
उसने कहा था
मैं तुम्हें एक चेहरा दूंगा
और मैं उसकी उंगलियां पकड़े
चला आया इस मेले में
जहां बिक रहे थे
मुखौटे
उसने कहा था
मैं तुम्हें एक घर दूंगा
और मैं उसकी उंगलियां पकड़े
चला आया इस शहर में
जहां बिक रहे थे
मकान
उसने कहा था
मैं तुम्हें रोटी दूंगा
और उसकी उंगलियां पकड़े
मैं चला आया इन खेतों में
जहां उग रही थी
भूख
सोचता हूं
क्या मिला उसे ये सब कहकर
एक बिना चेहरे, घर, रोटी वाले
इंसान को
कौन सा ग्लानि बोध
रोकता है उसे
इस अंतिम व्यक्ति को
ना कहने से ?
- सुब्रतो चटर्जी
[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]
