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‘विधि आयोग’ की सिफारिशी घोर दमनकारी और गुलामी की ज़िल्लत के प्रतीक देशद्रोह क़ानून को रद्द करो !

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‘विधि आयोग’ की सिफारिशी घोर दमनकारी और गुलामी की ज़िल्लत के प्रतीक देशद्रोह क़ानून को रद्द करो !
‘विधि आयोग’ की सिफारिशी घोर दमनकारी और गुलामी की ज़िल्लत के प्रतीक देशद्रोह क़ानून को रद्द करो !

मोदी सरकार द्वारा नियुक्त 22 वें ‘विधि आयोग’ ने, ‘देशद्रोह कानून’ के नाम से कुख्यात, भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए को और कड़ व ख़तरनाक बनाने की सिफारिश की है. सारा देश स्तब्ध है, क्योंकि अंग्रेज़ों द्वारा अपने ‘गुलामों’ के विद्रोह को कुचलने के मक़सद से, 1870 में लाए गए इस काले क़ानून को, सुप्रीम कोर्ट ने मई 2022 में, औपनिवेशिक गुलामी का प्रतीक बताते हुए, इस काले कानून को हटाने को कहा था. साथ ही ये निर्देश भी ज़ारी किए थे कि जब तक इसे हटाने की प्रक्रिया पूरी नहीं होती, देशद्रोह की धारा 124 ए के तहत कोई एफआईआर दर्ज नहीं होगी. उनके अगले आदेश तक ये आदेश लागू रहेगा. सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी पर खूब तालियां बजीं, अखबारों में लम्बे-लम्बे लेख लिखे गए. मोदी सरकार के दरबारियों ने, इसे भारत के महान ‘जिवंत लोकतंत्र’ का लक्षण बताया और ‘लोकतंत्र की माँ’ होने के लिए ख़ुद की कमर ठोकी. लगा, कि सत्ता के दमन-उत्पीड़न का ये ख़तरनाक औज़ार अब समाप्त हो जाएगा.

दमन के ऐसे औज़ार को, जिसकी मदद से सरकार जिसे चाहे, जब चाहे, जब तक चाहे जेल की काल कोठरी में बंद रख सकती है, इतनी आसानी से, चिकनी-चुपड़ी बातों से ख़त्म हो जाने दे, तो वह फासिस्ट सरकार नहीं हो सकती!! ऊंघता क़ानून मंत्रालय हरक़त में आया और 9 मई को, केंद्र सरकार की ओर से, सुप्रीम कोर्ट में एक शपथ पत्र दाख़िल हुआ. “इस विषय पर ज़ाहिर किए गए सभी विचार, भारत के माननीय प्रधानमंत्री के संज्ञान में हैं और उन्होंने विभिन्न मंचों से, अनेक बार, नागरिक अधिकारों के संरक्षण और मानवाधिकारों के सम्मान में और देश के लोगों की बेशकीमती संवैधानिक आज़ादी पर, अपने विचार, बहुत प्रभावशाली ढंग से रखे हैं.” तब ही लोगों को याद आया कि प्रधानमंत्री तो खुद, औपनिवेशिक क़ानूनों के फ़ालतू बोझ को उतार फेंकने की घोषणा इतनी बार और इतनी चीखती आवाज़ में कर चुके है कि अब झेला नहीं जाता!! लच्छेदार भाषा बोलने और उसे वहीं त्याग कर, अपने असली काम में लग जाने के मामले में, मोदी सरकार का जवाब नहीं!! ‘अच्छे दिन कभी भी आने शुरू हो सकते हैं’, मोदी सरकार ये झांसा, आज भी देने में क़ामयाब हो जाती है. फासिस्टों की फ़ितरत से बे-ख़बर, ‘जन-गण-मन’ को लगा, शायद अछे दिन अचानक शुरू हो गए!!

