
रवीश कुमार
भारत के युवा बेवकूफ बनाने वाली कोचिंग फैक्ट्री का मानव संसाधन बनते जा रहे हैं. सरकारी नौकरी है नहीं और इन नौकरियों में सफलता के नाम पर वे अपनी जवानी और घर की पूंजी यहां लुटा रहे हैं. यह वो पढ़ाई है जिसकी एकस्पाइरी डेट पहले से तय होती है. सरकारी नौकरी की उम्र समाप्त होने तक ही आप कोचिंग कर सकते हैं. भारत के युवाओं को केवल कोचिंग वाले बेवकुफ नहीं बना रहे हैं, उन्हें हर स्तर पर बेवकुफ बनाया जा रहा है. जहां जहां उनके सपने उड़कर जा सकते थे, वहां वहां अवैध कब्जा हो गया है. उसके सपनों का आखरी ठिकाना अब बस कोचिंग है.
इसका कारण है कि क्लास में पढ़ाई कुछ होती है और प्रतियोगी परिक्षाओं का कोर्स कुछ और होता है. कॉलेज भी करो और कोचिंग भी करो. इसे ठीक करने के बजाए इसी से सबने समझौता कर लिया है. इसलिए इस भुलावे में नहीं रहना चाहिए कि कोचिंग से कभी मुक्ति मिल जाएगी. जिस देश में शिक्षा के ढ़ांचे का बजट कम होता जा रहा है, वहां आपको कोई और उम्मीद नहीं रखनी चाहिए. जब शिक्षा के संस्थान नहीं खड़े होंगे, तब कोचिंग की अंधेरी और अंतहीन सडक पर ही चलना पड़ेगा.
बजट में 500 टॉप कम्पनियों में इंटर्नशिप दिखाकर रोजगार पैदा करने का जो सपना दिखाया जा रहा है, उस सपने में भी झोल है. जिसकी बात हम इस लेख में करेंगे. आखिर युवा जाएं तो कहा जाएं ? विदेशों में नौकरी का सपना दिखाकर ले जाये जाते हैं और पहुंचा दिये जाते हैं म्यामांर से लेकर कम्बोडिया तक साइबर फ्रॉड के काम में लगाने के लिए. रूस की सेना में गोली खाने के लिए भर्ती कर दिये जाते हैं. ना यहां चैन है, ना वहां चैन है.
सिविल सेवा की तैयारी करने वाले छात्रों का प्रदर्शन जारी है. उनका गुस्सा जायज है. इस गुस्से में केवल अपने साथियों की दर्दनाक मौत नहीं है. बल्कि इन इलाकों में कोचिंग संस्थानों और मकान मालिकों की लूट भी शामिल है. तान्या सोनी, श्रेया यादव, नविन देल्विन की लाइब्रेरी में मौत हो जाये, यह कोई कैसे स्वीकार कर सकता है. लेकिन क्या दिल्ली उनके इस आक्रोश में शामिल है ? दिल्ली को जैसे काठ मार गया है. अब वो ऐसे मौके पर चुप्पी लगा जाती है क्योंकि उससे पता है भीतर के राज कैसे-कैसे हैं.
भारत में शिक्षा का बजट पिछले 20 साल में सबसे कम हुआ. इसका मतलब है युनिवर्सिटियां अब और रद्दी होंगी, जिसका मतलब यह होगा कि नौकरी की तलाश में या कोर्स पूरा करने के लिए युवाओं की भीड़ कोचिंग सेंटर की तरफ बढ़ती चली जाएगी. जनता के पैसे से चलने वाली युनिवर्सिटी केवल अपने लोगों को वी. सी. और लेक्चरर बनाने के काम आ रही है. इस सच्चाई को यहां देख रहा एक-एक छात्र जानता है इसलिए उसके गुस्से में केवल एक ही बात का गुस्सा नहीं है कि तीन छात्रों की लाइब्रेरी में डूबने से मौत हो गई. कारवाई होगी, बस इतनी कि लगे कि हुई है, उसके बाद सब वैसे ही चलेगा, जैसे चलता रहा है.
