'यदि आप गरीबी, भुखमरी के विरुद्ध आवाज उठाएंगे तो आप अर्बन नक्सल कहे जायेंगे. यदि आप अल्पसंख्यकों के दमन के विरुद्ध बोलेंगे तो आतंकवादी कहे जायेंगे. यदि आप दलित उत्पीड़न, जाति, छुआछूत पर बोलेंगे तो भीमटे कहे जायेंगे. यदि जल, जंगल, जमीन की बात करेंगे तो माओवादी कहे जायेंगे. और यदि आप इनमें से कुछ नहीं कहे जाते हैं तो यकीं मानिये आप एक मुर्दा इंसान हैं.' - आभा शुक्ला
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कविताएं

मंदिर

मंदिर इस मंदिर में अब कोई मोनालिसा नहीं रहती बेघर हुए लोग सांध्य बाती के लिए ढूंंढ लेते हैं सड़क का एक कोना उसी काली जीभ पर ओष्ठागत प्राण हांंफते हुए समय-सा हरिनाम की प्रतीक्षा में वे लोग जो घर नहीं लौटे कभी जिनके इंतज़ार में ज़मींदोज़ हो गए उनके गाँव शहर वे, दुबारा गढ़ने में लगे हैं नए नए …

सौदा

जो बेचा, जानता है क्या बेचा जो खरीदा, जानता है क्या खरीदा बात जब राष्ट्र की हो तो बेहतर है जो गुप्त है, गुप्त ही रहे राष्ट्र से ऊपर कुछ नहीं होता राष्ट्र एक खूबसूरत चादर है देह के कई ऐब जिससे ढंक जाते हैं भोले भाले इलाकाई जाने न जाने बाकी बची सारी दुनिया सब जानती है वे इतना …

आग की कहानी

एक लड़की आती है और मेरे कंधे लग कर रोती है मेरा कोई नहीं रहा न बाप न भाई न मां कोई भी नहीं एक मुल्क तो है तुम्हारे नाम तुम्हारी फ़िक्र और तुम्हारे फ़ख़्र के लिए काश कि ऐसा होता लड़की कहती है जाड़े की ठंडी रात कंधे से लग कर ऊपर बतायी लड़की रोती रही और गीला करती …

क्या आपको पता है..?

क्या आपको पता है..? कि वो आपके खिलाफ, मनमाने फैसले क्यों ले रहे हैं..? क्या आपको पता है..? आपके धरनों, प्रदर्शनों, हड़तालों से भी, उनके कानों पर जूं क्यों नहीं रेंग रही..? क्या आप जानते हैं कि उन्हें किसान, मजदूर, श्रमिक, कर्मचारियों की जरा भी फिक्र क्यों नहीं है..? शायद आपको नहीं पता..! पर उन्हें पता है, अच्छी तरह..! उन्हें …

मरो मत, मारो

मरो मत मारो तुम्हारा मरना कोई ख़बर नहीं है अब क्योंकि वे तुम्हें पहले से ही मान चुके हैं मरा हुआ इसलिए मारो भात भात गाते हुए मारो छीनते हुए मारो मांगते हुए मत मरो ख़बरों में रहना चाहते हो तो ख़बर बनना चाहते हो तो भात की लड़ाई को उसके सही अंजाम तक पहुंचने दो मरो मत मारो सुब्रतो …

रोटी और सरहद

वोह नफ़रत के जो बीज बोए थे तुमने, फ़सल आज तैयार पक के खड़ी है. चलो बांट लो कुछ बचा के न रखना, चुनावों में इसकी ज़रूरत बड़ी है. न तुम हमको चाहो, न हम उसको चाहें वफ़ा की गली अब तो वीरान पड़ी है. यह बंटवारा तुमको बोहोत हो मुबारक, हमें तो अभी भी वतन की पड़ी है. वोह …

हाथरस का दरिन्दा कौन है ?

आप पूछते हैं- हाथरस का दरिन्दा कौन है ? और सोच रहे हैं कि बलात्कारी मिल जाये तो सर फोड़ दूं उसके हाथ मरोड़ दूं हड्डियां तोड़ दूं फाड़कर छाती उसका खून पी जाऊं. क्या मैं सच-सच बता दूं ? हां, तो सुनिए, बहुत से हाथरस हैं, बता देता हूं कि उन सबका जिम्मेदार कौन है ? कोई व्यक्ति है …

एक विद्रोही की अंतिम कविता

मैं ता उम्र पानी के घर में रहा यहांं सांंसें लेने के लिए जद्दोजहद नहीं करनी पड़ी मैं डूबूरी था अकपट नाचघरों और शराबखानों से लदे हुए बाजरे रोशनी फैलाती रही मेरे घर की बाहरी दीवारों पर मैं ता उम्र घसकटवा रहा कठिन समय के उच्छिष्ट दरकती मिट्टी के फ़र्श पर जब जब उगे उनको हटाता गया मैं और जलकुंभियांं …

गतानुगतिक

रोज़ एक ख़ास वक्त पर एक ख़ास तल्ले पर रुकती है लिफ्ट गलियारे के शीशे की खिड़की से झांकता है उस पार मेरा सोता हुआ बच्चा घुटने को छुपाये हुए पेट में कहता है पापा, देखो ना खेलते-खेलते कितना बड़ा हो गया हूँ मैं आपके कंधे क्यों और झुक जाते हैं रोज़, दफ़तर से लौटने के बाद बौने होते जा …

मुक्ति का रास्ता

मालिक लोग आते हैं, जाते हैं कभी तिरंगा, कभी भगवा कुर्ता पहनकर, कभी सफेद, कभी हरा, कभी नीला तो कभी लाल कुर्ता पहनकर. मालिक लोग चले जाते हैं तुम वहीं के वहीं रह जाते हो आश्वासनों की अफीम चाटते किस्मत का रोना रोते धरम-करम के भरम में जीते. आगे बढ़ो. मालिकों के रंग-बिरंगे कुर्ते को नोचकर उन्हें नंगा करो. अपनी …

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