ज़रा सा जो याद रह जाता है वह होता है ढेर सारा प्यार वही प्यार जिसे मेरे नंगे पैरों को घास भूमि ने दिया झुरमुट में थक कर सोते हुए मुझे हरी शाख़ों के पंखों ने दिया जलती हुई आंखों को ओस कणों ने दिया रतजगा के बाद बारूद, पसीने और गर्द में लिपटे मेरे क्षत विक्षत शरीर को और …
प्रतिध्वनियां
