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मोदी सरकार और लड़कियों की शादी का उम्र कानून

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मोदी सरकार और लड़कियों की शादी का उम्र कानून

मेरे एक परिचित परिवार का बेटा-बहू और दो छोटे बच्चों (एक लड़का एक लड़की) के साथ दिल्ली कमाने गये. ड्यूटी से लौटते वक्त उनका बेटा एक सरकारी वाहन से कुचलकर मर गया. उसके बेटा के आश्रित पत्नी और दो बच्चों को कोर्ट के आदेश से मुआवजा दिया गया. मुआवजा की राशि को कोर्ट ने तीन भाग में बांटा. दो बड़ा हिस्सा उसके दो अबोध बच्चे के नाम किया गया, बांकी का छोटा हिस्सा मृतक की पत्नी को दिया गया.

दो अबोध बच्चे को दिया गया मुआवजा राशि को कोर्ट के आदेश पर उसके बालिग होने तक फिक्स करा दिया गया. उसकी अबोध बेटी जब 15 वर्ष की होने को आई तब इस महिला ने कोर्ट से आग्रह की कि बेटी के नाम पर फिक्स किया गया पैसा दिया जाये ताकि वह अपनी बेटी की शादी कर सके. कोर्ट ने दो टुक कहा – 18 वर्ष से पहले शादी कतई नहीं करना है. अगर ऐसा करोगी तो जेल भेज देंगे.

कोर्ट के आदेश से डरी वह महिला अपने बेटी के 18 वर्ष होने का इंतजार करने लगी. इसी बीच जब वह 16 साल की भी नहीं हुई थी, एक दिन मुहल्ले के किसी लड़के के साथ विवाह कर भाग गई. कोर्ट और उसकी मां उस लड़की के 18 साल होने का इंतजार करती ही रह गई.

अब जब भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में लड़कियों की शादी की उम्र 21 वर्ष  को कानूनन बना दिया है तब यह सवाल उन तमाम लोगों के सामने मूंह बाये खड़ी हो गई है कि आखिर क्या सोचकर मोदी सरकार ने लड़कियों के शादी की उम्र को बढ़ाया है ? क्या लड़कियों के खिलाफ हो रहे लगातार अपराध को बढ़ाने के लिए ?

कहा जा रहा है कि सरकार मातृत्व मृत्यु दर रेट में कमी लाना चाहती है. तर्क ये भी दिया जा रहा है कि लड़कियों की शादी की उम्र 21 साल करने से उन्हें बेहतर शिक्षा और विकास का भी मौका मिलेगा. लेकिन वस्तुस्थिति कुछ और ही कहती है. अक्ष सेंटर फॉर इक्विटी एंड वेल बीइंग की डायरेक्टर शिरीन जेजीभाय, मैटर्नल हेल्थ, वुमन एजुकेशन, एम्पावरमेंट पर न सिर्फ काम किया है, बल्कि उनके कई रिसर्च पेपर भी इस पर पब्लिश हो चुके हैं, दैनिक भास्कर से बात करते हुए बताती है –

न तो ये व्यावहारिक रूप से सही है और न इससे स्थिति में कोई विशेष फर्क पड़ेगा. भारत में कानून होने के बावजूद लड़कियों के बाल विवाह नहीं रुके हैं, तो इसकी जड़ में कई सामाजिक वजहें हैं. जैसे लड़की की उम्र ज्यादा होने पर ज्यादा दहेज का दबाव, सामाजिक प्रतिष्ठा और उम्र निकलने पर लड़की के लिए अच्छा वर न मिलने का डर होना. ये इतने ताकतवर कारण हैं कि कानून भी अभिभावकों को रोक नहीं पाता इसलिए कानून कितने भी बना दिए जाएं, कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

दरअसल शिक्षा, स्वास्थ्य और गरीबी जैसे मूल मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए ही केन्द्र की मोदी सरकार यह नौटंकी कर रही है. दस्तक पत्रिका ने अपने ताजा अंक के संपादकीय पेज पर इसकी पड़ताल की है, उसे देखना चाहिए, जो यहां प्रस्तुत है –

