विद्वान वहां पढ़ाते थे. चारों वेद, संस्कृत व्याकरण, साहित्य, धर्मशास्त्र, हिंदी साहित्य, अंग्रेजी आदि विषय मेरे कॉलेज में नियमित पढ़ाए जाते थे, इन विषयों के योग्य विद्वान प्रोफेसर थे.यहां हिंदी के प्रोफेसर आरएसएस के सबसे धाकड़ नेता थे पर, हवन-कर्मकांड नहीं करते थे और नहीं किसी को कर्मकांड के लिए प्रेरित करते थे, नाम था मथुरानाथ चतुर्वेदी. हिंदी के शानदार शिक्षक थे.

संयोग से मुझे विधिवत ढंग से उपरोक्त सभी विषयों को पढ़ने और उनमें परीक्षा देने का मौका मिला. मेरा स्पेशलाइजेशन सिद्धांत ज्यौतिष था, इस विषय में मेरे हमेशा बेहतरीन नम्बर आए. मैंने कक्षा छह से एमए तक यहीं पढ़ाई की थी. इस दौर के सभी बड़े संस्कृत विद्वानों से पढ़ने, शास्त्रार्थ करने आदि का मौका भी मिला.

यह सब लिखने का अर्थ यह है कि हम यह जान लें संस्कृत की परंपरागत पाठशाला शिक्षा से मैं आया हूं और उसके आंतरिक मर्म को जानता हूं. मैं संस्कृत कॉलेज में पढ़ते हुए ही मार्क्सवाद के क़रीब आया. मार्क्सवादी होने के कारण कभी किसी ने कॉलेज में भेदभाव नहीं किया. यहां तक कि संघ के प्रोफेसर ने भी भेदभाव नहीं किया. बाद में जेएनयू जाकर एमए, एम फ़िल, पीएचडी की लेकिन संस्कृत परंपरा से कभी संबंध नहीं तोड़ा.

इन दिनों जो प्रोफेसर आरएसएस में उछलकूद मचा रहे हैं, या फिर जो आरएसएस के नेता आए दिन ‘भारतीय ज्ञान’ की रक्षा का बिगुल बजाए घूम रहे हैं, इनमें से कोई संस्कृत पाठशाला में भारतीय ज्ञान परंपरा का अध्ययन करने नहीं गया. आज भी संघ के युवाओं में से कोई भी संस्कृत पाठशाला में पढ़ने नहीं जाता, उलटे ये लोग ‘शिक्षा व्यवस्था’ के आधुनिक मॅाडल को ध्वस्त करके ‘कर्मकांडी-अनुकरणवादी मॅाडल’ को ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ की रक्षा और ‘धर्मनिरपेक्षता और पश्चिमी विचारों’ से युवाओं को बचाने की लागू कर रहे हैं.

अब तक आधुनिक ‘शिक्षा व्यवस्था’ का अर्थ है आधुनिक परिवेश, पाठ्यक्रम, प्रोफेसर और शिक्षण पद्धति. गुरुकुल परंपरा को हमने संस्कृत शिक्षा व्यवस्था या यों कहें प्राच्यवादी शिक्षा व्यवस्था मॅाडल में स्थापित किया. इसके लिए संस्कृत विश्वविद्यालयों और उनसे जुड़े कॉलेजों के नैटवर्क की स्थापना, संरक्षण-संवर्द्धन पर पंचवर्षीय योजनाओं और राज्य योजनाओं में ज़ोर दिया गया. इसे ‘प्राच्य शिक्षा व्यवस्था’ कहते हैं.

इस क्रम में ‘आधुनिक शिक्षा व्यवस्था’ और ‘प्राच्य शिक्षा व्यवस्था’ इन दोनों से ही अंधविश्वास और कर्मकांड इन दोनों की विदाई कर दी गयी. यह काम राष्ट्रीय सहमति के आधार पर किया गया. संसद की मंजूरी से किया गया.इस मॅाडल को जो तोड़ेगा वह संविधान और संसद का अपमान करने वाला कहलाएगा.

सामान्य तौर पर संस्कृत पाठशालाओं में पढ़ाने वाले विद्वान अंधविश्वासी-कर्मकांडी नहीं होते थे. संस्कृत पाठशालाओं से लेकर संस्कृत विश्वविद्यालयों तक प्राचीन विषयों की शिक्षा के प्रत्येक विषय के शिक्षण की व्यवस्था की गई. इस क्रम में मूर्ति पूजा, कर्मकांड, यज्ञ आदि के व्यवहारिक रुपों को पाठशालाओं और विश्वविद्यालयों से बाहर कर दिया गया. यह काम पंडितों ने अपने ज्ञान के आधार पर किया, किसी सरकार के आदेश पर उन्होंने यह काम नहीं किया.

पाठशालाओं में धर्मशास्त्र, वेद, व्याकरण आदि विषय पढाए जाते थे लेकिन तंत्र-मंत्र-कर्मकांड की शिक्षा नहीं दी जाती थी. शिक्षा में तंत्र-मंत्र, कर्मकांड, अंधविश्वास आदि की शुरुआत बौद्धधर्म के पतनकाल में महायान-हीनयान के लोगों ने नालंदा विश्वविद्यालय में की थी. इसके प्रतिवाद में शंकराचार्य के नेतृत्व में संस्कृत के विषयों के पठन-पाठन और गुरुकुलों को इनसे मुक्त रखने पर ज़ोर दिया गया.