कोचिंग सिस्टम को लेकर जितना भी गुस्सा हो, मगर अभी यही मान्य सिस्टम बन चुका है, इसी में नेताओं के बच्चे पढ़ते हैं, इसी में IAS, IPS, IFS रिटायर होकर पढ़ाने जाते हैं, मॉडल बन जाते हैं, वे भी कोचिंग के ब्रैंड एम्बेसिडर हैं और बड़ी बड़ी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर भी कोचिंग के ब्रैंड एम्बेसिडर हैं. सरकार शिक्षा का बज़ट घटा रही है और आम जनता की शिक्षा का बज़ट बढ़ता जा रहा है. स्कूल से लेकर कॉलेज और कोचिंग से लेकर टीशन तक का बज़ट कितना बढ़ चुका है. लेकिन सरकार के लोग शिक्षा के भारतीयकरण के नाम पर पूरे देश का टाइम खराब कर रहे हैं.
बज़ट के समय कितनी बड़ी हेडलाइन बनी कि 500 कंपनियों में इंटर्नशिप का मौका मिलेगा. आपने सोचा कि भारत में करीब 25 लाख कंपनियां हैं और लोकसभा में वित्तमंत्री घोषणा करती है 500 कंपनियों में इंटर्नशिप की व्यवस्था की जाएगी. कहां तो 20-25 लाख कंपनियां और कहां 500 कंपनियां ? ठीक है मैं गणित में कमजोर हूं लेकिन क्या सारा देश मैथ्स में मूर्ख हो गया है ? किसी ने पूछा क्यों नहीं कि भारत के युवाओं की ज़रूरतें क्या इन 500 कंपनियों से पूरी हो जाएगी ?
घोषणा करते वक्त तो वित्तमंत्री ने ऐसे एलान किया जैसे कोई बड़ी क्रांतिकारी योजना लेकर आई है. लेकिन बाद में अखबारों से कहने लग गई कि किसी भी कंपनी से जोर जबरदस्ती नहीं की जाएगी, उनसे कहा जाएगा कि वे छात्रों को इंटर्नशिप पर रखें. जैसे इन कंपनियों को इंटर्न पर रखने का आईडिया नहीं मालूम ? वित्तमंत्री अपने कार्यकाल के छठे वर्ष में इन्हें इंटर्नशिप करना सिखाएगी. आखिर बजट पेश होते ही वित्त मंत्रालयों के अधिकारी ‘नज’ का इस्तेमाल क्यों करने लगे ? हिंदी मतलब यही हुआ कि प्रेरित करेंगे, गुजारिश करेंगे कि कंपनियां युवाओं को इंटरनशिप पर रखे.
वित्त सचिव बी. बी. सोमनाथन का बयान छपा है कि कंपनियों से कहा जायेगा आप मशीनों का इस्तेमाल कम करे, लेबर का ज्यादा करें. इसके लिए नज किया जायेगा, नज. कमाल है. और इनके नज करने से कंपनियां ‘ऑटोमेशन’ और ‘एआई’ छोड़ देगी ! इस तरह से बातें घुमाई जा रही है. वैसे ‘नज’ का सटीक मतलब होगा हल्का सा कोहनी से धक्का देना. यह ‘नज’ थ्योरी के जो जन्मदाता हैं वे हैं रिचर्ड थेलर, शिकागो यूनिवर्सिटी के हैं, इन्हें नोबेल पुरस्कार मिल चुका है.
घोषणा के समय वितमंत्री कहती है कॉंप्रिहेंसिव स्कीम लांच करेंगी यानी समग्र रूप से एक योजना लांच होने वाली है लेकिन बाद में कहती है अनुनय विनय किया जाएगा. कम्पनियों से गुजारिश की जाएगी. वन्दना की जाएगी. हम पैसे देंगे. नज करेंगे, नज. विपक्ष ने सवाल उठाना शुरू कर दिया है कि 99% जो हमारे युवा हैं उनको इस इंटर्नशिप प्रोग्राम से कुछ लेना देना नहीं. कोई फायदा नहीं होने वाला है. तो आपने पहले टांग तोड़ दी और उसके उपर आप बेंडेड लगाने की कोशिश कर रहे हैं. आप क्या दे रहे हैं ? आप और मुझे तो ये लगता है कि जो वर्क फोर्स आप बना रहे हैं, ट्रेनिंग दे करके सरकार के पैसे से अंततोगत्वा इनको भी एक्स्प्रॉइट वही लोग करेंगे. उद्योगपति आखिरकार जब इतनी टेक्निकल, इतनी ट्रेन फोर्स होगी तो आप ये मुझे बताईए कि उसके भविष्य क्या होगा ? अगर इतने बड़े पैमाने पर आप ट्रेनिंग करा रहे हो, सरकार का बजट उसमें खर्च हो रहा है तो सभापति महोदय, उनका भविष्य से क्या होगा ?