जिस क़ानून मंत्री ने ये ‘शपथ पत्र’ दाख़िल किया था, वह अच्छी तरह जानता था कि ‘विधि आयोग’ अपने काम में लगा हुआ है!! आयोगों के चेयरमैन और कमेटियों के अध्यक्ष, आजकल किस तरह के लोग चुने जाते हैं, उनकी सिफारिशें कैसी होती हैं; जानने के लिए ‘विचारक’ होना बिलकुल ज़रूरी नहीं!! मुकेश का गाया, ये मधुर गीत याद रखना काफ़ी है; ‘जो तुमको हो पसंद वही बात कहेंगे; तुम दिन को अगर रात कहो रात कहेंगे!’ फ़रवरी 2020 में स्थापित हुए, 22 वें ‘विधि आयोग’ का फ़रवरी 23 में समाप्त होने वाला कार्यकाल, फ़रवरी 24 तक बढ़ा दिया गया है. आयोग के 2 प्रमुख सदस्यों का परिचय जान लेने के बाद, किसी को भी उसकी सिफ़ारिशों पर कोई हैरानी नहीं होगी. अध्यक्ष हैं, कर्णाटक उच्च न्यायलय के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश रितुराज अवस्थी, जो कर्णाटक में ‘हिज़ाब मुद्दे’ पर फैसला सुनाने वाली बेंच के अध्यक्ष थे. दूसरे, केरल उच्च नयायालय के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश, के टी शंकरन हैं जो उनसे भी महान हैं. उन्होंने, 2009 में केरल सरकार और केंद्र की यूपीए सरकार को, केरल में ‘लव ज़ेहाद’ के सभी मामलों की गहराई से जाँच करने का हुक्म ज़ारी किया था. मोदी सरकार उनके इस योगदान को भला कैसे भुला सकती थी!!

‘विधि आयोग’ ने सुझाया क्या है ?

भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए, ‘देशद्रोह’ के अपराध को इस तरह परिभाषित करती है, “कोई भी व्यक्ति, बोलकर, लिखकर, इशारे से अथवा ज़ाहिर तौर-तरीक़ों से या किसी भी अन्य तरीके से, अगर भारत की क़ानून संवत प्रस्थापित सरकार के प्रति घृणा अथवा अवमानना पैदा करता है, अथवा पैदा करने की कोशिश करता है, अथवा दुर्भावना भड़काता है या भड़काने का प्रयास करता है; उसे 3 साल की सज़ा और जुर्माना से, आजीवन कारवास की सज़ा और जुर्माना तक दंडित किया जाएगा.” विधि आयोग ने इसमें 2 बहुत गंभीर बदलाव सुझाए हैं. पहला; “सामाजिक अशांति फ़ैलाने अथवा हिंसा भड़काने की प्रवृत्ति (inclination)” जोड़ दिया गया है. दूसरा न्यूनतम सज़ा को 3 साल से बढ़ाकर 7 साल कर दिया गया है.

विधि आयोग द्वारा प्रस्तावित बदलाव का क्या परिणाम होगा? यह जानने के लिए, पहले उन लोगों का प्रोफाइल जानना ज़रूरी है जिन्हें इस ख़तरनाक दमनकारी क़ानून के शिकंजे में लिया जा चुका है. मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में देशद्रोह क़ानून में कुल 326 मुक़दमे दर्ज़ किए, जिनमें 559 लोग गिरफ्तार हुए. मोदी जी, एक शेखी हर मीटिंग में बघारते हैं; ‘हमने वो कर दिखाया, जो पिछले 70 साल में नहीं हुआ’. सत्ता के दमन, ना-इंसाफी और अपने चहेते धन-पशुओं को देश के सारे संसाधन अर्पित करने का विरोध करने वालों को देशद्रोही बताकर जेल में ठूंसने के मामले में, उनका कथन एकदम सटीक बैठता है. जितने लोगों को, इस काले क़ानून का इस्तेमाल कर, मोदी सरकार ने जेलों में ठूंसा है, उतने, उनके पहले के 70 सालों में नहीं ठूंसे गए!!

