'यदि आप गरीबी, भुखमरी के विरुद्ध आवाज उठाएंगे तो आप अर्बन नक्सल कहे जायेंगे. यदि आप अल्पसंख्यकों के दमन के विरुद्ध बोलेंगे तो आतंकवादी कहे जायेंगे. यदि आप दलित उत्पीड़न, जाति, छुआछूत पर बोलेंगे तो भीमटे कहे जायेंगे. यदि जल, जंगल, जमीन की बात करेंगे तो माओवादी कहे जायेंगे. और यदि आप इनमें से कुछ नहीं कहे जाते हैं तो यकीं मानिये आप एक मुर्दा इंसान हैं.' - आभा शुक्ला
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कविताएं

मैं भी काफिर, तू भी काफिर

मैं भी काफिर, तू भी काफिर, मैं भी काफिर, तू भी काफिर फूलों की खुशबू भी काफिर, शब्दों का जादू भी काफिर यह भी काफिर, वह भी काफिर, फैज और मंटो भी काफिर नूरजहां का गाना काफिर, मैकडोनाल्ड का खाना काफिर बर्गर काफिर, कोक भी काफिर, हंसी गुनाह और जोक भी काफिर तबला काफिर, ढोल भी काफिर, प्यार भरे दो …

मैं कौन हूं…

मैं कौन हूं कहां से आया हूं इन सवालों का जवाब मजहब भी देते हैं लेकिन सच्चे सवालों के वो मजहबी जवाब झूठे होते है मैं कौन हूं कहाँ से आया हूं यह हर उस इंसान के सवाल हैं जो इस धरती पर पैदा हुआ लेकिन ज्यादातर लोगों ने झूठे जवाबों से मुत्मइन होकर मजहबों के आगोश में अपने सवालों …

लकड़बग्घा हंस रहा है…

फिर से तपते हुए दिनों की शुरूआत हवा में अजीब सी गन्ध है और डोमों की चिता अभी भी दहक रही है, वे कह रहे हैं एक माह तक मुफ्त राशन मृतकों के परिवार को और लकड़बग्घा हंस रहा है… हत्यारे सिर्फ मुअत्तिल आज और घुस गये हैं न्याय की लम्बी सुरंग में वे कभी भी निकल सकते हैं साबुत …

मैं एक सैनिक की भूमिका में आज भी हूं

पानी में बहते हुए सितारे दूर जा रहे हैं मुझसे समय के शिलापट्ट पर उभरे मेरी आस्थाओं के मंदिरों में दीया जलाने वाले हाथ चंद सिक्कों की तलाश में गुम हो गए हैं अपनी अपनी नज़दीकी जेबों में मेरा अनधुला युद्ध की गंदगी को ढोता हुआ शरीर सैनिक के यूनिफ़ॉर्म के अंदर अपने ही उपर आती हुई घृणा के बोझ …

शेर का अभिनन्दन समारोह

आदमी के खून में डुबोकर अपने पैने नाखून से शेर ने लिखी है कविता आदमी की पीठ पर कविता में है आक्रोश दुनाली बन्दूकों के खिलाफ अभिमान अपनी ऐतिहासिकता पर गर्व अपनी परम्पराओं के प्रति संस्कृति का पिटता ढोल आदमी का खून सस्ता अपना खून अनमोल लकड़ी काटने वाले लकड़हारे का भेजा फाड़ने में लगी मेहनत अपनी बुद्धि का बखान …

ईश्वर

किसी पाश्चात्य दार्शनिक ने कहा था – जो जैसा होता है वैसे ही ईश्वर की कल्पना/निर्माण करता है मुर्ग़ा ईश्वर बनाएगा तो मुर्ग़े जैसा सूअर सूअर जैसे ईश्वर की कल्पना करेगा वैसे ही मनुष्य अपने जैसे ही ईश्वर का निर्माण करेगा संत का ईश्वर संत जैसा दुष्ट का ईश्वर महादुष्ट कमीने का ईश्वर परम कमीना लोभी का ईश्वर घोर लालची …

मारे जाएंगे

जो इस पागलपन में शामिल नहीं होंगे, मारे जाएंगे कठघरे में खड़े कर दिये जाएंगे जो विरोध में बोलेंगे जो सच-सच बोलेंगे, मारे जाएंगे बर्दाश्त- नहीं किया जाएगा कि किसी की कमीज हो उनकी कमीज से ज्या दा सफ़ेद कमीज पर जिनके दाग नहीं होंगे, मारे जाएंगे धकेल दिये जाएंगे कला की दुनिया से बाहर जो चारण नहीं होंगे जो …

लोहे के पुल

लोहे के पुल लोहे की ज़ंजीरें भी थीं वक़्त के साथ टूट गए बहते हुए पानी में गला कर अपना लोहा अब एक परछाईं सी उभरती है नीचे रेत में मुंह छुपाती हुई नदी में वो नदी जिसमें कभी प्रगाढ़ होती थी तुम्हारी छाया घनाती हुई सांझ के साथ साथ अल्बम ने तो बहुत कोशिश की थी अपनी चौहद्दी में …

निर्मला पुतुल की दो कविताएं

1. वहीं ब्याहना मुझे ! मुझे उतनी दूर मत ब्याहना जहां मुझसे मिलने जाने ख़ातिर घर की बकरियां बेचनी पड़े तुम्हें मत ब्याहना उस देश में जहां आदमी से ज़्यादा ईश्वर बसते हों जंगल नदी पहाड़ नहीं हों जहां वहां मत कर आना मेरा लगन वहां तो कतई नहीं जहां की सड़कों पर मान से भी ज़्यादा तेज़ दौड़ती हों …

रात के मरे हुए काले कुत्ते…

रात के मरे हुए काले कुत्ते की लाश को पूंछ से पकड़ कर मैं ज़ोर से घुमा कर दूर फेंक देना चाहता हूं काउबॉय के फंदे की तरह किसी भटके हुए लेकिन पालतू पशु के गले से लिपट जाए और मैं उसे पूरी ताक़त के साथ अपनी तरफ़ खींच लूं इस रस्साकश्शी में अंततः हम दोनों एक दूसरे के पास …

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