इसका असर गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय में अंग्रेजों के जमाने में बने पाठ्यक्रम में भी नजर आता है. वहां प्रार्थना के समय वैदिक मंत्रों से यज्ञ होता था. यह क्रिया कुछ मिनटों की थी, बाकी समय ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में स्वतंत्र पाठ्यक्रम था जिसे पढ़कर बड़ी संख्या में क्रांतिकारी, समाज सुधारक, राष्ट्रभक्त युवा तैयार हुए. भगत सिंह आदि युवाओं को इसी पाठ्यक्रम ने निर्मित किया. इस प्रक्रिया में हम कर्मकांड-रुढिवाद और अंधविश्वासों के परिवेश से निकलकर आधुनिक शिक्षा में आए.

इस काम में बंगाल के नवजागरण के पुरोधाओं की केन्द्रीय भूमिका थी. पहली बार आधुनिक शिक्षा के स्कूल-कॅालेजों को बंगाली समुदाय ने खोला, राजा राम मोहन राय इसके अग्रदूत बने. इसे आधुनिक शिक्षा व्यवस्था के नए मॅाडल के नाम से जाना जाता है.

इसके गर्भ से स्वतंत्रता के भावबोध का जन्म हुआ. आधुनिक विज्ञान की शिक्षा का जन्म हुआ. बंगाल में आधुनिक विज्ञान के महान आविष्कार हुए. इसने ही आधुनिक भारत की नींव रखी, जिस पर चलकर आधुनिक संविधान, आधुनिक समाज, और स्वतंत्र-लोकतांत्रिक भारत का जन्म हुआ.

लेकिन आरएसएस इस सबको ध्वस्त करके ‘भारतीय ज्ञान’ और कर्मकांडों की आड़ में एकदम नए क़िस्म के फंडामेंटलिस्ट मॅाडल पर चल निकला है. इस मॅाडल का गुरुकुल परंपरा, प्राच्य शिक्षा परंपरा और आधुनिक शिक्षा परंपरा किसी से कोई लेना देना नहीं है. अब संघ प्रशिक्षित प्रोफेसर शिक्षा में कर्मकांड और धार्मिक फंडामेंटलिज्म लेकर आ रहे हैं.

शिक्षा क्षेत्र में धार्मिक फंडामेंटलिज्म का अर्थ है शिक्षा में कर्मकांड, संगठन विशेष की राजनीतिक भाषा और नजरिए का पाठ्यक्रम, कक्षा लेने की पद्धति, सेमीनार में बोलने की कला, भाषा और अंतर्वस्तु आदि सबमें सिर्फ आरएसएस की भाषा और नजरिए का इस्तेमाल ख़ास विशेषता है.

संघ के अधिकांश प्रोफेसर इस मॅाडल का यांत्रिक भाव से इस्तेमाल कर रहे हैं. इससे आधुनिक शिक्षा का परिवेश खत्म हो रहा है. छात्रों में पढ़ने की रुचि खत्म हो रही है. वे सिर्फ किसी तरह डिग्री लेकर नौकरी पाना चाहते हैं. इसके लिए संघ के विभिन्न संगठनों में शामिल हो रहे हैं. वे संघ के संगठनों के अलावा अन्य कार्यक्रमों में शिरकत नहीं करते.

उन्होंने शिक्षा में विज्ञान, वैज्ञानिक नजरिए और नई खोजों को पोंगा पंथी पौराणिक-मिथकीय विचारों के ज़रिए अपदस्थ कर दिया है. इस मॅाडल का आधार है अमेरिका की शीतयुद्धीय राजनीति, इसके आधार पर देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों-कॉलेज में उदारतावादी विचारों-बुद्धिजीवियों पर हमले संगठित किए जा रहे हैं. वामपंथियों पर हमले किए जा रहे हैं.

‘कर्मकांडी-अनुकरणवादी शिक्षा मॅाडल’ की विशेषता है हर बात या विषय को अतीत में खोजना, हर इवेंट पर पूजन-हवन करना. मूर्ति पूजा पर जोर देना. सिर्फ संघी विचारधारा की भाषा में बोलना. उसी भाषा में संगोष्ठियों में भाषण देना. संघ के नेता के बयानों की हर गोष्ठी में पुनरावृत्ति करना, यह नए किस्म का शास्त्र है जिसका एक वर्ग के ज़रिए अनुकरण किया जा रहा है.

इसमें अतीत पूजा, रुढिवाद, अनुदारवाद, कर्मकांड और अंधविश्वास प्रमुख हैं. इस मॅाडल की त्रासद परिणति है आधुनिक दृष्टि, आधुनिक भावबोध. व्यक्ति की संप्रभुता और लोकतंत्र का अंत और माफिया-गिरोहों के द्वारा नियंत्रित समाज की स्थापना. यह बुनियादी तौर पर संविधान और राष्ट्र-राज्य की संप्रभुता के अस्वीकार का मॅाडल है.

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