'यदि आप गरीबी, भुखमरी के विरुद्ध आवाज उठाएंगे तो आप अर्बन नक्सल कहे जायेंगे. यदि आप अल्पसंख्यकों के दमन के विरुद्ध बोलेंगे तो आतंकवादी कहे जायेंगे. यदि आप दलित उत्पीड़न, जाति, छुआछूत पर बोलेंगे तो भीमटे कहे जायेंगे. यदि जल, जंगल, जमीन की बात करेंगे तो माओवादी कहे जायेंगे. और यदि आप इनमें से कुछ नहीं कहे जाते हैं तो यकीं मानिये आप एक मुर्दा इंसान हैं.' - आभा शुक्ला
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कविताएं

प्रतिध्वनियां

ज़रा सा जो याद रह जाता है वह होता है ढेर सारा प्यार वही प्यार जिसे मेरे नंगे पैरों को घास भूमि ने दिया झुरमुट में थक कर सोते हुए मुझे हरी शाख़ों के पंखों ने दिया जलती हुई आंखों को ओस कणों ने दिया रतजगा के बाद बारूद, पसीने और गर्द में लिपटे मेरे क्षत विक्षत शरीर को और …

पोस्टमार्टम

करंज के पेड़ों से लटके हुए शव हैं या अज्ञातवास में जीते पांडवों के हथियार पौरुष जब परिस्थितियों का स्वैच्छिक ग़ुलाम हो तो तय करेगा कौन मेरे साए में समाते हुए तुम्हारे साए ने कई बार कहा मुझसे बहुत रात हो चुकी है सो जाओ बिस्तर मुझे चुंबक की तरह खींचता है और लिखने की मेज़ किसी विग्रह की तरह …

नागार्जुन के जन्मदिन पर : हरिजन गाथा

(एक) ऐसा तो कभी नहीं हुआ था ! महसूस करने लगीं वे एक अनोखी बेचैनी एक अपूर्व आकुलता उनकी गर्भकुक्षियों के अन्दर बार-बार उठने लगी टीसें लगाने लगे दौड़ उनके भ्रूण अंदर ही अंदर ऐसा तो कभी नहीं हुआ था ऐसा तो कभी नहीं हुआ था कि हरिजन-माताएं अपने भ्रूणों के जनकों को खो चुकी हों एक पैशाचिक दुष्कांड में …

अदिति…

धीरे धीरे मेरी बांई आंख की रोशनी जा रही है मेरी वामा अब दक्षिणावर्त है सूर्य के उत्तरायण होने का इंतज़ार अब नहीं है मुझे इच्छा मृत्यु से श्रापित कोई भीष्म नहीं हूं मैं मैं आज भी तुम्हारे सोते हुए संपृक्त चेहरे से प्यार करता हूं अदिति मेरे नाक की लंबाई समुद्र तल से बहुत अधिक है मैं आज भी …

सबूत नहीं मिले

हत्यारे के ख़ून से सने हाथों में आप मसले हुए गुलाब की लाली भी देख सकते हैं ज़मीन पर पड़े ख़ून के थक्के आपको किसी क्षय रोगी का बलगम भी समझ सकते हैं इसी तरह बलात्कार को आपसी सहमति से किया गया नियोग भी समझ सकते हैं आप माई बाप हैं हुज़ूर आपकी समझ तक पहुँच पाना साधारण लोगों के …

उसे गोली मार दी गई…

वह छः महीने की बच्ची थी उसका सबसे बड़ा दोष था आदिवासी घरों में पैदा होना वह भूख लगने पर जोर से या आहिस्ता से रोयी थी उसे मां दुध पिलाती उससे पहले गोली मार दी गई इस तरह शांत कर दी गई सत्ता द्वारा बच्ची के पेट की भूख. बच्ची की मां की चीख जंगल में गूंज उठी दिल्ली …

शब्द भेदी सन्नाटा

समय के घुंघराले बालों में जूंएं बीनते हुए कभी कांपीं नहीं उंगलियां मेरी वीभत्स का उपचार क्षणिक आवेश में नहीं होता आदमी जब लुढ़क जाता है सतह पर भुने हुए चने की तरह रौंदें जाने का डर सबसे ज़्यादा उसी समय होता है दांत पीसने की ह्रिंसता ज़रूरी है भोजन को सुपाच्य बनाने के लिए ऐसे में तुम्हें टुकड़ों में …

मानसून

मानसून नज़दीक है छत में रिसाव दीवार में दरार है लाचारी अकेली इस साल की नहीं हर साल की है लेदर ठीक है, मगर गमबूट ज़्यादा ठीक रहेगा अच्छी बात है गैस सस्ती हो गई लकड़ियां रखने की जगह मिल गई और भीगने से बच गई अच्छा नहीं लगता कि बेजान ज़िंदगी को उधार की ज़िंदगी कहें बगुलों में फिर …

विद्रोह

यहां पूजे जाते हैं लिंग और.. योनियों में ठूंस दी जाती है मोमबत्तियां… प्लास्टिक की बोतले कंकड़ पत्थर लोहे की सलाखें तलक…. चीर दिया जाता है गर्भ कर दी जाती है बोटी-बोटी अजन्मे भ्रूण की और भालो पर उछाला जाता है दूधमुंहा नवजात दौड़ाया जाता है जिस्म कर नंगा सरेबाजार बता डायन खींच ली जाती है सलवार और बना देवदासी …

चीख

इधर कई दिनों से रात में तारे गिनते रहते हैं नींद नहीं आती पता नहीं जब भी सोने का कोशिश करते हैं तो चीख सोने नहीं देती कहीं कोई भूख से विलप रहा उसकी सिसकियां मेरे कानों तक पहुंच जाती हैं मन सिहर उठता है कभी अपने स्कूटर से निकलते हुए सामने से आती हुई औरत चेहरा मुरझाया हुआ उनके …

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