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सवर्ण गरीबों को 10 प्रतिशत आरक्षण पर सवाल

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सवर्ण गरीबों को 10 प्रतिशत आरक्षण पर सवाल
सवर्ण गरीबों को 10 प्रतिशत आरक्षण पर सवाल

जब दलितों-पिछड़ों के लिए आरक्षण व्यवस्था को लागू किया गया था, तब सवर्ण तबका नारा लगाया था –

ई आरक्षण कहां से आई ?
कर्पूरीया की माय बियाई.

और आज जब सवर्ण तबकों के लिए आरक्षण व्यवस्था हेतु मोदी सरकार ने संविधान संशोधन किया और सुप्रीम कोर्ट के पांच संसदीय पीठ ने स्वीकृति दी, तब क्या उस नारे को दुहराया जा सकता है ?

ई आरक्षण कहां से आई ?
मोदिया की माय बियाई.

या,

ई आरक्षण कहां से आई ?
यूयू ललितवा की माय बियाई.

बेशक, आज इस तरह के नारे कहीं नहीं लग रहे हैं और लगना भी नहीं चाहिए तो क्या यह मान लेना चाहिए कि पहले लगे जातिवादी और स्त्री विरोधी नारे सही थे और अब गलत ? स्वभावतः न तो पहले के लगे नारे सही थे और न ही अब के लगे नारे सही होंगे, लेकिन एक कसक जो छोड़ जाती है वह है भारतीय समाज की जातिवादी-स्त्री विरोधी मानसिकता का प्रभुत्व.

निःसंदेह कर्पूरी ठाकुर के खिलाफ लगाये गये सवर्णों के नारे के खिलाफ कहीं भी हिंसक घटना नहीं हुई लेकिन आज अगर इसी नारे को उलट कर लगाया जाने लगे तो दलितों-पिछड़ों के घरों को आग लगाया जाने लगेगा, सुप्रीम कोर्ट और सेना-पुलिस तांडव मचाने लगेगी, देश की एकता-अखंडता खतरे में घिर जायेगी, जिसको बचाने का ठिकरा इस देश के दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों के झुके हुए मत्थे पर है, तना हुआ मत्था खतरे की घंटी है.

बहरहाल, इस दौर में एक और अजीब चीज हुई. सवर्ण तबके के कई लोग इस ईडब्ल्यूएस आरक्षण के खिलाफ खड़े हुए हैं तो वहीं दलितों, पिछड़ों के बीच से ही इसके समर्थन में आवाजें आने लगी. पत्रकार रविश कुमार लिखते हैं –

आर्थिक रुप से कमज़ोर वर्ग के आरक्षण EWS पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया मगर उस बहस का समाधान नहीं हुआ, जो इस आरक्षण को लेकर चल रही थी और चलती रहेगी. सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का एक तरफ स्वागत भी हो रहा है, बीजेपी काफी उत्साह से इसका स्वागत कर रही है तो दूसरी तरफ कई सामाजिक कार्यकर्ता इसे लेकर नाराज़ भी हैं. इसकी बहस फिर से घूम फिर कर राजनीति के उसी घेरे में पहुंच गई है जहां हर कोई अपने-अपने वोट के हिसाब से चुप है या बोल रहा है.

आरक्षण का मकसद, उसकी परिभाषा और अन्य मसले पीछे छूट गए हैं. वैसे राजनीतिक तौर पर भी यह मसला नहीं था, क्योंकि किसी ने इसे लेकर जनता के बीच व्यापक रुप से मुद्दा नहीं बनाया. अब कोर्ट का आदेश आ गया है कि आर्थिक रुप से कमज़ोर वर्ग के लिए आरक्षण का कानून सही है. इसके बाद और भी मुश्किल होगा. ज़रूर डीएमके ने फैसले की आलोचना की है. बल्कि मुखर आलोचना करने वाली एकमात्र पार्टी डीएमके ही रही. कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है. इस फैसले को चुनौती देने के लिए 40 याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थीं.