समाज में लड़कियों की बढ़ी हुई चेतना का ही परिणाम है कि आगामी चुनावों में हर पार्टी के लिए महिला वोटों को भी लुभाना आवश्यक हो गया है. इसके लिए महिलायें और महिला आन्दोलन बधाई का पात्र है. बंगाल विधान सभा चुनाव के परिणामों के बाद से सभी पार्टियों को महिला वोटरों का अलग से महत्व समझ में आने लगा है, जब ‘दीदी ओ दीदी’ के कुख्यात लंपट सम्बोधन के बाद महिला वोटरों ने बीजेपी के खिलाफ मतदान किया और उसकी हार हुई.

महिला वोटरों को ध्यान में रखते हए उत्तर प्रदेश के आगामी विधान सभा चुनावों के लिए कांग्रेस ने जहां ‘लड़की है लड़ सकती है’ का नारा दिया. इसके जवाब में भाजपा ने लड़कियों की शादी की उम्र 21 करने वाला बिल संसद में पेश कर इस पर बहस छेड दी. इस बहस को आगामी लोकसभा चुनावों तक खींचकर भाजपा महिलाओं के सच्चे हितैषी दिखने की पूरी कोशिश करेंगे. यह कानून भले ही ऊपरी तौर पर औरतों को बराबरी देने वाला लग लगता है, लेकिन यह 18 से 21वाले सभी बालिग समुदाय के जनवादी अधिकारों पर हमला है. यह लड़कियों पर होने वाले अपराधों की संख्या में और भी इजाफा करेगा. यह बदलाव बालिगों को मिले कानुनी अधिकारों में ही विसंगति पैदा करती है.

यह बेहद बेवकूफी भरी और हास्यास्पद बात है कि 18 साल से ऊपर वाले हर बालिग व्यक्ति को वोट डालने का, सम्पत्ति हासिल करने का, लाइसेंस हासिल करने का, अपनी मर्जी से सेक्स सम्बन्ध बनाने का, ‘लिव इन रिलेशन’ में रहने सहित, नागरिकों को मिलने वाले सभी अधिकार मिले हैं, सिवाय शादी करने के अधिकार के.

पूरी दुनिया में बालिग होने की उम्र 18 मानी ही गयी है, जिसके बाद किसी व्यक्ति को नागरिक होने के सभी अधिकार मिल जाते हैं, तो हमारे देश में बालिगों के अधिकार पर यह कैंची क्या ? अगर 18 के बाद शारीरिक सम्बन्ध बनाना कानूनी, लेकिन शादी करना गैरकानूनी है, तो इससे लड़कियों के यौन शोषण के साथ गर्भपात के मामले बढ़ेंगे, जो अपने आप में दोहरी हिंसा है.

वास्तव में यह महिलाओं को नियन्त्रित करने वाला बिल है. यह बिल धर्म-जाति को तोड़कर किये जाने वाले प्रेम विवाहों को कुछ समय तक रोकने के मनुवादी मकसद से लाया गया है, जो कि सभी पहलुओं से किसी बालिग नागरिक के अधिकार के अपराधीकरण करने का आपराधिक प्रयास है।

इस बिल द्वारा लड़कियों को लड़कों के समान अधिकार देने का दावा प्रधानमंत्री कर रहे हैं, लेकिन इसके प्रावधानों को ध्यान से पढ़ें, तो यह खुद महिलाओं और पुरुषों के अधिकारों में भेदभाव करने वाला है. इसका एक प्रावधान कहता है कि यदि किसी का बाल विवाह हुआ है, तो वह तो इसे शून्य विवाह घोषित करने के लिए कोर्ट में जा सकते है लेकिन लड़की 20 साल की होने के पहले और लडका 23 साल का होने के पहले. आखिर लड़के को अपना बाल विवाह शून्य घोषित करवाने के लिए लड़कियों से अधिक समय क्यों दिया गया है, लड़के-लड़की में यह भेदभाव क्यों रखा गया है ?

