'यदि आप गरीबी, भुखमरी के विरुद्ध आवाज उठाएंगे तो आप अर्बन नक्सल कहे जायेंगे. यदि आप अल्पसंख्यकों के दमन के विरुद्ध बोलेंगे तो आतंकवादी कहे जायेंगे. यदि आप दलित उत्पीड़न, जाति, छुआछूत पर बोलेंगे तो भीमटे कहे जायेंगे. यदि जल, जंगल, जमीन की बात करेंगे तो माओवादी कहे जायेंगे. और यदि आप इनमें से कुछ नहीं कहे जाते हैं तो यकीं मानिये आप एक मुर्दा इंसान हैं.' - आभा शुक्ला
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कविताएं

लॉकडाउन अच्छा है

कल सुबह सूनी सड़क पर, एक गाड़ी में डाली गई थीं कुछ ज़िंदा लाशें, कहते हैं उन्हें भेजना था, 380 किमी दूर किसी होटल में, थानेदार ने पकड़ा, थाने में बिठाया एक रसूखदार बड़े ‘भाई साहब’, कई अमीर, पत्रकार, नेताजी के नकाब उतरे, एक ‘भाई साहब’ ने फ़ोन घुमाया, ‘बड़े भाई साहब’ को छोड़ने का आदेश दिया, बात नहीं बनी, …

कौन उजाड़ता है इन्हें ?

वो जो भटकते रहे उम्र भर, बना दिए गए अपने ही देश में शरणार्थी. जिनकी गर्दन पर रखी है तलवार सैन्यवाद की वो जो कूद गए मुक्ति संग्राम में, लड़ पड़े प्रतिरोध की कसम लिए जिन्हें गुजरना पड़ा अन्तहीन जेल यात्राओं से, जिनके साथ चलता रहा सिलसिला नज़रबंदी का. वो जो गिरफ्तार कर लिए गए क्रांतिकारी साहित्य रखने के जुर्म …

लॉकअप का बेताल शव

लॉकअप से शव को कन्धे पर उठाए मैं चल रहा हूंं अपनी मौत की घटना सुनाऊंं पूछता है शव ‘मेरी मौत सहज थी या हत्या.’ शव और वह भी लॉकअप में बात कर रहा हो तो वह हत्या ही हो सकती है- मैंने कहा. सत्य कहने पर ख़ुशी हुई जीवित आदमी का लॉकअप में मुंंह खोलना ही अपराध है इसीलिए …

स्त्री-साहस का प्रतीक

केरल के तंकमणी गांंव की घटनाओं पर 22.2.1987 के इलेस्ट्रेटिड वीकली में छपे वेणु मेनन के लेख के प्रति आभार सहित. दरवाज़े को लात मार कर खोला है और घर में घुस कर जूड़ा पकड़ कर मुझे खींचा है मारा है. दी हैं गन्दी गालियांं… निर्वस्त्र किया है और क्या कहूंं ! छिपाने के लिए अब बचा ही क्या है …

तुम धरती हो …

तुम धरती हो बिछी हो जिस पर मैं चलता हूं तुम वृक्ष हो झुकी हो, जिससे लिपट मैं अकसर सो जाता हूं और जाग कर मेरी दरंदगी अपने बदन की खुजली मिटाती है मेरे दोस्तों के हरे जंगल सूख गये वे परिंदे कहां चले गये जिनके घोंसले मेरी आंंखें आज भी ढोतीं हैं एक तरफ मौत और दूसरी तरफ तुम …

आत्म निर्भर

आत्म निर्भर शब्द का क्या वही मतलब है जो कल घोषणा के पूर्व था या आज जो घोषणा के बाद है ? हिंदी के बिचारे कितने निर्दोष शब्द ऐसे ही आतंकी हमलों की भेंट चढ़ गए. चीनी उत्पादों का बहिष्कार हो, न हो अलग बात है, डर तो इस बात का है कि बहिष्कार का ही कहीं बहिष्कार न होने …

चरित्रहीन लड़की

  मेरे अंदर बसती है एक चरित्रहीन लड़की जो पार करना चाहती है सभी सीमाओं को वह दौड़ती है खुले बाज़ार में ऐसे वस्त्रहीन हो कर जैसे आज़ाद हो. जब मयखाने में जाकर उठाती है शराब और ज़ोर ज़ोर से हंसती है वह टांंगेंं फैला कर बैठती है कुर्सियों पर बाकी चारित्रहीन लड़कियों के साथ. उसे मर्दों के साथ घूमना …

भूख

भूख पुरानी नहीं पड़ती बासी रोटी की तरह भूख से सनी कविताएंं भी डेग डेग पर गुंंथी रहती हैं तुम्हारे मन, शरीर में आटे में नमक की तरह उनकी विद्रूप भंगिमाएंं पिचके हुए पेट को शरीर, मन के मानचित्र से अलग-थलग करने का बस एक भोंडा प्रयास है उनकी कोशिश है कि शरीर को रोटी ख़रीदने के सिक्के में ढालकर …

वह मैं हूंं !

वह मैं हूंं ! मुंह-अंधेरे बुहारी गई सड़क में जो चमक है.. वह मैं हूंं ! कुशल हाथों से तराशे खिलौने देख कर पुलकित होते बच्चे बच्चे के चेहरे पर जो पुलक है.. वह मैं हूंं ! खेत की माटी में उगते गन्ने की ख़ुशबू मैं हूंं ! जिसे झाड़-पोंछ कर भेज देते हैं वे उनके घरों में भूल कर …

मां

मां ! मैंने खाये हैं तुम्हारे तमाचे अपने गालों पर, जो तुम लगाया करती थी अक्सर, खाना खाने के लिए. मां ! मैंने भोगे हैं अपने पीठ पर, पिताजी के कोड़ों का निशान, जो वे लगाया करते थे बैलों के समान मां ! मैंने खाई है अपने हथेलियों पर, अपने स्कूल मास्टर की छड़ियां, जो होम वर्क पूरा नहीं करने …

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