पांच जजों की संविधान पीठ ने फैसला दे दिया कि आर्थिक रुप से आरक्षण का फैसला सही है और यह संविधान के आधारभूत ढांचे में बदलाव नहीं करता है. पांच सदस्यों की बेंच के तीन सदस्यों ने आरक्षण के पक्ष में फैसला दिया है लेकिन दो सदस्यों ने इस आरक्षण को ग़लत बताया है. जस्टिस यू. यू. ललित और जस्टिस एस. रविंद्र भट्ट ने कहा है कि आर्थिक रुप से कमज़ोर तबके को आरक्षण देना ग़लत है. जस्टिस दिनेश माहेश्वरी, जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी ने आर्थिक रुप से कमज़ोर वर्ग के आरक्षण के फैसले को सही ठहराया है.

जनवरी 2019 में मोदी सरकार ने संविधान में 103 वां संशोधन कर आर्थिक रुप से कमज़ोर तबके के लिए 10% आरक्षण की व्यवस्था की थी. इस आरक्षण को लेकर संवैधानिक स्तर पर भी सवाल उठे और जातिगत भेदभाव की सामाजिक सच्चाई को लेकर भी. लेकिन इस फैसले के बाद हुए लोकसभा और इस साल के यूपी चुनाव के नतीजों को आधार मानें तो ज़मीन पर इसका वैसा विरोध नहीं हुआ. बीजेपी को भारी जीत नहीं मिलती अगर पहले से आरक्षण पा रही जातियां और 2019 के बाद से EWS आरक्षण पाने वाली जातियों में टकराव होता.

दूसरी तरफ सामाजिक न्याय की राजनीति से जुड़े दल और नेता इस मसले पर बंट गए. कुछ की संसद में ताकत नहीं थी तो कुछ ने संसद के बाहर भी बोलने का साहस नहीं दिखाया. जनता दल युनाइटेड के नेता के. सी. त्यागी ने कहा कि बिहार में तो नीतीश कुमार ने सवर्ण आयोग का गठन किया था. कर्पूरी ठाकुर ने बिहार विधानसभा में प्रस्ताव रखा था कि सामान्य वर्ग के ग़रीब लोगों के लिए आरक्षण हो. जिसके कारण कर्पूरी ठाकुर की सरकार ही चली गई थी.

‘हम इस मूव के प्राइम मूवर्स हैं…’ हमारे नेता कर्पूरी ठाकुर ने 1978 में बिहार विधानसभा में यह प्रस्ताव रखा था. इसका आधार था मुंगेरीलाल कमीशन जिसकी रिपोर्ट में यह सिफारिश की गई थी कि सामान्य वर्ग के गरीब लोगों के लिए आरक्षण हो, इसके चलते कर्पूरी ठाकुर सरकार चली गई थी. 1990 में जब मंडल कमीशन लागू किया गया तो उसका विरोध हुआ लेकिन हमारे नेता वी. पी. सिंह ने सामान्य वर्ग के कमजोर लोगों के लिए 10 फ़ीसदी आरक्षण देने का ऐलान किया था.

नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार में सवर्ण आयोग का गठन किया गया था, इसकी रिकमेंडेशन भी आर्थिक तौर पर कमजोर लोगों को आरक्षण देने की थी. हमें प्रसन्नता है कि सुप्रीम कोर्ट ने आज इस प्रस्ताव पर मुहर लगाई है और सभी को इसका स्वागत इसलिए करना चाहिए. आज जो लोग आर्थिक आधार पर सभी वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था चाहते हैं वह मानसिक तौर पर बीमार हैं और पूरी संवैधानिक व्यवस्था को बदल कर देश को गृह युद्ध की तरफ ले जाना चाहते हैं.’

इसी तरह मायावती भी सामान्य वर्ग के लिए आर्थिक आधार पर आरक्षण की वकालत करती रही हैं. राज्य सभा में इस पर जब मतदान हुआ तब उनकी पार्टी के सांसद सतीश चंद्र मिश्र ने इस बिल के समर्थन में मतदान किया. उस समय लोक जनशक्ति पार्टी के नेता राम विलास पासवान ने कहा कि इसे संविधान की नौंवी अनुसूची में डाल देना चाहिए ताकि इसकी न्यायिक समीक्षा भी न हो.

मूल बात यह है कि इस मुद्दे को लेकर सामाजिक न्याय से जुड़े नेताओं द्वारा व्यापक विरोध नहीं किया गया. न तब और न अब. आज ज़रूर डीएमके नेता और तमिलनाडु मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर एतराज़ जाहिर किया है लेकिन जब इस पर मतदान हुआ तब उनकी पार्टी का एक भी सांसद लोकसभा में नहीं था. 2014 में तमिलनाडु से डीएमके को एक भी सीट नहीं मिली थी. मगर राज्य सभा में डीएमके के सांसद थे और उन्होंने इस बिल के खिलाफ मतदान किया था.

