Home कविताएं आज बचेंगे तो कल सहर देखेंगे

आज बचेंगे तो कल सहर देखेंगे

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कुछ लोग मुझे इसलिए छोड़े
कि मैं उनके जैसा
उनके जितना उतना अच्छा नहीं था
वे लोग मुझे ज्यादा छोड़े
जो बहुत ज्यादा अच्छा थे

उस पीपल पेड़ के नीचे बैठ, लेकिन
मैं यही जाना कि सच्चा होना
अच्छा होना नहीं होता
लेकिन साथ ही यह भी जाना
अच्छा नहीं होने के डर से
सच्चा नहीं होना भी अच्छा नहीं होता

जो खुद शीशा तोड़ते हैं
वही उंगली कटने का इल्जाम
शीशों पर मढ़ते रहे हैं

उन्हें मैं क्या कहूं
उन्हें मैं यही कहूं
मधुमेह में करेला खाना अच्छा रहता है
एक ग्लास नीम का जूस
खून माफ तो नहीं करता
खून साफ जरुर कर देता है

कुछ में दैवीय प्रतिभा होती है
झूठ पर कालजयी कविता लिख कर भी
कालजयी कालपुरुष बन जाते हैं
नवरत्नों में और सप्तर्षियों में जगह पा लेते हैं

अकबर इलाहाबादी इश्क पर ज़ोर देते हैं और
एक मैं हूं इस चौराहे पर खड़ा
कब से आग आग चिल्ला रहा हूं
न लोग सुनते हैं, न दमकल आती है
मैं इसे किसी तरह किसी की आरामतलबी नहीं कहूंगा

ऐसे भी सार्वजनिक क्षेत्र की परिसंपत्तियां बिकने को हैं
नाम में क्या है विमुद्रीकरण कहो या विनिवेश
या बपौती का एहसानफ़रामोश ऐश

हाड़ कंपाती इस भीषण ठंड में बेहतर है
घर की छपरी जो फिल्हाल वही मेरे पास है
पहले जला लेते हैं

आज बचेंगे तो कल सहर देखेंगे

मुझे लगता है
चंदन टीका लगाना
दाढ़ी बढ़ाना
दीवारों को विशेष रंग से
रंग रोगन कर नया नाम देना
गंगा की विशेष आरती में
शामिल होना
ज्यादा अच्छा है
बनिस्बत उस सच के बोलने और उस सच के स्वीकारने के

शायद, अब आप समझ रहे होंगे
फिर भी, आम से अलग, आप
खास अमरूद होना क्यों चाहते हैं

  • राम प्रसाद यादव

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