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पेगासस और जनद्रोही सरकारें

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पेगासस और जनद्रोही सरकारें

पिछले दिनों 10 देशों की न्यूज़ एजेंसियों (जिसमें ‘द गार्डियन’, ‘द वायर’, ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’, ‘रेडियो फ़्रांस’, आदि जैसी एजेंसियाँ शामिल हैं) ने मिलकर विश्व-स्तर पर सरकारों द्वारा अपने राजनीतिक विरोधियों, जैसे कि पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, जजों, विरोधी पक्ष के नेताओं और अन्य लोगों की जा रही जासूसी का पर्दाफ़ाश किया है. यह ख़बर आजकल पूरी दुनिया का ज्वलंत मुद्दा बनी हुई है और ‘पेगासस प्रोजेक्ट’ के नाम से मशहूर है. ‘पेगासस’ इज़राइल की जासूसी कंपनी एन.एस.ओ. द्वारा बनाया गया एक सॉफ़्टवेयर है, जो सिर्फ़ और सिर्फ़ सरकारों को बेचा जाता है.

इन 17 न्यूज़ एजेंसियों और एमनेस्टी इंटरनैशनल के अनुसार जासूसी के इस मामले में सरकारों द्वारा ‘पेगासस’ का इस्तेमाल किया गया है. इन 17 न्यूज़ एजेंसियों और एमनेस्टी इंटरनेशनल के पास 50 हज़ार ऐसे नंबरों की सूची है, जिन पर एन.एस.ओ. के ग्राहकों द्वारा ‘पेगासस’ के ज़रिए जासूसी की जानी थी. कुछ मोबाइल फ़ोनों की जांच करने से इन 17 न्यूज़ एजेंसियों, एमनेस्टी इंटरनेशनल की शोध लैब और सिटीजन लैब को यह पता चला है कि बड़ी संख्या में फ़ोनों पर ‘पेगासस’ के ज़रिए जासूसी की गई है.

‘पेगासस’ जैसे सॉफ़्टवेयरों के ज़रिए सरकारों द्वारा दुनिया-भर में गोपनीयता, आज़ादी के हनन और विरोधी आवाज़़ों और पक्षों को दबाने के लिए सरकारों द्वारा की जा रही जासूसी पर बहस छिड़ी हुई है. कुछ लोग अभी भी ‘पेगासस’ जैसे सॉफ़्टवेयर के ज़रिए की जाने वाली जासूसी को देश और नागरिकों की सुरक्षा के लिए जायज़ ठहरा रहे हैं और ख़ुद एन.एस.ओ. ग्रुप ने अपने जारी किए बयान में कहा है कि आख़िरकार किसी को तो जासूसी जैसा घटिया काम करना ही पड़ेगा, क्योंकि ‘पेगासस’ जैसे जासूसी सॉफ़्टवेयर के चलते ही आम लोग रात को चैन की नींद सो सकते हैं, लेकिन क्या यह सच है ? अनेकों लोगों का कहना है कि ‘पेगासस’ के ज़रिए जासूसी, चैन से सोने का नहीं, बल्कि नींद हराम होने का कारण अधिक बनती है. इस ज्वलंत बहस में यह जानना ज़रूरी है कि ‘पेगासस’ क्या है और कैसे काम करता है और अब तक इसके इस्तेमाल का अनुभव क्या कहता है ?

‘पेगासस’ क्या है और यह कैसे काम करता है ?

‘पेगासस’ एक सॉफ़्टवेयर है, जो इज़राइल की जासूसी कंपनी एन.एस.ओ. द्वारा बनाया गया है और यह सिर्फ़ और सिर्फ़ सरकारों को बेचा जाता है. ‘पेगासस’ किसी व्यक्ति के स्मार्टफ़ोन में इंस्टॉल होकर उसकी सारी जानकारी निकाल सकता है, जैसे कि तस्वीरें, फ़ोन नंबर, की गईं कॉल्ज़ के रिकॉर्ड, सभी भेजे गए संदेश, पासवर्ड आदि. ‘पेगासस’ ना सिर्फ़ फ़ोन पर की जाने वाली बात ही रिकॉर्ड करता है, बल्कि एक बार जब ‘पेगासस’ किसी फ़ोन में दाख़िल हो जाता है तो इसके ज़रिए कभी भी उस फ़ोन का कैमरा, माइक चलाए जा सकते हैं, यानी फ़ोन का मालिक फ़ोन को पास रखकर कोई भी बात कर रहा है, वह सुनी जा सकती है और वह अपने फ़ोन पर क्या देख रहा है, यह भी आसानी से पता लगाया जा सकता है.