मीडिया और सोशल मीडिया में एक विधेयक की काफी चर्चा हो रही है. सरकार यूट्यूबर और इंटरनेट पर अपनी बात कहने वाले लोगों का गला घोटने के लिए एक विधेयक पर काम कर रही है कि कैसे बोलने की आजादी खत्म की जाए, इसका जुगार खोजा जा रहा है. बचे खुचे 10-20 पत्रकारों और यूट्यूबर की पेट पर लाथ मारने के लिए, उनकी आवाज बंद करने के लिए अफसर कानून ड्राफ्ट करने में लगे हैं लेकिन रोजगार के मामले में सरकार को याद नहीं आता कि कैसे कानून बनाने हैं. कानून बन जाता तब जाकर घोषणा होती कि 500 कम्पनियां इंटर्नशिप देगी और सरकार पैसा देगी. आखों में धूल नहीं बल्कि धूल में ही देश की आखें झोंक दी गई है.
देश के नौजवान सरकार अब लाइब्रेरी नहीं खोलती है. लाइब्रेरी में सुरक्षा के इंटजाम पूरे हो जाएंगे, नियमों का पालन होने लग जाएगा, ड्रेनेज किसकी वज़ह से साफ नहीं हुआ, उपराज्जपाल मंत्री को दोष दे रहे है लेकिन लाइब्रेरी अवैध रूप से खोली जा रही है इसी राजधानी में. अवैध ही इस देश का वैध रास्ता बन चुका है. अब बारात घर के उपर ही लाइब्रेरी बनवा दीजिए और किराया कम हो तो छात्रों को कुछ राहत दे दीजिये. लाइब्रेरी के लिए इसी शहर में लंबी-लंबी दूरी की यात्राएं छात्र तय करते हैं. अगर दिल्ली को लाइब्रेरी की इतनी बड़ी जरूरत थी तो क्या दिल्ली में आपने राजनीति को, राजनितिक दलों को लाइब्रेरी के बारे में बात करते सुना ? राजनीति कर क्या रही थी ?
दस साल तक घर-घर झडा फहराने का अभियान, मिडल क्लास से थाली बजवाने, फोन के टॉर्च जलाने का अभियान, बालकनी में दिया जलवाने का अभियान, सोसाइटी-सोसाइटी अक्षत बंटवाने के अभियान में देश की राजनीति लगी हुई थी ? लेकिन इससे बेरोजगारी और खराब शिक्षा की हालत कब तक छिपी रह पाती. दस साल में देश की व्यवस्था और अर्थ व्यवस्था का हाल आज नहीं तो कल सब के सामने आना ही था. मिठाई और पढ़ाई की दुकान में अंतर ही नजर नहीं आएगा. यहां इतने बोर्ड लगे हैं कि तय करना मुश्किल हो जाएगा कि इसमें पढ़ने से फायदा होगा और कौन ठग लेगा.
इन कोचिंग संस्थानों में एडमिशन लेते समय छात्र कितना रिस्क लेते हैं. एक बार फंस गए तो निकल नहीं पाएंगे. भारत की शिक्षा व्यवस्था दस साल में और खराब हुई है और कोचिंग व्यवस्था का इन दस वर्षों में और विस्तार हुआ है. छात्रों को पता है कि कोचिंग उनके लिए लास्ट चांस है. कोचिंग के आसपास के मकानों का किराया भी काफी मंहगा होता जा रहा है. इसकी वज़ह से दिल्ली को कितनी आमदनी हो रही है लेकिन सुरक्षा और इंतजाम जीरो. इन मुहल्लों में आईएएस बनने का सपना तो देख सकते हैं लेकिन इस व्यवस्था की खराबी को ठीक नहीं कर सकते और ना ये होने वाला है.
