Home कविताएं एक विद्रोही की अंतिम कविता

एक विद्रोही की अंतिम कविता

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मैं ता उम्र पानी के घर में रहा
यहांं
सांंसें लेने के लिए जद्दोजहद नहीं करनी पड़ी
मैं डूबूरी था अकपट
नाचघरों और शराबखानों से लदे हुए बाजरे
रोशनी फैलाती रही मेरे घर की
बाहरी दीवारों पर

मैं ता उम्र घसकटवा रहा
कठिन समय के उच्छिष्ट
दरकती मिट्टी के फ़र्श पर जब जब उगे
उनको हटाता गया मैं

और जलकुंभियांं
क़ानून की धाराओं की तरह
हमेशा मेरे स्वच्छंद तैरने के विरुद्ध

जिंदगी
दो उंंगलियों के बीच फंसी हुई
सस्ती बीड़ी रही
आवेश में लंबी टान से और भी सुलगती

जब जब बिना किवाड़ों के छतों के नीचे पलते
सरकंडों की बहस
शहर के कॉफी हाऊस तक पहुंंचा
आदमकद पोस्टर का एक हिस्सा
कहीं कट कर उड़ गया
वैचारिक आंंधी में

उन रातों को
नींद नहीं आती थी
बारहा तुम्हारा चेहरा याद आता था
चावल के दाने पर
रामायण और क़ुरान लिख कर
गिनीज़ बुक में नाम लिखाने वालों की दौड़ में
मैं शामिल नहीं हो सका

इसलिए
लोग मुझे गादा बंदूक़ समझ कर
राष्ट्रीय अभिलेखागार की दीवारों पर
लटका आए हैं
दस रुपए के टिकट पर छिट पुट आते
दर्शकों के लिए

वे नहीं जानते
बंदूक़ नई या पुरानी हो सकती है
बारूद शाश्वत है
मिट्टी की कोख से जना हुआ
कुछ भी बूढ़ा नहीं होता
पानी के घर में रहने वाला कोई भी
हवा के बगैर नहीं मरता

  • सुब्रतो चटर्जी

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