'यदि आप गरीबी, भुखमरी के विरुद्ध आवाज उठाएंगे तो आप अर्बन नक्सल कहे जायेंगे. यदि आप अल्पसंख्यकों के दमन के विरुद्ध बोलेंगे तो आतंकवादी कहे जायेंगे. यदि आप दलित उत्पीड़न, जाति, छुआछूत पर बोलेंगे तो भीमटे कहे जायेंगे. यदि जल, जंगल, जमीन की बात करेंगे तो माओवादी कहे जायेंगे. और यदि आप इनमें से कुछ नहीं कहे जाते हैं तो यकीं मानिये आप एक मुर्दा इंसान हैं.' - आभा शुक्ला
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दि फर्स्ट ग्रेडर : एक मर्मस्पर्शी फिल्म

केन्या सरकार की सबको मुफ्त शिक्षा देने की घोषणा के बाद एक 84 साल के बुजुर्ग ‘किमानी मारुगे’ भी पढ़ाई शुरु करने की ठानते हैं और पहुंच जाते है गांव के प्राइमरी स्कूल के गेट पर. स्कूल के सभी स्टाफ उनसे बुरा व्यवहार करते है और इसे बूढ़े की सनक मानते हैं. लेकिन स्कूल की संवेदनशील अध्यापिका ‘जाने’ उनसे सहानुभूति …

‘No Other Land’: A moment of hope and solidarity

कल ‘बेस्ट डॉक्यूमेंट्री’ का ऑस्कर अवार्ड प्राप्त करते हुए ‘No Other Land’ के फिलिस्तीनी सह निर्देशक Basel Adra ने कहा- ‘’दो माह पहले ही मैं बाप बना हूँ और मैं नहीं चाहता कि बड़ी होकर मेरी बेटी भी उसी स्थिति में रहे जिसमे मैं रह रहा हूँ, यानी सेटलर यहूदियों की हिंसा, घर को कभी भी बुलडोज किये जाने और …

‘छावा’ : हिंदुओं की ‘हीनता बोध’ पर नमक मलने की कहानी

14 फरवरी को विकी कौशल अभिनीत फिल्म ‘छावा’ महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गोवा में टैक्स फ्री हो चुकी है. फिल्म की ‘सफलता’ और चर्चा के कारण लोग शिवाजी के बेटे संभा जी के बारे में और ज्यादा जानने के लिए उत्सुक हो रहे हैं. उनका पहला पड़ाव Wikipedia है. संभाजी के बारे में Wikipedia में शुरू में ही जो जानकारी …

मौमिता आलम के ठंडे उत्तरों के पीछे खौलते सवालों की कविता

मौमिता आलम की ही समकालीन कवि और दलित एक्टिविस्ट मीना कंडासामी कविता के बारे में कहती हैं कि यह वह जगह है, जहां हम सच की ‘स्मगलिंग’ (smuglling) करके उसे सुरक्षित रखते हैं. सामान्य समय में सच कहना और फासीवादी दौर में (जहां पितृसत्ता भी अपने चरम पर होती है) सच की ‘स्मगलिंग’ करके उसे कविता में सुरक्षित रखना दो …

‘पेदरो परामो’ बनाम पेदरो परामो यानी जादू बनाम यथार्थ

1955 में प्रकाशित, ‘उआन रुल्फो’ (Juan Rulfo) के मशहूर उपन्यास ‘पेदरो परामो’ (Pedro Páramo) के बारे में किसी समीक्षक ने लिखा कि इस उपन्यास से गुजरना ठीक वैसे ही है जैसे किसी डिबिया को खोलना और यह पाना कि डिबिया तो खाली है, लेकिन इस डिबिया को जिस जिस ने इससे पहले खोला है, उन सबकी फुसफुसाहट इसमें कैद है. …

‘My Name Is Selma’ : यह सिर्फ़ उस यहूदी महिला की कहानी भर नहीं है…

98 साल की उम्र में यहूदी महिला ‘सेल्मा’ (Selma van de Perre) ने 2021 में इसी नाम से अपना संस्मरण लिखा. हिटलर के शासन के दौरान जर्मनी व यूरोप में 1933 से 1945 के बीच, यहूदियों की क्या स्थिति थी, इसका बहुत ही ग्राफिक चित्रण इस किताब में है. नीदरलैंड में एक मध्यवर्गीय यहूदी परिवार में जन्मी सेल्मा, जर्मन- राजनीति …

आउट ऑफ दिस अर्थ : खनन कम्पनियों व पूंजीवाद के काम करने के तरीकों और जनप्रतिरोध की तीखी पड़ताल

भारत के पूर्वी राज्यों विशेषकर उड़ीसा, छत्तीसगड़ और झारखण्ड में खनन कम्पनियों और वहां के मूल निवासियों के बीच संघर्ष की खबरें आती रही हैं. सरकार अपने चरित्र के अनुसार प्रायः कम्पनियों के साथ ही खड़ी नज़र आती है. जिन्होंने भी इन घटनाक्रमों को थोड़ा फालो किया होगा, वे ‘फेलिक्स पडेल’ और ‘समरेन्द्र दास’ का नाम जरुर जानते होगेे. लेखक …

‘खून की पंखुड़ियां’: एक परिचय

‘मैं मानता हूं कि जब तक एक भी व्यक्ति जेल में है, मैं भी जेल में हूं. जब तक एक भी व्यक्ति भूखा और नंगा है, मैं भी भूखा और नंगा हूं. फिर ऐसी हालत में एक पीड़ित व्यक्ति दूसरे पीड़ित व्यक्ति को अपमानित क्यों कर रहा है ? हम कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि …

नवनीत पांडेय : ‘भले ही हम थोड़े हैं पर हथौड़े हैं’

यदि पाने की महत्वाकांक्षा से आप मुक्त हैं , तो खोने का मलाल भी आपमें नहीं रहेगा. तब आप स्वायत्त भी होंगे, और ईमानदार भी. आपकी वही स्वायत्तता आपको इतना मुखर बना देगी कि आप सबका ‘काट’ बन सकते हैं ! सबसे आंखें चार कर सकते हैं !! नवनीत पांडेय को जब भी देखा, मैंने इसी तरह से देखा. समकालीन …

क्रांतिकारी कवि वरवर राव की नजरबंदी त्रासदपूर्ण अन्याय रही !

सत्ता की कान में आसानी से कोई जूं रेंगती नहीं है. इसका यह आशय नहीं है कि एक अकेले आपके कहने से कुछ नहीं होगा. होगा, ज़रूर होगा, बस निकल पड़ने की कवायद तो कीजिए कारवां बन जाएगा. असहमत, हताश, निराश लोगों की उम्मीद तो बनिए. जद़ कि जत्थे में सब आएंगे, साथ आएंगे. भरोसा बनिए. यह दुनिया हमेशा आधी …

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