विकास का आकाश इतना संकीर्ण ! सोचा नहीं था देशभक्ति का रंग इतना दागदार ! सोचा नहीं था पता तो था उस मार्ग के कुमार्ग का शीर्ष का सिंहासन मगर इतना पतित ! इतना गलीज !! सोचा नहीं था उस हाथ से इस हाथ सौंपा था सत्ता मगर यह क्या यह भी रंगा सियार हू ब हू उसी का कलर …
विकास का आकाश
