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क्या आपको कोरोना कहीं से भी ऐसी महामारी लग रही है ?

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क्या आपको कोरोना कही से भी ऐसी महामारी लग रही है ? दिल्ली को छोड़कर देश 98 प्रतिशत आबादी में मात्र 375 मौतें हुई है. इससे कही ज्यादा मौतें इस दिन टीबी से हुई होगी. तो क्या इसका मतलब यह है कि पूरे देश में पैनिक का माहौल बना दिया जाए जो मीडिया इस वक्त कर रहा है ?

क्या आपको कोरोना कहीं से भी ऐसी महामारी लग रही है ?

सबसे बुरा तब होता है जब लोग – जाने-अनजाने –
अपने भीतर एक क़ैदख़ाना लिये चलने लगते हैं. – नाज़िम हिकमत

गिरीश मालवीय

ये फोटो व्हाट्सएप पर आया है अभी. बता रहे हैं कि ये फ़ोटो कलेक्टर कार्यालय का है, जिनके घरों में शादी है वे लोग सारे काम छोड़कर लोग शादी ब्याह के कार्यक्रम की परमिशन लेने के लिए लाइन में खड़े हुए है. वो ‘कोड़े मारने वालो की संख्या बढ़ा दो’ वाली कहानी सुनी है न आपने ? बिल्कुल वहीं हाल है. वाकई ग़जब का देश है ये, ग़जब के लोग हैं और ग़जब का ही कानून कायदा चल रहा है.

इंदौर मे पिछले दिनों एक बड़े ज्वेलर्स के कुछ कर्मचारियों का कोरोना टेस्ट पॉजिटिव निकला, करीबन 20 कर्मचारी थे जो कोराेना पॉजिटिव मिले. प्रशासन ने कड़ी कार्यवाही करते हुए 7 दिनों के लिये उस ज्वेलर्स के प्रतिष्ठान को ताला डाल कर सील कर दिया. इस बात से मुझे याद आया कि कोरोना काल की शुरुआत में नोएडा में देश के जाने माने न्यूज़ चैनल का ऑफिस के अनेक कर्मचारी भी कोरोना पॉजिटीव पाए गए थे, उस वक्त कोरोना का बहुत जोर था लेकिन उस वक्त तो स्थानीय प्रशासन ने न तो दफ्तर सील किया न कोई प्रतिबंधात्मक कार्यवाही की ! क्या कानून सबके लिए बराबर है ?

‘जब तक महामारी हज़ारों को अपना शिकार बनाती है, तब तक डर लाखों लोगों को अपना शिकार बना चुका होता है.’ यह बात 19वीं शताब्दी के मध्य में, जब हैज़ा और प्लेग से लंदन में हज़ारों लोग मारे गये थे, तब बार-बार कही गयी थी. आज यह बात दुबारा समझने की जरूरत है क्योकि यह युग सूचना क्रांति का युग है. एक नयी बीमारी को महामारी कह कर प्रचारित किया जा रहा है.

आज अगर कुछ सौ लोग मरते हैं तो हजारों नही लाखो भी नही बल्कि करोड़ों लोगो को मीडिया उनकी मौत की खबर सुना कर भयभीत कर देता है. पैनिक मचा देता है. आज यही पैनिक हमे गरीब और गरीब बना रहा है. क्या आठ महीने बाद भी यह बात हम समझ नही पाए हैं ?

कोरोना के दौर की सबसे बुरी बात यह है कि इस दौर में बुद्धिजीवी लोग भी अपने सोचने समझने और विचार करने की शक्ति खो चुके हैं. वे सवाल नही कर रहे. सिर्फ आदेश मान रहे हैं और वो भी ऐसी सरकारों का, जो ऐसे मामलों में कही और से ही ऑपरेट हो रही है.

एक उदाहरण देता हूंं. हफ्ते भर पहले दिल्ली में 7000 के आसपास कोरोना केस निकल रहे थे. अब वे केस आधे रह गए हैं. लगभग 4000 के आसपास ही है तो हमें ये बता कर डराया जा रहा है कि दिल्ली में प्रतिदिन मरने वालों की संख्या बढ़ गयी है. पिछले 4 दिनों से दिल्ली में 125 के आसपास डेली मौतें हो रही है. अब जरा 22 नवम्बर को भारत मे कुल मौतों का आंकड़ा जान लीजिए.

पूरे देश मे कुल 510 मौतें हुई है यानी लगभग एक चौथाई मौतें सिर्फ दिल्ली में हो रही है. इसका दूसरा पहलू यह है अगर आबादी के हिसाब से देखा जाए तो दिल्ली को छोड़कर देश 98 प्रतिशत आबादी में मात्र 375 मौतें हुई है. इससे कही ज्यादा मौतें इस दिन टीबी से हुई होगी. तो क्या इसका मतलब यह है कि पूरे देश में पैनिक का माहौल बना दिया जाए जो मीडिया इस वक्त कर रहा है ?