हमारे युवा युनिवर्सिटी के पतन से पलायन कर कोचिंग में शरण ले रहे थे और अब पतन और लूट का पहाड यहां भी बड़ा हो चुका है. कभी आपने सोचा कि ये विश्व गुरू क्या होता है ? खुद तो आप कोचिंग कोचिंग भटक रहे हैं और चले हैं विश्व गुरू बनवाने. ये विश्व गुरू कुछ फ्रॉड लोगों का आईडिया है, जिसकी जाल में आप सभी फंस गए हैं. अब तो कोचिंग सेंटर भी कॉलेज यूनिवर्सिटी का स्थान ले चुके हैं. उनसे भी मंहगे हैं. कोचिंग सेंटर में एड्मिशन पाने के लिए परिक्षाएं हो रहे हैं.
ये हालत है सरकारें अब कोचिंग कराने के लिए योजनायें ला रहे हैं. परीक्षा की तैयारी के लिए हॉस्टल खोले जा रहे हैं. पूरा तंत्र कोचिंग की जाल में फंस गया है. केरल के सिविल सर्विस एकेडमी का वेबसाइट देखिए. सरकारी एकेडमी 2005 से चल रही है. इसका काम राष्ट्रीय स्तर की अलग अलग प्रतियोगी परिक्षाओं के लिए युवाओं को कोचिंग देना है. आम आदमी पार्टी ने भी फ्री कोचिंग योजना लाउंच की है. जय भीम मुख्यमंत्री प्रतिभा विकास योजना इसके तहत UPSC से लेकर NEET तक की कोचिंग मुफ्त में कराई जा रही है. जामिया मिलिया इसलामिया की Residential Coaching Academy में UPSC कोचिंग मुफ्त में दी जाती है. इसकी अपनी चयन प्रक्रिया होती है.
झारखंड में भी मुख्यमंत्री शिक्षा प्रतिभा योजना है जो कोचिंग की फ्री सुविधाएं देती है. यहां तक की दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेज भी अपनी पढ़ाई से अलग छात्रों को कोचिंग करवा रहे हैं. 2022 की ‘Economic Times’ की एक खबर है कि D.U. के हंसराज कॉलेज ने निजी कोचिंग संस्थान बीकन आयेस के साथ मिलकर आयेस की कोचिंग शुरू की है. तीन साल के कोर्स की फीस 75,000 से 1.5 लाख तक बताई गई है.
स्वामी श्रद्धा नंद कोलेज ने भी ऐसी कोचिंग शुरू करने की बात की थी. हलांकि तब विश्व विद्यालय प्रशासन ने कहा था कॉलेज ऐसा ऐलान नहीं कर सकते हैं. इस कोचिंग का अब कोई विकल्प नहीं बचा है. कोचिंग को लेकर नैतिक अनैतिक होने से कोई फायदा नहीं है. यही तो होता है भारत में हर खराबी इतनी बड़ी कर दी जाती है कि आप तय नहीं कर पाते, उसे स्वीकार करना पड़ जाता है.
यह भी उम्मीद बेकार है कि कोचिंग सिस्टम के भीतर का सिस्टम पारदर्शी होगा. उनकी कमाई की अकाउंटिंग सही होगी, टैक्स सही तरीके से लगेगा. आखिर बिना बिल के किराया कैसे लिया जा रहा है ? कोचिंग के कारोबार में अपने अपने घपले हैं. झूठे दावे तक किये जाते हैं. एक बार कई कोचिंग संस्थानों पर फाइन भी लग चुकी है. जुलाई 2020 में Consumer Protection Act, 2019 के तहत संस्था Central Consumer Protection Authority की स्थापना की गई. हमने इनकी वेबसाइट पर जा कर देखा तो वहां कोचिंग संस्थानों के झूठे दावों के उपर जांच और फिर जुर्माने की कारवाई के कई आदेश मिले.