बताने की ज़रूरत नहीं कि ‘पेगासस’ फ़ोन के ज़रिए व्यक्ति के ठिकाने की जानकारी लगातार जासूसी करने वाली सरकार तक पहुंचाता है. ये तो ऐसी चीज़ें हैं जो आम जासूसी करने वाले ‘सॉफ़्टवेयर्स’ में पाई ही जाती हैं, लेकिन यह बेवजह नहीं है कि ‘पेगासस’ जासूसी करने के लिए सरकारों का चहेता सॉफ़्टवेयर बनता जा रहा है.

‘पेगासस प्रोजेक्ट’ के साथ जुड़े तकनीकी माहिरों के अनुसार किसी वक़्त फ़ोन पर संदेश भेजने वाले ऐप जैसे कि सिग्नल, टेलीग्राम आदि आपसी बातचीत के लिए सुरक्षित माने जाते थे, लेकिन ‘पेगासस’ ने इन ऐप्स की सुरक्षा की धज्जियां उड़ा दी हैं और अब इन मंचों पर भी बातचीत की जासूसी की जा सकती है. दूसरा, एप्पल के फ़ोन और फ़ोन को अपडेट करते रहना ऐसे जासूसी सॉफ़्टवेयर्स के ख़िलाफ़ सुरक्षा की एक ढाल माना जाता था, लेकिन ‘पेगासस’ पर फ़ोन अपडेट करने का कोई ख़ास असर नहीं होता. एप्पल फ़ोन की सुरक्षा को तो यह ऐसा तोड़ता है कि फ़ोन के मालिक की तुलना में ‘पेगासस’ के ज़रिए जासूसी करने वाली सरकार के आगे फ़ोन अपने राज़ अधिक खोल देता है.

‘पेगासस’ ना सिर्फ़ फ़ोन में दाख़िल होने के बाद ही अन्य जासूसी हथियारों से अधिक ख़तरनाक़ है, बल्कि यह स्मार्टफ़ोन के अंदर दाख़िल होने में बाक़ी ‘सॉफ़्टवेयर्स’ से अधिक सक्षम है. ‘पेगासस’ के ज़रिए फ़ोन हैक करने का पहला मामला 2015-16 के आस-पास सामने आया था. तब से अब तक इसकी कुशलता में काफ़ी गुणात्मक वृद्धि हुई है.

स्मार्टफ़ोन हैक करने वाले बाक़ी सॉफ़्टवेयर ई-मेल, संदेश आदि तरीक़ों से फ़ोन में दाख़िल होते हैं. इनमें दिए गए लिंक पर क्लिक करने से जासूसी सॉफ़्टवेयर फ़ोन में दाख़ि‍ल हो जाता है या कोई अनजान नंबर से की गई कॉल के ज़रिए इसे फ़ोन में दाख़िल करने की कोशिश की जाती है. इस तरीक़े में इंसान एक हद तक सावधान रह कर जासूसी से बच सकता है, यदि वह ऐसे संदेशों में मौजूद लिंक को ना खोले, अनजान वेबसाइटों पर ना जाए, अनजान फ़ोन नंबर से आए फ़ोन ना उठाए आदि आदि.

पहले ‘पेगासस’ भी स्मार्टफ़ोन में दाख़िल होने के लिए ऐसे ही तरीक़े इस्तेमाल करता था लेकिन अब यह इस ‘पुरातन’ तकनीक से कहीं आगे बढ़ चुका है. ‘पेगासस’ फ़ोन में दाख़िल होने के लिए अब ‘ज़ीरो क्लिक’ तरीक़े इस्तेमाल करता है, यानी स्मार्टफ़ोन के मालिक की अब जासूसी में सॉफ़्टवेयर डालने के लिए कोई भूमिका नहीं रह गई.