अब मैं आपको याद दिलाता हूंं कि महामारी क्या होती है ? WHO की परिभाषा सिर्फ यह बताती है कि जिस संक्रामक बीमारी का फैलाव एक निश्चित अवधि में दुनिया के अधिकांश क्षेत्रों में हो जाए, वो महामारी है. लेकिन आम लोगों के लिए महामारी का मतलब मौतों की संख्या से है.

100 साल पहले पिछली बार जब देश में स्पेनिश फ्लू महामारी आई थी तब क्या आप जानते हैं कि भारत में कितने लोग मारे गए थे ? उनकी संख्या थी लगभग 1 करोड़ 80 लाख, यानी उस समय की जनसंख्या का 6 फ़ीसदी. कहते हैं कि कश्मीर की ऊंंचाइयों से लेकर बंगाल के गांंव तक कोई भी इस बीमारी से अछूते नहीं रहे थे.

जॉन बेरी ने अपनी किताब में भारत में इस बीमारी के फैलाव का ब्यौरा देते हुए लिखा है, ‘भारत में लोग ट्रेनों में अच्छे-भले सवार हुए. जब तक वो अपने गंतव्य तक पहुंचते वो या तो मर चुके थे या मरने की कगार पर थे.’

जॉन बेरी को छोड़िए सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जो उस वक्त जवान थे, उन्होंने उस दौर को बहुत करीब से देखा था वे अपनी आत्मकथा कुल्ली भाट में लिखते है-

मैं दालमऊ में गंगा के तट पर खड़ा था. जहांं तक नज़र जाती थी गंगा के पानी में इंसानी लाशें ही लाशें दिखाई देती थी. मेरे ससुराल से ख़बर आई कि मेरी पत्नी मनोहरा देवी भी चल बसी हैं. मेरे भाई का सबसे बड़ा बेटा जो 15 साल का था और मेरी एक साल की बेटी ने भी दम तोड़ दिया था. मेरे परिवार के और भी कई लोग हमेशा के लिए जाते रहे थे. लोगों के दाह संस्कार के लिए लकड़ियांं कम पड़ गई थीं. पलक झपकते ही मेरी परिवार मेरी आंंखों के सामने से ग़ायब हो गया था. मुझे अपने चारों तरफ़ अंंधेरा ही अंंधेरा दिखाई देता था. अख़बारों से पता चला था कि ये सब एक बड़ी महामारी के शिकार हुए थे.

क्या कोरोना कहीं से भी आपको ऐसी महामारी लग रही है ?

इस देश को मीडिया पूरी तरह से अपने हिसाब से चला रहा है. वह जब हल्ला मचाता है तब आपको लगता है कि कोरोना है. वह जब चुपचाप बैठ जाता है, तब आपको लगता है कि कोरोना कहीं भी नहीं है.

नीचे भारत मे मिले डेली न्यू केसेस का कोरोना ग्राफ को जरा ध्यान से देखिए. पिछले एक महीने से नए कोरोना केस लगभग 50 हजार प्रतिदिन से कम है लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म हुए हैं, पिछले 10 -12 दिनों से मीडिया सुबह शाम कोरोना की खबरें दिखा-दिखा कर दहशत कायम कर रहा है. जबकि पूरे भारत मे प्रतिदिन मरीजों की संख्या में कोई भी ऐसा ज्यादा उछाल नहीं है. आज केसेस की संख्या तुलनात्मक रूप में घट रही है.

क्या आपको कोरोना कहीं से भी ऐसी महामारी लग रही है ?

अब इसके ठीक उलट स्थिति देखिए. 16 सितंबर 2020 को देश में रिकार्ड 97 हजार 859 केसेस सामने आए थे. तब मुझे अच्छी तरह से याद है उस वक्त न्यूज़ चेनलों की पट्टी पर यह संख्या सिर्फ स्क्रॉल होती थी और चली जाती थी, लेकिन दिन भर उस पर कोई चर्चा नहीं होती थी. लेकिन पिछले कुछ दिनों से पीक समय से आधे यानी 40-45 हजार केस ही मिल रहे हैं तो न्यूज़ मीडिया अचानक से सक्रिय हो गया है और सुबह शाम चर्चाएं आयोजित कर रहा है. अखबारों की हेडलाइन में कोरोना ही कोरोना है.

इसका क्या मतलब है ? क्या इसका यही नहीं निकलता कि कोई है जो दहशत फैलाना चाहता है ?

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ROHIT SHARMA

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