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आज़ाद की शहादत : प्रामाणिक ब्यौरा

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आज़ाद की शहादत : प्रामाणिक ब्यौरा

आज़ाद के निकटतम साथी विश्वनाथ वैशम्पायन ने अपनी किताब ‘धरतीपुत्र चन्द्रशेखर आज़ाद‘ में लिखा है :

जाते समय नाॅट बाॅवर ने हिदायत दी कि मोटे आदमी की तलाशी लेकर लाश चीर घर भेजी जाय तथा ठाकुर विशेशर सिंह को अस्पताल. दोनों ही दल जिन पेड़ों के पीछे थे उस पर कई गोलियों के निशान थे. नाॅट बाॅवर के पीछे उसकी खड़ी मोटर में भी गोलियां लगी थीं, उससे बाडी में तीन जगह छेद हो गए थे. लीडर 2 मार्च, 1931 के अंक में अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद के शव चीर फाड़ का समाचार प्रकाशित हुआ. यह चीर फाड़ शनिवार को दो मजिस्ट्रेटों खान साहबर रहमान बक्श कादरी तथा ठाकुर महेन्द्रपाल सिंह की देख रेख में हुई. बाद में इन्हीं मजिस्ट्रेटों की देखरेख में शवदाह हुआ.

आज़ाद के शरीर का पोस्ट मार्टम (चीरफाड़) सिविल सर्जन लेफ्टिनेन्ट कर्नल टाउनसेण्ड ने किया. उसके साथ डा. गाडे तथा डा. राधेमोहन लाल थे. दो गोलियों के घाव दाहिने पैर के निचले हिस्से में थे. गोलियों से टीबिया बोन फ्रेक्चर हुई. एक गोली दाहिनी जांघ से निकाली गई. घातक गोलियां दो थी. एक तो सर में दाहिनी ओर और दूसरी छाती में जिसका पोस्टमार्टम के समय पता चला. कहा जाता है कि जो घाव छाती के आसपास हुआ था, वह एक गोली जो दाहिने हाथ के कन्धे के पास छेद कर दाहिने फेफड़े में जा रुकी. सिर में दाहिनी ओर जो गोली लगी थी वह पैरिएटल (Parietal) बोन को छेदती हुई दिमाग में घुसी और सिर के नीचे दिमाग में बाईं ओर रुकी. डाक्टरों की राय में यह कहना गलत है कि उन्होंने अपने आप गोली मार ली थी. यदि ऐसा होता तो वहां पर चमड़ी तथा बालों के जलने के निशान होते जो नहीं थे.

यह जानना सम्भव नहीं था कि किसी को पुलिस ने लाश पहचानने के लिए बुलाया पर सीआईडी सर्किल में यह विश्वासपूर्वक कहा जाता था कि वे चन्द्रशेखर आज़ाद थे.

चीर-फाड़ के समय सशस्त्र पुलिस का पहरा था तथा दो मजिस्ट्रेट तैनात थे. मृृत व्यक्ति ब्राह्मण था इसलिए पुलिस लाइन से ब्राह्मण रंगरूट बुलाकर उन्हीं से शव उठाकर लारी में रखा गया. लाश भारी थी इसलिए स्ट्रेचर पर न रखी जा सकी. वह दूसरी लारी में रखी गई. साथ सशस्त्र पुलिस थी. उसके बाद अब्दुल समद पुलिस इन्सपेक्टर की निगरानी में दोनों लारियां नदी की ओर जाने को तैयार थी.

इसी बीच श्री पुरुषोत्तम दास टण्डन आ पहुंचे. उनके साथ कुछ कांग्रेसी भी थे. उन्होंने लाश देखना चाही और कहा, ‘आज़ाद के रिश्तेदार आ गए हैं.’ इसी बीच लारी चल पड़ी. मजिस्ट्रेट कादरी ने टंडन जी से जिला मजिस्ट्रेट से मिलने के लिए कहा. लाश ले जाने के विषय में गुप्तता रखी गई. पहले लारियां जार्ज टाउन की ओर गईं, वहां से स्टैनले रोड घूमती रसूलाबाद घाट पर चली गईं. जहां दाह संस्कार की सारी व्यवस्था की गई थी.

जब एक ब्राह्मण दाह संस्कार करा रहा था तो कुछ लोग त्रिवेणी घाट पर तलाश कर रहे थे. मजिस्ट्रेट ने टण्डन जी से कहा दाह संस्कार कहां होना है, इसका उसे पता नहीं और इन्सपेक्टर ने लोगों को त्रिवेणी घाट बताया.