अंग्रेज़ औपनिवेशिक लुटेरों द्वारा, गुलामी के घृणित प्रतीक, देशद्रोह क़ानून के तहत गिरफ्तार लोग हैं; बाल गंगाधर तिलक (1897 और 1908), महात्मा गांधी (1920), ग़दर पार्टी के राजा महेंद्र प्रताप सिंह (1922), शहीद-ए-आज़म भगतसिंह (1930), चित्तगोंग हथियार गृह पर हमले के मुक़दमे में बिनय बोस, बादल गुप्ता और दिनेश गुप्ता (1930). 2014 में मिली ‘असली आज़ादी’ के बाद ‘देशद्रोही’ ठहराए गए प्रमुख ‘अभियुक्त’ हैं; कन्हैय्या कुमार, सिद्धार्थ वरदराजन, कनीज़ फ़ातिमा, विनोद दुआ, शर्जील इमाम, डॉ कफील, सिद्दीक क़प्पन और काले नागरिकता कानूनों का विरोध करने वाले, अल्पसंख्यक समुदाय के जाने कितने बेक़सूर, ‘भीमा कोरेगांव’ के नाम पर सालों से जेल में बंद 8 बेक़सूर, राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता. हर व्यक्ति, यहाँ तक कि ख़ुद हुकूमत भी जानती है कि प्रस्तावित बदलाव का मतलब होगा, किसी को भी, जब चाहे जेल में बंद किया जा सके.

गिरफ्तार लोगों में, सज़ा पाने वाले अभियुक्त 1% के आस-पास हैं. इस पहलू को भी, लेकिन, आज के अदालती न्याय की हकीक़त को सामने रखकर देखना होगा. कितने ही बेक़सूर, अब इस क़ानून के तहत सज़ा भी पाएंगे क्योंकि ‘अशांति और चुनी हुई सरकार के प्रति दुर्भावना फ़ैलाने की प्रवृत्ति (inclination)’ किसी व्यक्ति में नहीं है, ये कैसे सिद्ध होगा? ‘पृवृत्ति’ को कैसा भांपा जाएगा, कैसे नापा जाएगा? आज, अदालतों में संघ विचारधारा के लोग इस स्तर तक घुस चुके हैं, घुन, न्यायपालिका समेत, जनवाद के सारे इदारों को इस क़दर खोखला कर चुका है; चंद उदाहरणों से स्पष्ट हो जाएगा. गुजरात उच्च न्यायलय में, न्याय की मूर्ति, समीर दवे ने, एक नाबालिग, बलात्कार पीड़िता गर्भवती बच्ची के गर्भपात की अनुमति के मामले में, फ़ैसला सुनाते हुए कहा कि मनुस्मृति में भी तो इस बात का उल्लेख है कि 17 साल की बच्चियां माँ बन जाया करती थीं!! वकील ने भी इस पर कोई आपति नहीं दर्ज कराई.

इलाहबाद उच्च न्यायलय के जज, बृजराज सिंह को, बलात्कार के एक मामले में, ये जानना सबसे महत्वपूर्ण लगा कि महिला मांगलिक तो नहीं है, उसकी जन्म कुंडली परखी जाए. उन्होंने बाक़ायदा, लखनऊ से एक ज्योतिषी को बुलाने को कहा. वे, दरअसल, उस बलात्कार पीड़िता की शादी, बलात्कारी के साथ कराकर ‘न्याय’ करना चाह रहे थे!! राजस्थान उच्च नायालय के जज महेश चंद शर्मा, कह ही चुके हैं कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित कर दिया जाना चाहिए क्योंकि गाय ऐसा दुर्लभ जीव है, जो श्वास में ऑक्सीजन ही लेता है और ऑक्सीजन ही छोड़ता है!! ये हाल तो उच्च न्यायालयों के ‘न्यायमूर्तियों’ का है, नीचे क्या हाल है, उसपर लिखना तो वक़्त जाया करना है. राजस्थान उच्च न्यायलय में तो मनु की आदमक़द मूर्ति ही विराजमान है!! सच्चाई को बगैर लाग-लपेट लिखा जाए, तो कहना पड़ेगा कि इन जजों ने ऐसे विचित्र और वाह्यात विचार इस लिए रखे कि हुकूमत को अच्छे लगेंगे, उनकी पदोन्नति होगी. क्या ऐसे जज, देशद्रोह के आरोपियों के बारे में हुकूमत की मंशा का सम्मान नहीं करेंगे? किस मामले में, कितने लोगों को सज़ा हुई, किसी क़ानून के न्यायासम्वत होने के लिए, अब तो इसे भी पैमाना नहीं माना जा सकता.