पिछले साल झूठे और भरमाने वाले दावे को लेकर कई कोचिंग संस्थानों जैसे Khan Study Group पर पांच लाख, Chahal Academy पर एक लाख, Byju’s IAS पर दस लाख और Rao IAS पर एक लाख का जुर्माना लग चुका है. अथारिटी द्वारा उन्हें फौरन अपने ऐसे झांसा देने वाले विज्ञापन हटाने को कहा गया है. ये सब खबरों में भी आता है लेकिन कोचिंग का कारोबार चलता रहता है. सवाल है कि कोचिंग वाले नियम कानुन से उपर क्यों लगते हैं ? इन नियमों के आधार पर इनकी जबाबदेही तय क्यों नहीं की जाती है ? क्या कोई सरकार अब इन कोचिंग संस्थानों के भीतर जाकर चेक कर सकती है ? इनके हिसाब किताब की जांच हो सकती है ?
देश के हर शहर में कोचिंग सेंटर का जाल बजबजा रहा है. वहां भी यही हाल है. मामुली अंग्रेजी सिखाने के लिए इस देश में कोचिंग पर लोग लाखों रुपय खर्च कर रहे हैं. यही वो चक्रव्यूह है जिसमें हम सब फंस चुके हैं. एक बात बताता हूं. बड़े बड़े प्रोफेसर अपना सारा जीवन खपा देते हैं एक विषय का अध्ययन करने में. वो सब इन दिनों पब्लिक स्पेज से गायब कर दिये गए हैं. यहां कोचिंग वाला एक फ्रॉड हर विषय पर मीडिया में आकर इंटरव्यू दे रहा है. उसे हीरो की तरह पेश किया जाता है. वो हर विषय पर, हर नेता पर बोलता है.
एक पंक्ति में धर्म का विद्वान अगली पंक्ति में राजनिती का और उसकी अगली पंक्ति में भारतीयता संजाने लग जाता है. और यही नहीं अपने ही प्रोफेसर को प्रमाण पत्र बांटने लग जाता है. और प्रोफेसर साहब का पतन देखिए, उनके मुझसे अपनी तारीफ सुनकर मुरझाने लग जाते हैं, कुमलाने लग जाते हैं. तो इस पतन के चक्रव्यूह को कोई तोड नहीं सकता.
कोचिंग ही विश्वगुरू का भविष्य है. भारत के नौजवानों से दस साल से एक बात कह रहा हूं. आप कुछ भी कर लीजिए, आपकी जवानी की कोई कहानी नहीं है. अच्छी बात है कि नौजवान प्रदर्शन कर रहे हैं. इन्हीं प्रदर्शनों से उम्मीद निकलती है लेकिन उम्मीदें हवा में पैदा नहीं होती. उनका ये आंदोलन भी उसी सुरंग पर जाकर खत्म होगा, जहां उन महिला पहलबानों का खत्म हुआ था. पांच महीने तक जंतर मंतर पर इसी दिल्ली में महिला पहलबान धरने पर बैठी रही. हार गई, हताश हो गए, कुश्ती छोड़ गई. मेडल तक गंगा में फेकने चली गई. कुछ हुआ, कुछ नहीं हुआ. तो आपने कैसे सोच लिया कि अब आपके मामले में हो जाएगा ? लेकिन आप कोशिश कर सकते हैं.
अच्छी बात है, कर रहे हैं. रवी मॉन तो लाइब्रेरी में नहीं मरा लेकिन उसकी बेरोज़गारी नौकरी के लिए रूस ले गई, जहां उसे जेल का भय दिखा कर रूस की सेना में ठेल दिया गया. यह कहकर कि एक साल सेना में काम करो, फिर मुक्ति मिलेगी. रवी मॉन यूक्रेन की गोली से रूस के लिए लड़ते हुए मारा गया है. The Times में इसकी खबर छपी है. रवी मॉन ने मरते वक क्या ‘भारत माता की जय’ कहा होगा, या ‘मास्को डैड़ी’ का नारा लगाया होगा ? इन्हें दो लाख रुपये महिने की नौकरी और रवी मॉन पांचवां भारतीय यूथ है जो रूस की सेना में जबरन ठेला गया और रूस के लिए लड़ते हुए मारा गया.
