'यदि आप गरीबी, भुखमरी के विरुद्ध आवाज उठाएंगे तो आप अर्बन नक्सल कहे जायेंगे. यदि आप अल्पसंख्यकों के दमन के विरुद्ध बोलेंगे तो आतंकवादी कहे जायेंगे. यदि आप दलित उत्पीड़न, जाति, छुआछूत पर बोलेंगे तो भीमटे कहे जायेंगे. यदि जल, जंगल, जमीन की बात करेंगे तो माओवादी कहे जायेंगे. और यदि आप इनमें से कुछ नहीं कहे जाते हैं तो यकीं मानिये आप एक मुर्दा इंसान हैं.' - आभा शुक्ला
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कविताएं

अभिसारिका

सोचो कि तुम सज धज कर मुझसे मेरे घर मिलने आई हो पहली बार और मैं तुम्हें वहां ब्रुकलिन ब्रिज पर खड़ा मेडुसा वध की भंगिमा में मिलूं राक्षसी को उसके झोंटे से पकड़ कर उसके सीने में छुरा घोंपते हुए नहीं नहीं यह शूर्पणखा के नाक काटने से कुछ अलग बात है मेरे चेहरे और सारे शरीर पर भीषण …

समय के गर्भ में पलते हैं क्रांतिकारी

काट लो जुबां मेरी, मेरी कलम बोलेगी, काट दोगे हाथ मेरे, मेरी आंखें बोलेंगी, चढ़ा दो फांसी पर मुझे, मेरा लहू पुकारेगा, एक को तो मिटा दोगे, और भी जनम लेंगे, किस-किस को मारोगे, कितनों को मारोगे, क्रांति की बलिवेदी पर, और भी होंगे मरने वाले, आजमा लो अपने सारे हथियार, क्रांति को रोक सकते नहीं, समय के गर्भ में …

ओ गाज़ा के शरारती बच्चों…

ओ गाजा के शरारती बच्चों तुम वही हो न जो मेरी खिड़की के नीचे शोरगुल से मेरी नाक में दम किये रहते थे तुम वही हो न जो दौड़भाग और कोलाहल से हर सुबह को सराबोर कर देते थे तुम वही हो न जिन्होंने मेरी बालकनी का गुलदान तोड़ा था और उसका अकेला फूल चुरा लिया था वापस आ जाओ …

फिलिस्तीनी कविता : जंग के एक बरस बाद हम हाजिर हैं…

जंग के एक बरस बाद हम हाजिर हैं जंग के बाद भी जिन्दा हैं. हम अभी भी खाते हैं और सोते हैं. हम अभी भी काम पर जाते हैं, टीवी देखते हैं उन दोस्तों के पास जाते हैं जो अभी भी जिन्दा हैं, उन परिजनों से मिलते हैं जो बचे रह गये, उन गलियों से गुजरते हैं जो अब पहचान …

आदमख़ोरों के नाम पत्र

प्यारे आदमख़ोरों मत खीजो उस आदमी पर जो रेल के डिब्बे में महज़ बैठने की जगह मांगता है कृपया इस बात को समझो कि दूसरे लोगों के भी दो टांगें और चूतड़ होते हैं प्यारे आदमख़ोरों एक सेकेण्ड रुको कमज़ोर को रौंदो मत मत पीसो अपने दांत कृपया इस बात को समझो कि बहुत से लोग यहां हैं और भी …

गरीबदास का गरीबी रेखा

घास काटकर नहर के पास, कुछ उदास-उदास सा चला जा रहा था गरीबदास. कि क्या हुआ अनायास… दिखाई दिए सामने दो मुस्टंडे, जो अमीरों के लिए शरीफ़ थे पर ग़रीबों के लिए गुंडे. उनके हाथों में तेल पिए हुए डंडे थे, और खोपड़ियों में हज़ारों हथकण्डे थे. बोले – ओ गरीबदास सुन ! अच्छा मुहूरत है अच्छा सगुन. हम तेरे …

स्थानीयता के सारे संघर्ष ख़तरनाक हैं

आसान है करना प्रधानमंत्री की आलोचना मुख्यमंत्री की करना उससे थोड़ा मुश्किल विधायक की आलोचना में ख़तरा ज़रूर है लेकिन ग्राम प्रधान के मामले में तो पिटाई होना तय है. अमेज़न के वर्षा वनों की चिंता करना कूल है हिमालय के ग्लेशियरों पर बहस खड़ी करना थोड़ा मेहनत का काम बड़े पावर प्लांट का विरोध करना एक्टिविज्म तो है जिसमें …

शुभांगी

पहाड़ियों के खुले हुए जबड़ों के अंदर तुम बना रही हो मेरे लिए एक अदद रोटी और आटे में जोरन डालने के लिए तुम्हारे पास नमक नहीं है तुम्हें मालूम है कि बिना नमक की रोटी मुझे पसंद नहीं है इसलिए रो पड़ती हो तुम और आटे की लोई में मिल जाता है तुम्हारी आंखों का नमक मुझे मालूम भी …

सिलबट्टे

मैं सिलबट्टे पर लिखी पोस्ट लाइक नहीं करती मुझे सिलबट्टे पर पिसे मसाले से मध्यकालीन सामंती युग की महक आती है मैंने सिलबट्टे पर दालें पीसी हैं उस वक़्त मेरे हाथों में होनी चाहिए थीं किताबें इम्तिहान के दिनों में भी मेरा क़ीमती वक़्त खा जाता था सिलबट्टा सिलबट्टा शब्द कानों में पड़ते ही मुझे अपनी हथेलियों में दिखाई देती …

विरासत

ज़िंदगी मेरी तेरी यादों की एक साझा विरासत थी तुमने खो दिया उसे और मैंने संजो कर रखा अब हम सही मायने में मैं और तुम बन गए हैं आत्मश्लाघा तुम्हारे प्रेम ने मुझे ख़ुद पर रश्क करना सिखाया और मचल पड़ा मैं बरसाती नाले की तरह मौसम बदला और आसमान से ज़मीन की दूरी बढ़ती गई अब तुम्हारे निस्पृह …

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