‘पेगासस’ फ़ोन के सॉफ़्टवेयर आदि में लूपहोल्स ढूंढकर फ़ोन, संदेश, वट्सएप और अन्य कई तरीक़ों से दाख़िल हो जाता है, चाहे स्मार्टफ़ोन का मालिक फ़ोन उठाए या न, संदेश खोले या न, ‘पेगासस’ ने की गई कॉल या भेजे गए संदेश के ज़रिए दाख़िल हो ही जाना है. फ़िलहाल ‘पेगासस’ जैसे सॉफ़्टवेयर से अपने स्मार्टफ़ोन की जासूसी से बचने के रास्ते बेहद कम हैं.

विश्व स्तर पर ‘पेगासस’ के ज़रिए हुई जासूसी के कुछ मामले

भले ही ‘पेगासस’ के ज़रिए विरोधी पक्ष के सियासतदानों, जजों, 13 प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों की भी जासूसी की गई है लेकिन मुख्य निशाना सत्ता के ख़िलाफ़ आवाज़़ उठाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता, मानवीय अधिकारों के सिपाही और पत्रकार ही रहे हैं.

17 न्यूज़ एजेंसियों के ज़रिए की गई सरसरी तफ़तीश के अनुसार ही कम से कम 189 पत्रकार और 85 सामाजिक कार्यकर्ता सरकार के ‘पेगासस’ जासूसी कांड का निशाना थे. सरकारें उसके ख़िलाफ़ लिखने वाले, बोलने वाले पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं से संबंधित हर तरह की जानकारी ‘पेगासस’ के ज़रिए इकट्ठा करती हैं. जैसे कि वे किस वक़्त किस जगह पर होते हैं, किस इंसान के क्या साथ क्या बात करते हैं, किन-किन लोगों के साथ उनकी दोस्ती है, उनकी ख़बरों के स्रोत क्या हैं, उनकी निजी कमज़ोरियां क्या हैं, कौन-सी बात उन्हें डराने के लिए इस्तेमाल की जा सकती हैं, अगले वक़्त में उनकी व्यस्तताएं क्या हैं आदि.

यह ऐसी जानकारी है जिससे ना सिर्फ़ सरकारें, पत्रकारों के ख़बरों के गुप्त स्रोतों को डरा धमका सकती हैं या ख़ुद पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को डरा धमका सकती हैं, बल्कि उनकी रिहायश, व्यस्तताओं की जानकारी इस्तेमाल करके उन पर हमले और यहां तक की क़त्ल भी करा सकती हैं. इसकी कुछ मिसालें भी मौजूद हैं. जमाल ख़शोगी, वॉशिंगटन पोस्ट का पत्रकार, जो सऊदी अरब की सरकार और शहज़ादे के ख़िलाफ़ खुलकर बोलता और लिखता था, जिसके चलते वह वहां की सरकार की आंखों में खटकता था और जलावतन भी था. उसके क़त्ल के बाद हुई छानबीन में पता लगा था कि उसके क़त्ल का हुक्म सऊदी अरब के शहज़ादे ने दिया था.

ख़ाशोगी के क़त्ल के 6 महीने पहले उसकी पत्नी के फ़ोन को ‘पेगासस’ के ज़रिए हैक किया गया था और शक है कि इसके ज़रिए ख़ाशोगी की आगामी व्यस्तताओं का पूरा ब्यौरा सऊदी अरब की सरकार के पास मौजूद था, जिसका इस्तेमाल करते हुए ख़ाशोगी का क़त्ल किया गया. क़त्ल के बाद ‘पेगासस’ के ज़रिए ख़ाशोगी के दोस्तों, सहयोगियों और पारिवारिक सदस्यों के फ़ोन भी हैक किए गए थे.