कोई ऐसा दल नहीं जिसमें पिछड़ा वर्ग, अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के सांसद न हों, मगर किसी ने इस आरक्षण का विरोध नहीं किया. आज संसद के दोनों सदनों में इस बिल पर दिए गए भाषणों को फिर से पढ़ने की ज़रूरत है. राज्य सभा सांसद मनोज झा ने राजद की तरफ से कहा था कि हम इस बिल का विरोध करते हैं क्योंकि यह एंटी दलित और गरीबों के खिलाफ है. राजद के चारों सांसदों ने इस बिल के खिलाफ वोट किया था.

इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के राज्य सभा सांसद ने बिल के विरोध में वोट किया था. आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने राज्य सभा में कहा था कि यह आरक्षण सवर्णों के साथ धोखा है. उनका छपा हुआ बयान है कि दलित आरक्षण को खत्म करने की मंशा के साथ यह बिल लाया गया है. जब मतदान हुआ तब संजय सिंह ने इसके खिलाफ वोट देकर विरोध नहीं किया, बल्कि गैर हाज़िर रहे.

समाजवादी पार्टी के राज्य सभा सांसद रामगोपाल यादव ने इस आरक्षण का समर्थन किया था. कांग्रेस के राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने बहस में हिस्सा लेते हुए कहा था कि मंडल आयोग में भी आर्थिक रुप से कमज़ोर तबके के लिए आरक्षण का प्रस्ताव है. इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की बेंच ने इसे असंवैधानिक कहा था.

सिब्बल ने कहा था कि मैं सरकार से पूछता हूं कि किस लॉ अफसर ने उसे बताया है कि यह बिल संवैधानिक रुप से सही है ? राज्य सभा और लोकसभा में कांग्रेस सांसदों ने बिल के पक्ष में वोट किया था. लोकसभा में केवल तीन वोट इसके खिलाफ डाले गए थे. 323 वोट समर्थन में था. 323 सांसदों में ज़ाहिर है अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्ग के सांसद भी होंगे. सवर्ण सांसद तो होंगे ही. कांग्रेस ने भी इसके पक्ष में वोट किया था.

लोकसभा में असदुद्दीन ओवैसी और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के सांसदों ने बिल के खिलाफ वोट किया था. ओवैसी ने कहा था कि – ‘मैं इस बिल का विरोध करता हूं, यह संविधान में फर्जी है. यह बी. आर. अंबेडकर का अपमान है. यह संविधान की विचारधारा के खिलाफ है.’ लोक जनशक्ति पार्टी और समाजवादी पार्टी ने लोकसभा में समर्थन किया था. लोकसभा में जब बहस हो रही थी तब अरुण जेटली ने कांग्रेस पार्टी का घोषणा पत्र पढ़ कर बताया था कि कांग्रेस ने लिखा है कि गरीब सवर्णों को आरक्षण देने का रास्ता निकालेंगे.

8 जनवरी को जब यह बिल लोकसभा में पास हुआ तब प्रधानमंत्री ने सभी दलों के सांसदों का धन्यवाद करते हुए ट्विट किया था जिन्होंने संविधान के 103 वें संशोधन का समर्थन किया था. आज कांग्रेस पार्टी के मीडिया प्रमुख जयराम रमेश ने बयान जारी कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है. जयराम रमेश ने कहा है कि संविधान के 103 वें संशोधन की प्रक्रिया मनमोहन सिंह सरकार के फैसले के कारण ही शुरू हो सकी. जब 2005-06 में सिन्हो आयोग का गठन किया था.

2010 में आयोग ने रिपोर्ट दी और इसके सुझावों पर व्यापक रुप से चर्चा हुई. तब 2014 तक यह बिल तैयार हो सका. मोदी सरकार ने पांच साल लगा दिए फैसला लेने में. बीजेपी ने आज के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विज़न को इसका श्रेय जाता है. बीजेपी नेता बी एल संतोष ने ट्विट किया है कि सामाजिक न्याय की दिशा में यह एक बड़ा कदम है.