काले क़ानून का काला इतिहास

देशद्रोह क़ानून की आवश्यकता, सत्रहवीं शताब्दी में इंग्लैंड में उस वक़्त पड़ी, जब सामंती शासन व्यवस्था चरमराकर, ढह रही थी. वैसे तो, सामंतवाद में राजा के मुंह से जो निकल जाए, वही क़ानून हुआ करता था, लेकिन चूँकि पूंजीवाद के हाथों उसे अपनी मौत नज़र आने लगी थी, इसलिए क़ानून पास कराने का ढकोसला शुरू हुआ था. “सरकार बहादुर के इरादे हमेशा नेक ही होते हैं, और उन्हीं का वज़ूद रहना चाहिए. उनके विपरीत दी गई कोई भी राय, सरकार बहादुर और महाराजाधिराज की शान में गुस्ताखी है, उसे नष्ट होना होगा”, देशद्रोह क़ानून पास कराते वक़्त, इंग्लैंड के राजा के ‘कानूनविदों’ ने ये उद्गार व्यक्त किए थे!! हमारे देश में, इसे लार्ड मैकाले ने 1837 में तैयार कर लिया था लेकिन किन्हीं कारणों से लागू नहीं हो पाया. ‘अखंड’ भारत के इतिहास में सबसे शर्मनाक शताब्दी है; 1757 से 1857, जब इतने विशाल देश पर, इंग्लैंड की एक अदनी सी कंपनी ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ ने राज किया था. पहली जंग-ए-आज़ादी में उठी क्रांति की ज्वाला ने इस ज़िल्लत को मिटा डाला, भले उसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी. उसके बाद, 1860 में, ‘क़ानून का राज़’ आया, जब भारतीय दंड संहिता (IPC ) वज़ूद में आई. 1870 में, जेम्स स्टीफन द्वारा ‘देशद्रोह कानून’ लाया गया.

ख़ुद इंग्लैंड में भी, असभ्यता और गुलामी के प्रतीक ‘देशद्रोह क़ानून’ को 2009 में रद्द कर दिया गया. “देशद्रोह, देशद्रोही, देशाद्रोहपूर्ण; बहुत शर्मनाक और रहस्यपूर्ण लांछन हैं; बीते ज़माने की बातें हैं, जब आज की तरह, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विचार वज़ूद में नहीं आया था…इस देश में ऐसे काल-बाह्य कानूनों की मिसाल देकर, दूसरे देश भी, इन्हें क़ायम रखने को ना सिर्फ़ उचित ठहराते हैं बल्कि राजनीतिक विरोध को दबाने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हनन में, इनका बेज़ा इस्तेमाल करते हैं.” औपनिवेशिक लुटेरों ने अपने दमन-तंत्र को बचाने के लिए, जिस काले क़ानून को बनाया, वे उसे अपने देश में रद्द करने को मज़बूर हुए, जबकि उनके भूरे वारिसों ने उसे और ख़तरनाक बनाने के इमकानात कर लिए हैं.