रवी मॉन है तो भारतीय, लेकिन क्या रवी को शहीद कहा जाएगा ? किस का शहीद कहेंगे ? रवी मॉन की मौत, राष्टवाद टाइप के फर्जीवाड़े की पोल खोलती है. आप इसकी मौत को, किस राष्ट्र के खांचे में रखेंगे ? रूस गये थे प्रधानमंत्री मोदी, राष्ट्रपति पुतिन से मुलकात हुई. प्राइविट डिनर कर रहे थे, उसी में बातचीत हुई. और खबरें छप गये कि बात हो गई है कि रूस की सेना में काम कर रहे युवाओं को वापस लटाया जाएगा. हेडलाइन छपने की बेचैनी शांत हुई और देश भूल गया.
‘द हिंदु’ में सुहासनी हैदर ने कहा है कि या एक ऐसा फैसला था, जिसकी औपचारिक घोषणा हुई ही नहीं. हिंदु की इस खबर में, तब के विदेश सचिव विने क्वात्रा का बयान है, कि प्रधानमंत्री मोदी ने तो साफ साफ कह दिया, कि वे चाहते हैं कि रूस की सेना में काम कर रहे हैं, सभी भारतीयों को वापस किया जाए, अब खबर आई है कि रवी मौन यूक्रेन की गोली से मारा गया. असदुदी नोवैसी के सवाल उठाने के बाद विदेश मंत्रालय ने कहा कि जिन 9-10 भारतीय सेनिकों ने भारतीय दूतावास से सीधे संपर्क किया, वो दूतावास के हस्तक्षेप के बाद भारत वापस भेज़ दिये गए हैं. विदेश मंत्रालय भी आम बोलचाल की भाषा में 9-10 कह रहा है.
क्या अधिकारिक बयान इस तरह से दिये जाएंगे ? 9-10, 9 लोग वापस भेज़ी गए हैं या 10 ? भारतीय नागरिक हैं लेकिन इनकी गिनती इस तरह से बताई जा रही है. इसी संदर्भ में श्रीनिवास सन्याला की एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट को देखना ज़रूरी है. श्रीनिवास सन्याला की 11 जुलाई की इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट ज़रूरी सवाल उठाती है कि जो लोग अभी रूस में हैं, उनके परिवार मांग कर रहे हैं लेकिन उन्हें ले जाया जाता है म्यांमार और कम्बोडिया, जहां उनसे साइबर फ्रॉड का काम कराया जा रहा है. इसी ने ट्वीट कर जानकारी दी है कि रूसी सेना में काम करते हुए जिन चार भारतीयों की मौत हुई है, उनके परिवारों को रूस की ओर से मुआवजा दिया गया है और नागरिकता का ऑफर मिला है. जो भारतीय अभी भी रूसी सेना में हैं उन्हें कागजी करवाई पूरी होने के बाद भेजा जाएगा. इस बीच पांचवें भारतीय युवा की मौत की खबर है.
ये कैसे हो रहा है ? कैसे युवाओं की फर्जी दस्तावेजों पर मानव तस्करी हो रही है और वे अपराधी बनाए जा रहे हैं. जो देश में हैं वो असुरक्षित जगहों पर रहने और पढ़ने के लिए मजबूर हैं. और जो सक्षम हैं वो अच्छी युनिवर्सिटी और नौकरी की तलाश में विदेश भाग रहे हैं. अच्छा कर रहे हैं तुरंत ही भारत छोड़ दे रहे हैं. इतनी बेचैनी. लेकिन इनमें उनके बच्चे भी हैं जो सोसाईटी के गेट पर चैट कर ह्वाट्सएप ग्रूप में धर्म के नाम पर दिनरात जहर फैला रहे होते हैं. दिल्ली में तीन छात्रों की मौत बहस में उलझा दी गई है. बहस में ही उलझी रहेगी. छात्रों को भी एक दिन पढ़ने जाना है. सिस्टम को पता है. बस उसी एक दिन का इंतजार है.
- यह लेख रवीश कुमार के वीडियो के आधार पर है. किसी सवाल खड़े होने पर स्पष्टीकरण के लिए रवीश कुमार का विडियो देंखे. विडियो का लिंक यहां है.
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