ऐसा ही एक मामला मैक्सिको के पत्रकार ससिलियो पिनेडा का है, जो मैक्सिको के नशा तस्करों और मैक्सि‍कन अधिकारियों के आपसी रिश्तों की पड़ताल कर रहा था. 2 मार्च 2017 को उसने एक नशा तस्कर, मैक्सिको की पुलिस और सियासतदानों के आपसी रिश्तों के बारे में फेसुबक पर एक लाइव वीडियो शेयर किया और कुछ घंटों के बाद ही उसका शरीर गोलियों से छलनी कर दिया गया. कुछ दिनों से उसे लगातार मारने की धमकियां दी जा रही थीं और इस वक़्त मैक्सिकन सरकार द्वारा उसका नंबर ‘पेगासस’ के ज़रिए हैक करने की सूची में डाला गया था.

उसके क़त्ल के बाद उसके दोस्त का कहना था कि पिनेडा अक़्सर कहा करता था कि बुरे लोगों (नशा तस्करों) से मैं नहीं डरता, मुझे मारने वाली सरकार होगी. दुनिया-भर में पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को ‘पेगासस’ के ज़रिए हैक करने की ऐसी कई अन्य मिसालें हैं, जिनके बारे में ‘फ़ॉरबिडन स्टोरीज़’ नाम की एक वेबसाइट पर पढ़ा जा सकता है.

भारत सरकार और ‘पेगासस’

‘पेगासस प्रोजेक्ट’ की तफ़तीश के अनुसार भारत में भी ‘पेगासस’ को जासूसी के लिए इस्तेमाल किया गया है. भले ही ‘पेगासस’ के ज़रिए की गई संभावित जासूसी में अनिल अंबानी जैसे पूंजीपतियों, पूर्व सी.बी.आई. अध्यक्ष आलोक वर्मा, कुछ जजों, केंद्र में विरोधी पार्टियों के सदस्य और अन्य लोग शामिल हैं लेकिन यहां भी मुख्य निशाना सरकार और सत्ता विरोधी पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता ही हैं.

लगभग 40 पत्रकारों के स्मार्टफ़ोन संभावित तौर पर ‘पेगासस’ के ज़रिए हैक किए गए हैं और कईयों के फ़ोनों पर किए गए टेस्टों ने इस बात की पुष्टि की है. इन पत्रकारों में वे लोग शामिल हैं, जो या तो लगातार मोदी सरकार की नीतियों का विरोध करते आए हैं या जिन्होंने मोदी सरकार के किसी मंत्री और क़रीबी इंसान के काले कारनामों का पर्दाफ़ाश किया है.

‘द वायर’ के संपादक सिद्धार्थ वर्दराजन और एम.के. वेणू, ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के पूर्व पत्रकार सुशांत सिंह, रोहिणी सिंह आदि जैसे पत्रकारों के फ़ोन हैक हुए हैं. यह बात भी दिलचस्प है कि इन पत्रकारों के फ़ोन किस वक़्त हैक किए गए हैं. सुशांत सिंह का फ़ोन तब हैक किया गया, जब वह राफे़ल घोटाले के संबंध में काम कर रहा था. पत्रकार और लेखक परंजॉय गुहा की जासूसी लगभग उस वक़्त शुरू हुई, जब वे अंबानी परिवार से संबंधित लेखों पर काम कर रहे थे और भाजपा और फे़सुबक के आपसी रिश्ते पर किताब लिखने के लिए सामग्री इकट्ठा कर रहे थे.

‘द वायर’ पर लिखने वाली रोहिणी सिंह की ‘पेगासस’ जासूसी तब शुरू हुई, जब वह कैबिनेट मंत्री पीयूष गोयल और अमित शाह के लड़के जय शाह के काले कारनामों के बारे में लेख लिख रही थी. भारत सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़़ उठाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता भी ‘पेगासस’ के निशाने पर हैं.

हैक किए गए नंबरों में कम-से-कम 9 नंबर उन कार्यकर्ताओं, जजों, पत्रकारों और बुद्धि‍जीवियों से संबंधित हैं, जिन्हें जून 2018 और अक्टूबर 2020 के दरमियान एलगर परिषद केस के नाम पर हिरासत में लिया गया है. उमर ख़ालिद, अनिर्बान भट्टाचार्य, आलोक शुक्ला आदि जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं पर भी ‘पेगासस’ के ज़रिए जासूस की गई है.

