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लुटेरे हैं … तो युद्ध है !

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युद्ध
लुटेरे हैं ….तो युद्ध है !

पागलपन नहीं है युद्ध
क्या पागलपन में जुटाई जाती हैं सेनाएंं
जमा किए जाते हैं असलाह ?

बाज़ार है, और बाज़ार पर कब्ज़ा है
कब्ज़ा है, और कब्ज़े की मारामारी है
मारामारी है … मारामारी की सियासत है
सियासत है और सियासत में युद्ध है..!

लुटेरे हैं … तो सतत ज़ारी है युद्ध
सतत ज़ारी है उनकी सियासत !!

युद्ध है
तो युद्ध के खिलाफ भी हो सकता है – युद्ध.

दुनिया भर के
शोषितों-उत्पीड़ितों की
विराट सेना से बड़ी
कोई सेना नहीं होती .

लुटे – पिटे लोग
जब सड़कों पर होते हैं
तो सीखते है युद्ध !
राजनीतिक सरगर्मियों के बीच
जमा होते जाते हैं उनके भी कई हथियार
कंठस्थ होते जाते हैं दाव-पेंच
लड़ाइयों के कठिन पाठ.

जब लोग पूछने लगते हैं सवाल कि
हमारे बेटे किनके लिए मारे जा रहे हैं
तो वो समझने लगते हैं हित…
कि दरअसल युद्ध किनके हितों के लिए हैं.

सचेत सर्वहाराओं के लश्कर
निश्चय ही ध्वस्त करेंगे –
लुटेरों के छुपने की आखिरी शरणस्थली
पूंजी के गुप्त बंकर तक.

इतिहास गवाह है.

हरामखोरों के मैनेजरों ने
तभी तो भयाक्रांत हो
लगा रखी है हथियारों की होड़
नुमाइश आतंक की
फैला रखा है भय का वातावरण
पूरी दुनिया में
हीस्टीरिया , युद्धोन्माद !

आओ, हम संगठित मुट्ठियांं उठाएंं
चारों तरफ़ से घेरें उन्हें ।
आओ,रूख करें हम अपनी लड़ाई का
सीधा उनकी तरफ
ताकि खदेड़ दी जाए
दोनों तरफ के लुटेरों की सेना
कि फिर कोई युद्ध न हो.

उत्पीड़ितों की सेना को करना ही पड़ेगा –
युद्ध – युद्ध के विरूद्ध !

  • आदित्य कमल

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ROHIT SHARMA

BLOGGER INDIA ‘प्रतिभा एक डायरी’ का उद्देश्य मेहनतकश लोगों की मौजूदा राजनीतिक ताकतों को आत्मसात करना और उनके हितों के लिए प्रतिबद्ध एक नई ताकत पैदा करना है. यह आपकी अपनी आवाज है, इसलिए इसमें प्रकाशित किसी भी आलेख का उपयोग जनहित हेतु किसी भी भाषा, किसी भी रुप में आंशिक या सम्पूर्ण किया जा सकता है. किसी प्रकार की अनुमति लेने की जरूरत नहीं है.

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