अब बात करते हैं इस दावे की कि इस बिल के आने से लडकियों की उच्च शिक्षा में बढ़ोत्तरी होगी. इस चर्चा के शुरू होते ही मुझे लखीमपुर खीरी की लड़कियां याद आती है, जहां हम टेनी के बेटे द्वारा किसानों पर गाड़ी चढाये जाने की घटना की फैक्ट फाइडिंग के लिए गये थे. वहां लड़कियों से पढ़ाई के बारे में पूछने पर वे कहती थीं जी. पूरी हो गयी पढ़ाई. कितने तक की के जवाब में सभी का जवाब था – 10+2.

बाद में पता चला कि पूरे क्षेत्र में 12वीं के आगे स्कूल ही नहीं है, इसलिए इतने तक की पढ़ाई को ही पूरी पढ़ाई मानकर लड़कियों को व्याह दिया जाता है. यही हाल प्रदेश के ज्यादातर गांवों का है, जहां पढ़ाई की सुविधा न होने के कारण लड़कियों की पढ़ाई छूट जाती है, फिर उनकी शादी कर दी जाती है.

पढाई का नाता शादी से जोड़कर दरअसल सरकार अपना पल्ला तो झाड ही रही है, बल्कि अपनी इस मनुवादी सोच को भी जाहिर कर रही है कि लड़कियों का शिक्षा का जीवन केवल शादी तक ही होता है, उसके बाद सब खत्म. घर गृहस्थी ही उसका परम कर्तव्य है. सरकार इस बिल को लाने का जो तर्क दे रही है, उससे वह लड़कियों और पूरे समाज को इसी सोच के खाके में बांध रही है.

लड़कियों की शिक्षा का सम्बन्ध शादी से नहीं, शिक्षा की व्यवस्था और समाज की मनुवादी पितृसत्तात्मक सोच से है. ये दोनों बदलने से ही लड़कियों की शिक्षा बढ़ सकती है, चाहे उनकी शादी हुई हो न नहीं. शिक्षा व्यवस्था की जगह शादी की उम्र की बहस खड़ी कर वह पूरे नेरटिव को बदल रही है, क्योंकि समाज की पितृसत्तात्मक सोच और शिक्षा व्यवस्था को बदलना सरकार के एजेंडे में शामिल नहीं है. उच्च शिक्षा तो छोड़ दीजिये, आंकड़े बता रहे हैं कि नई शिक्षा नीति और ऑनलाइन शिक्षा के कारण प्राथमिक शिक्षा से भी लड़कियां तेजी से बाहर हो रही है, उनका शादी की उम्र से क्या लेना-देना है ?

शादी की उम्र 18 से 21 करने का लडकियों के जीवन स्तर सुधरने का कोई रिश्ता नहीं है बल्कि यह कानून लड़कियों सहित बालिगों के अधिकारों पर हमला है और लड़कियों पर अपराधों को बढ़ावा देना है.

दूसरी ओर कांग्रेस का नारा ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ भी चुनाव में टिकट दिये जाने तक सीमित है. बेशक इससे समाज में हलचल तो होगी (उतनी ही जितनी महिला प्रधान बनाये जाने से हुई), लेकिन इस सच्चाई को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि यूपीए सरकार में, कांग्रेस शासित राज्यों में ‘जल-जंगल-जमीन’ के लिए लड़ने वाली आन्दोलनकारी महिलाओं के साथ किस तरह का दमन किया गया. लड़ने वाली आदिवासी-दलित औरतों के साथ क्या-किया गया ? वे भी लड़की होकर लड। ही रहीं थीं। कांग्रेस लड़कियों की। लड़ाई को चुनावों तक सीमित रखना चाहती हैं, लड़ाई के सत्ता विरोध तक पहुंचने पर दमन करती है.

नागरिकता आन्दोलन से लेकर किसान आन्दोलन तक ने समाज को अच्छे से जता दिया है कि औरतों के बगैर कोई लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती. चुनावी पार्टियां इसीलिए औरतों को लुभा रही हैं, जिसका सच वे भी जानती हैं. महिलाएं मनुवादी फासीवाद के खिलाफ मोर्चे की मजबूत सिपाही हैं, जी हां वे हर मोर्चे पर लड़ रही हैं.

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