भारत सरकार पिछले दिनों लगातार इस सवाल का जवाब देने में हिचकिचा रही है कि क्या उसने ‘पेगासस’ का इस्तेमाल किया है या नहीं. वास्तव में यह बात लगभग हर शक से परे है कि भाजपा की केंद्र सरकार ने ‘पेगासस’ का इस्तेमाल जासूसी के लिए किया है.

  • पहली बात तो यह है कि ‘पेगासस’ सिर्फ़ सरकारों को ही बेचा जाता है,
  • दूसरा इज़राइल के साथ गहरे सैन्य संबंध होने के कारण भारत सरकार के लिए ‘पेगासस’ हासिल करना आसान ही है और
  • तीसरा ‘पेगासस’ के निशाने पर रहे या अभी तक निशाने पर भारत के नागरिकों की जो सूची मौजूद है, उनकी जासूसी कराने में सबसे बड़ा हित भारत की केंद्र सरकार का ही है.

हर रोज़ ‘पेगासस’ से संबंधित हो रहे खुलासों के दरमियान कोई मोदी भगत ही यह कह सकता है कि इस सबमें केंद्र सरकार बेकसूर है.

निष्कर्ष के तौर पर

वास्तव में ‘पेगासस’ की घटना सरकारों द्वारा अपने विरोधियों की जासूसी कराने का कोई अनोखा मामला नहीं है. एडवर्ड सनोडन, जिसने अमरीकी राज्यसत्ता द्वारा विश्व-स्तर पर की जा रही जासूसी का पर्दाफ़ाश किया था, के अनुसार यह दुनिया-भर में सरकारों द्वारा की जा रही जासूसी का ही एक हिस्सा है. हां, ‘पेगासस प्रोजेक्ट’ ने इतने बड़े स्तर पर खुलासा करके दुनिया-भर में लोगों को सरकारों के पास मौजूद जासूसी के इस हथियार के बारे में जागरूक किया है.

दुनिया-भर की सरकारों द्वारा अपने नागरिकों की जासूसी की संख्या कोई 50 हज़ार की तुच्छ मात्रा नहीं है, बल्कि करोड़ों में है. फे़सबुक, वाट्सएप द्वारा यदि निजी जानकारी को कंपनियों को बेचने को भी जासूसी माना जाए, तो स्मार्टफ़ोन का शायद ही कोई मालिक होगा, जिसकी जासूसी नहीं हो रही. लेकिन लाज़िमी ही सरकारों द्वारा की जाने वाली जासूसी का चरित्र अलग है और हर दिन इसके तरीक़े और इसके ज़रिए इकट्ठा की जा रही जानकारी का इस्तेमाल अधिक भयानक होता जा रहा है.

विश्व अर्थव्यवस्था की ख़स्ता होती हालत दुनिया-भर में और अधिक दमनकारी सरकारों को सत्ता में ला रही है, क्योंकि इस वक़्त ये ही पूंजीपतियों की नीतियों को लागू कर सकते हैं और सरकारों के आगे जासूसी शासन और पुलिस शासन जैसी परिघटनाओं को जन्म दे रही हैं और जासूसी तंत्र अधिक ताक़तवर बनाने की कोशिश की जा रही है.

‘पेगासस’ भी इसी गले-सड़े ढांचे की पैदाइश है और बेशक इसके ख़िलाफ़ निजी रूप से भी हमें सतर्क रहने की ज़रूरत है, लेकिन ऐसी परिघटनाओं के साथ लड़ने का तरीक़ा सिर्फ़ निजी सतर्कता नहीं, बल्कि जनता के सामूहिक संघर्ष हैं, जो इस पूरी व्यवस्था के ख़िलाफ़ केंद्रित होने चाहिए, जो पल-पल ‘पेगासस’ जैसी परिघटनाओं को जन्म देता रहता है.

स्त्रोत – मुक्ति संग्राम

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पैगासस स्पाईवेयर

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