सुप्रीम कोर्ट द्वारा, मई 22 को, सुनाया हुक्म कि देशदोह क़ानून, आज असभ्य होने का सबूत बन गया है, इसे रद्द किया जाए; सुनने में अच्छा लगता है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ख़ुद, ऐसे रसीले बयान या आदेश देकर आँखें मूंद लेती है. उनके हुक्म का क्या हस्र हुआ, ये जानने की इच्छा या साहस नहीं दिखाती. देशद्रोह क़ानून के बारे में, मोदी सरकार द्वारा दिए गए शपथ-पत्र का अनुपालन नहीं हुआ, तो क्या ये सुप्रीम कोर्ट की अवमानना नहीं है? अपनी अवमानना से भी अगर सुप्रीम कोर्ट आहत नहीं होती, तो व्यक्तिगत स्वतंत्रता की चिकनी- चुपड़ी बातें क्या छलावा नहीं हैं? कौन नहीं जानता कि सुप्रीम कोर्ट ने, मोदी सरकार का ये शपथ-पत्र भी स्वीकार कर, फाइल में लगवा दिया था कि कोरोना में ऑक्सीजन की कमी से कोई मौत नहीं हुई!! जबकि ऑक्सीजन की कमी से तड़पकर मरने वालों में कई जज और वकील भी शामिल थे. दमनपूर्ण लॉक डाउन में, हज़ारों हज़ार मील चलते-चलते, 994 मज़दूर सडकों पर मर गए, सारा डेटा सुप्रीम कोर्ट के पास है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट को, सरकार का ये बयान स्वीकार करने में कोई दिक्कत नहीं हुई कि किसी भी मज़दूर की मौत नहीं हुई. सुप्रीम कोर्ट के ऐसे विचित्र व्यवहार को कैसे समझा जाए? इच्छा शक्ति नहीं है या मिला-जुला खेल है, या मामला सुधरने से परे जा चुका? राजनीति शास्त्र हमें सिखाता है कि ये लक्षण फासीवाद के हैं.

किस बात से डर रही है, मोदी सरकार ?

यूएपीए नाम के डरावने ख़तरनाक क़ानून को मोदी सरकार और घातक बना चुकी है. एक अकेले व्यक्ति को भी अब आतंकवादी बताकर, ता-उम्र जेल में सड़ाया जा सकता है. ईडी, सीबीआई, इनकम टैक्स, नशीले पदार्थ रोकथाम आदि क़ानूनों का इतनी नंगई से दुरूपयोग हो रहा है कि जैसे ही मोदी सरकार के विरुद्ध कोई मुंह खोलता है, लोग घोषणा कर देते हैं कि कल सुबह 4 बजे जिप्सी पहुँच जाएगी!! गुलामी की ज़िल्लत के प्रतीक देशद्रोह क़ानून को ख़त्म करने की जगह, उसे और दमनकारी बनाया जा रहा है. वस्तु-स्थिति आज ये है कि गुंडे, बलात्कारी, ठग, फ्रौडीये बे-खौफ़ पत्रकार वार्ताएं करते हैं, और सरकार की विनाशकारी नीतियों, नंगी कॉर्पोरेट लूट, बेतहाशा बढ़ती मंहगाई, भुखमरी, बे-इन्तेहा बेरोज़गारी, अल्पसंख्यक समुदाय पर हर रोज़ बढ़ते अत्याचार, महिला दमन, दलितों पर अत्याचार का विरोध करने वाला और अपने संवैधानिक अधिकारों को बचाने की ज़द्दोज़हद करने वाला, हर नागरिक खौफज़दा है.

मूल प्रश्न है; सरकार क्यों खौफ़ज़दा है ? भले 85 करोड़ लोगों के पास खाने को दाने नहीं, लेकिन सरकार के पास दुनिया का सबसे मंहगा ख़ुफ़िया उपकरण ‘पेगासस’ मौजूद है. इन सबके बावजूद सरकार को, लोगों का गला घोंटने के लिए और ख़तरनाक क़ानून क्यों चाहिए? मोदी सरकार किस बात से डर रही है? कारण वही है, जो प्रतिष्ठित जन-कवि गोरख पाण्डेय ने अपनी इस कविता में बताया है;

वे डरते हैं
किस चीज़ से डरते हैं वे
तमाम धन-दौलत,
गोला-बारूद पुलिस-फौज़ के बावजूद?
वे डरते हैं
कि एक दिन
निहत्थे और ग़रीब लोग
उनसे डरना बंद कर देंगे !

नए क़ानून मंत्री ने 12 जून को, विधि आयोग की देशद्रोह क़ानून को ‘संशोधित’ करने पर देश की प्रतिक्रियाएं मांगी है. देश की प्रतिक्रिया ये है, मंत्री जी; हम, भारत के लोग, विधि आयोग की सिफारिशों को सिरे से खारिज़ करते हैं. गुलामी की ज़िल्लत के प्रतीक देशद्रोह क़ानून को रद्द करो.

  • सत्यवीर सिंह

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