जो व्यक्ति सबेरे बनारस से आए हैं, अपने आपको आज़ाद कर रिश्तेदार बताते हैं उनका नाम शिवविनायक मिश्र है. वे एक कांग्रेस कार्यकर्ता भी हैं. उन्होंने शाम की सभा में बताया कि वे आज़ाद का शव लेने जिला मजिस्ट्रेट के पास गये थे. जिला मजिस्ट्रेट ने सुपरिन्टेण्डेण्ट पुलिस के पास जाने को कहा. सुपरिन्टेण्डेण्ट पुलिस ने पहले तो कहा कि शव जला दिया गया है परन्तु जब पण्डितजी ने कहा कि चीर घर से तो शव अभी कुछ देर पहले ले जाया गया है तो सुपरिन्टेण्डेण्ट पुलिस ने दारागंज पुलिस स्टेशन इन्चार्ज के नाम पत्र दिया. इन्सपेक्टर ने त्रिवेणी घाट पर शव ढूंढ़ा पर पता न चला. आखिर रसूलाबाद का पता चला पर जब ये लोग रसूलाबाद पहुंचे तब तक लगभग शरीर जल चुका था. मिश्र जी को सुपरिन्टेण्डेण्ट की आज्ञानुसार दाह संस्कार की आज्ञा दे दी गई. इसी बीच श्रीमती कमला नेहरू, बाबू पुरुषोत्तम दास टण्डन भी वहां पहुंच गए. अन्तिम संस्कार होने पर उनकी अस्थियां एकत्रित कर पण्डित मिश्र शहर में लाए. स्टूडेन्ट्स एसोसिएशन के प्रस्ताव के अनुसार जुलूस खद्दर भण्डार से निकाला गया. लकड़ी के तखत पर एक काली चादर बिछाई गई. उस पर अस्थियां रखी गईं. तखत लोगों ने अपने कन्धे पर उठाया था. जुलूस शहर में घूमता पुरुषोत्तमदास पार्क पहुंचा. शव यात्रा में चलने वाले लोग नंगे सिर और नंगे पैर थे. अस्थियों पर शहर में जहां तहां फूल बरसाए गए. स्टूडेन्ट्स एसोसिएशन के तत्वाधान में तथा श्री मोहन लाल गौतम की अध्यक्षता में सभा हुई. श्री गौतम स्टूडेन्ट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष थे.

सभा में श्री पुरुषोत्तम दास टण्डन, श्रीमती कमला नेहरू, श्री मंगलदेव सिंह, श्री काशीराम तिवारी, श्री वसन्तलाल शर्मा, श्री शिवविनायक मिश्र, श्रीमती शचीन्द्र (प्रतिमा) सान्याल (काकोरी के अभियुक्त शचीन्द्रनाथ सान्याल की धर्मपत्नी), श्री पद्मकान्त मालवीय आदि के भाषण हुए. शहर में हड़ताल रही. हड़ताल स्टूडेन्ट्स एसोसिएशन ने कराई थी. उसने जनता से व्रत रखने का भी आग्रह किया था.

कहा जाता है कि सेवा समिति की ओर से डा. बेनीप्रसाद तथा पण्डित पद्मकान्त मालवीय ने शव दाह संस्कार के लिए मांगा था, परन्तु जिला मजिस्ट्रेट बमफोर्ड ने शव यह कह कर नहीं दिया कि शव केवल मृतक के रिश्तेदार को ही दिया जा सकता है. आज़ाद के शव की तलाशी लेने पर उनके पास से 448 रुपये के नोट तथा कुछ नगदी निकला, साथ ही 16 गोलियां तथा 22 खाली कारतूस पड़े मिले.

कुछ लोगों का कहना है कि उनकी मृत्यु के बाद उनके शव का अपमान किया गया. कुछ का कहना है कि एक गोरे अफसर के कुत्ते ने उनका रक्त चाटकर वफादारी का सबूत दिया. कुछ ने उनके शरीर को घसीटा तथा गालियां दी. पर कहीं आज़ाद की प्रशंसा भी सुनी गई. स्वयं सीआईडी सुपरिन्टेण्डेण्ट ने जो चांद प्रेस तलाशी लेने आए थे, सहगल जी से आज़ाद के जीवन की प्रशंसा की. उनका कहना था कि ऐसे सच्चे निशानेबाज उन्होंने बहुत कम देखे हैं, खासकर ऐसी शंका मय परिस्थिति में जब तीन ओर से उन पर गोलियों की वर्षा हो रही थी. उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि यदि पहली गोली उनकी जांघ में न लगी होती तो पुलिस का एक भी अफसर जीवित न बचता, क्योंकि नाॅट बाॅवर का हाथ पहले ही बेकार हो चुका था. उन्होंने यह भी बताया था कि आज़ाद विप्लवी दल का कोई प्रतिष्ठित नेता था.

भविष्य के संवाददाता ने दूसरे दिन दोपहर को घटनास्थल का निरीक्षण किया. जिस पेड़ के पीछे आज़ाद ने प्राण विसर्जन किए, वह वृक्ष फूलों से लदा था. पेड़ पर कई जगह जनता ने ‘आज़ाद’ आदि लिख दिया था. कहा जाता है कि वहां की मिट्टी भी कालेज के लड़के उठा ले गए थे.

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