परिभाषाओं में ज़रूर आरक्षण सामाजिक न्याय का ज़रिया है, लेकिन चुनाव जीतने की राजनीति ने सामाजिक न्याय की परिभाषा से आरक्षण को बाहर कर दिया है. आरक्षण ग़रीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है, यह इसलिए कहा जाता था क्योंकि ग़रीबी दूर करने के लिए कई तरह की योजनाएं हैं. छात्रवृत्ति है, सब्सिडी है. आरक्षण उनके लिए है जिनके साथ ऐतिहासिक रूप से सामाजिक भेदभाव हुआ है, उन्हें संपत्ति में कोई अधिकार नहीं मिला, सामाजिक हैसियत नहीं थी, इसलिए उन्हें सामाजिक बराबरी और सम्मान के स्तर पर लाने के लिए आरक्षण की व्यवस्था लाई गई.

सोशल मीडिया पर इसकी बहस एक दूसरे को ताने मारने में उलझी हुई है. पहले जिन्हें आरक्षण मिला उन्हें मेरिट के नाम पर चिढ़ाया गया तो अब EWS का आरक्षण मिला है उन्हें सुदामा कोटा बोल कर चिढ़ाया जा रहा है. लेकिन यह तय हो गया कि अगर आरक्षण मिले तो सब आगे बढ़कर स्वीकार कर लेंगे. आरक्षण की अवधारणा का विरोध नहीं है. सारा विरोध इसके मिलने तक ही है, मिलते ही आरक्षण अच्छा हो जाता है. आज आरक्षण का दायरा बड़ा हो गया है और जहां लागू होना है, उसका दायरा सिमट गया है. सरकारी नौकरियां ठेके की हो गईं, खत्म हो गईं और पेंशन समाप्त हो गया. 2018 में राजनीतिक चिंतक सुहास पलसीकर ने इंडियन एक्सप्रेस में इन कारणों पर विस्तार से लिखा है.

आपको याद होगा, गुजरात में पटेल आरक्षण का मसला कितना उग्र हो गया था, हिंसा भड़क उठी थी और मंत्री तक अपने घर में असुरक्षित हो गए थे, उस समय लगा था कि यह आंदोलन गुजरात में बीजेपी की जड़े कमज़ोर कर देगा मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ. पटेल आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हार्दिक पटेल कांग्रेस में गए और अब तो बीजेपी में ही आ गए हैं. इतने हिंसक आंदोलन के बाद भी बीजेपी पटेल आरक्षण की मांग के आगे नहीं झुकी और इस बार के चुनाव में यह मांग इतनी कमज़ोर पड़ चुकी है कि कोई मुख्य रूप से बात तक नहीं कर रहा है.

इसी तरह महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण का मसला जब सड़कों पर उतरा तो राजनीतिक दलों के होश उड़ गए. यहां गुजरात से अलग बीजेपी ने मराठा आरक्षण की बात मान ली. देवेंद्र फड़णवीस ने आरक्षण का एलान कर दिया. इस साल मई में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने इस फैसले को रद्द कर दिया. इस आधार पर कि 50 प्रतिशत से ज़्यादा आरक्षण नहीं दिया जा सकता है.

खैर, राजनीतिक चिंतक सुहास पलसीकर ने गुजरात और महाराष्ट्र के आरक्षण आंदोलन के हवाले से लिखा कि साठ से लेकर अस्सी के दशक के बीच सामाजिक व्यवस्था में भेदभाव के कारण आरक्षण की मांग ज़ोर पकड़ रही थी लेकिन आज विकास की नीतियों में भेदभाव के कारण आरक्षण की नई मांग को ताकत मिल रही है. पटेल और मराठा सहित कई समुदाय आर्थिक आधार पर आरक्षण मांग रहे हैं.

इन दिनों आरक्षण पाने का सबसे सशक्त तरीका यह हो गया है कि किसी समुदाय के पास राजनीतिक समर्थन कितना है. संख्या और सीट के कारण दावे किए जा रहे हैं और आरक्षण मिल भी रहा है. कर्नाटक में लिंगायत भी आरक्षण मांगने लगे. जिसके आधार को एक आयोग ने ठुकरा दिया था. सुहास का एक तर्क नोट किया जाना चाहिए कि लोकतंत्र में स्वाभाविक है कि अलग अलग समूह रैलियों के ज़रिए दावेदारी करेंगे, लेकिन हमने किसी समुदाय की राजनीतिक ताकत और उनके पिछड़े होने की दावेदारी को मिला दिया है. अगर ताकत है तो आप खुद को पिछड़ा घोषित करवा सकते हैं और आरक्षण ले सकते हैं. इस स्थिति के कारण ही आरक्षण को लेकर जो बहस रही है, उसके जो आधार रहे हैं, वो सब बदल गए हैं.

