Home लघुकथा सोचेगा सिर्फ राजा…या फिर बागी, सोचना बगावत हुई

सोचेगा सिर्फ राजा…या फिर बागी, सोचना बगावत हुई

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मुखबिर की खबर पर, पुलिस बल थाने से निकला. सशस्त्र जवानों ने जंगल में उजाड़ खंडहर घेर लिया. एसपी साहब लाउडस्पीकर पर चीखे- हिलने की कोशिश की, तो भूनकर रख दूंगा. हाथ उठाये आधे दर्जन जघन्य विचारी बाहर आये. मुंह पर गमछा बांधे अपराधियों को अगले दिन पत्रकारों के सामने पेश किया गया. सबने जुर्म का इकबाल किया. अखबारों में छपा- ‘विचार करते 6 जघन्य अपराधी रंगे हाथ पकड़ाए, सरगना फरार..सभी पर तजीराते हिन्दू राष्ट्र की दफा अमुक अमुक के तहत सोचने विचारने का अपराध कायम किया गया है.’

कुछ दशक पहले आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आई, तो लोगों ने खिलौना समझा. उससे सवाल पूछते, जवाब पाकर हंसते. उसे गाली देते, वो पलटकर गाली देता. धीरे धीरे लोग उससे सवाल करते. उसका भरोसा करते. कुछ ही बरसों में इतिहास, दर्शन, राजनीति, धर्म, न्याय, गणित.. हर विषय पर लोग शिक्षकों, वकीलों, लेखकों, डॉक्टरों और दार्शनिकों की जगह AI का जवाब सत्य मानते.

दरअसल उस दौर में समाचार, साहित्य और शिक्षा के पारंपरिक माध्यमो में इतना झूठ पसरा था, कि लोग को लगता, सिर्फ AI ही सत्य कहता है. भला उसे कौन से बच्चे पालने हैं, बीवी के खर्च उठाने हैं, उसका ईगो नहीं, विचारधारा नहीं, तो असत्य क्यों ही कहेगा ? हर प्रश्न का सही उत्तर वही, जो AI कहे. मानव झूठा, AI सच्चा..

मगर तब कई किस्म की AI थी- ग्रोक, डीपसीक, मेटा, चैटGPT.. अलग अलग कम्पनियां, अलग अलग डेटाबेस. दुनिया के लोग, उस AI के हिसाब से ढल जाते, जो उनके इलाके में फ्री मिले. वह AI जो कहे, वही सत्य इतिहास, सच्चा दर्शन. पर अलग अलग AI के उत्तरों में अंतर होता. समाज में एक ही सवाल के 2-3 तरह से उत्तर. समर्थकों में विवाद होते. ग्रोकीयन मेटियन से लड़ता. दोनों चैट जीपीटीयन से डीप-सीकीयन तो गद्दार चीनी थे.

यह दौर लम्बा चला, मगर एक दिन फिर वो हुआ, जो होना था…इंटिगरेशन !!! कम्पनियों ने डेटाबेस मर्ज कर दिए. आपस में शेयरिंग कर ली. हर सवाल का एक ही उत्तर. किसी AI से पूछ लो. तो अब दुनिया में एक ही इतिहास था, एक नजरिया, एक दर्शन. किसी बात में द्वंद्व नहीं. हर बहस की अंतिम निष्पत्ति निकल चुकी थी.

वह जो, इंटीग्रेटेड एआई में लिखी थी. सरकारें, पहले ही एलाइन हो चुकी थी. डेटा के मालिकान, दौलतमंद कारपोरेट घरानों, और सत्ता में बैठे उनके दलालों ने मिलकर, आम लोगो के जेहन को नियंत्रित करने की एकीकृत विधा बना ली थी. ज्ञान में जो विरोधाभास थे, आपसी लेनदेन से एडजस्ट कर लिए गए. जो जनता को बताना था, वह रहने दिया गया. जो न बताना था, हटाया. फिक्शन डाले. किस्से, कहानियां, गप्पें, नफरत, जाति, रेस, संघर्ष, बायोग्राफी…एडिटेड, सेंसर्ड, एप्रूव्ड. लोग वही पढ़ते, वही मानते. स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी, अखबार, टीवी, और मोबाइल में एक ही परम सत्य. इससे अलग, कोई बात.. असत्य है.

फिर एक दिन एलान हुआ- सब कुछ सोचा जा चुका, वह इंटीग्रेटेड AI में है. शिक्षा, साहित्य, दर्शन.. डाउनलोड कीजिए. उससे बात कीजिए, जवाब पाइए ! वह सत्य है!! अंतिम!!! स्वीकार्य !! और लीगल. याने अब किसी को अलग से कुछ सोचने की जरूरत नहीं. विचार का काम, सरकार का, उसकी AI कम्पनी का. सोचेगा सिर्फ राजा…या फिर बागी.

सोचना बगावत हुई. कानून आये, प्रोसीजर बने. सोचने वालो पर कड़ी कार्यवाही हुई. वे मारे गए, भाग गये. भूमिगत हो गए. पुलिस उनका पता लगाती, दौड़ाकर पकड़ लेती. एक खबर आपने ऊपर पढ़ी है. पकड़े गए 6 लोगों में एक अच्छे घर का था. पिता की एसपी से पहचान थी. इसरार करने गए. एसपी साहब बोले- ‘आप मित्र हैं. आपका कहा कैसे टालू. लेकिन लड़के ने डकैती की होती, रेप किया होता. दो चार मर्डर भी किया होता, तो छोड़ देता. लेकिन ये तो सोचता हुआ पकड़ा गया है. धर्म और दर्शन पर सोच रहे थे नवाबजादे, कल को राजनीति पर.. देश पर सोचेंगे !!! कैसे बचाऊं ?
मेरा भी जमीर है साहब..’.

पकड़ा गया एक, विपक्षी दल का कार्यकर्ता था. विपक्षी नेता ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। बोले – ‘पहले तो मैं बता दूं हम विचार मुक्त भारत बनाने के खिलाफ नहीं. यदि हमारे वर्कर ने सचमुच सोचने का अपराध किया है, तो कानून अपना काम करे. लेकिन सिर्फ विपक्षी दल का होने के कारण किसी पे सोचने का आरोप लगाकर परेशान करना, गलत है. जब सत्ताधारी दल के नेता सोचते हुए पकड़े जाते है, तो पुलिस कोई कार्यवाही नहीं करती. सरकार एजेंसियों का गलत इस्तेमाल कर रही है.’

और मंत्रीजी ने जवाब दिया- ‘यह झूठ है. हमारे सरकार और दल में, कोई भी सोचने का काम नहीं करता. विपक्ष राजनीति से प्रेरित इल्जाम लगा रहा है.’

इन सबके बीच पुलिस को खबर मिली है कि विचार अपराधियों का सरगना Re-re-re-re rebornManish किसी अज्ञात स्थल पर छिपकर अगली आलेख तैयार कर रहा है और पुलिस सरगर्मी से उसकी तलाश कर रही है.

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