सरकारी नौकरी नहीं है, EWS के विधेयक के समय सभी ने यह कहा लेकिन नौकरी तो प्राइवेट में भी नहीं है लिहाज़ा सरकारी नौकरी पर दबाव बढ़ना ही था और उसमें हिस्सेदारी की मांग भी.इस दिशा में आगे और बहस करने के लिए आप चाहें तो समाजशास्त्री सतीष देशपांडे का एक लेख पढ़ सकते हैं जो 7 जनवरी 2021 के द हिन्दू में छपा था.

सतीश देशपांडे ने लिखा है कि अपर कास्ट की विचारधारा में SC ST OBC को कोटा ग़लत है. अनुचित है लेकिन अपर कास्ट को कोटा मिले तो सही है. आर्थिक रुप से कमज़ोर तबके को कोटा मिलना चाहिए. अलग-अलग रुपों में ऊंची जाति को जो कोटा मिला हुआ है वह दिखाई भी नहीं देता है. उन्होंने उदाहरण दिया कि उनकी यूनिवर्सिटी में MSc में एडमिशन के लिए तय हुआ कि उस यूनिवर्सिटी के छात्रों के लिए 50 परसेंट सीट रिज़र्व होगी. यह भी एक तरह का कोटा है, मगर किसी को दिखा नहीं.

देशपांडे का कहना है कि कोटा और मेरिट एक दूसरे के खिलाफ नहीं हैं. आरक्षित सीटों में भी भयंकर प्रतिस्पर्धा है. बिना मेरिट के कोटा की सीट हासिल ही नहीं कर सकते. लेकिन महंगे प्राइवेट स्कूल औऱ कोचिंग संस्थान की सीटें तो केवल पैसों वालों के लिए होती हैं. मेरिट में कई चीजों शामिल होती हैं. योग्यता के अलावा प्रयास और सामाजिक पूंजी भी. सामाजिक पूंजी का बड़ा रोल होता है. मेरिट एक तरह से अपर कास्ट के लिए कोड वर्ड है कि यह केवल उन्हीं के पास है. लेकिन यह धारणा तो कब की ध्वस्त हो चुकी है.

आरक्षित वर्गों के छात्र इतने अधिक नंबर ला रहे हैं कि अनारक्षित श्रेणी में दावेदारी करने लगे हैं. लेकिन उनकी इस प्रतिभा को स्वीकार नहीं किया जाता, बल्कि रोकने के उपाय निकाले जाते हैं. सतीष देशपांडे का निष्कर्ष है कि EWS आरक्षण की मांग के साथ मेरिट की सारी दलीलें खोखली नज़र आने लगी हैं. जिस मेरिट के आधार पर आरक्षित वर्ग को टारगेट किया है, उस हथियार को छोड़ कर अपर कास्ट आर्थिक आधार पर अपने लिए आरक्षण को गले लगा रहा है. हमने शब्दश अनुवाद नहीं किया है बल्कि सार संक्षेप पेश किया है.

इसका समाधान अवसरों के विस्तार में है. सरकारी नौकरियों का स्वरुप बदल रहा है. उस हिसाब से इस समस्या को देखेंगे तो स्थिति निराशाजनक है. नेताओं ने एक रास्ता निकाल लिया है कि नौकरी न दो मगर आरक्षण देकर जनता के बीच सीना फुलाते रहो. मगर यह कब तक चलेगा. हर तबके के नौजवान सरकारी परीक्षा का गजट पत्र लेकर पत्रकारों के पीछे भटक रहे हैं कि उनकी नौकरी खत्म कर दी गई, पांच साल से सेवा दे रहे थे, अचानक सरकार ने खत्म कर दी तो पांच साल हो गए परीक्षा दिए हुए, अभी तक परिणाम नहीं आए हैं और नियुक्ति पत्र नहीं मिला है. ऐसे छात्रों के संघर्ष हमारी नज़रों से ओझल ही रहते हैं

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