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युद्ध में…

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युद्ध में...
युद्ध में…

युद्ध में
सिर्फ़ हथियार के व्यापारी ही
खुश नहीं होते
कफ़न के व्यापारी
देशों के राजा
और अनेक भी खुश होते हैं

फिर भी
मैं उस युद्ध के खिलाफ हो कर
लिजलिजी कविताएं नहीं लिख सकता हूं
जो युद्ध आदमी की अस्मिता को बचाने के लिए
लड़ी जाती है
अपने अंदर या बाहर

हरेक युद्ध खुले मैदान में
या पहाड़ों की ओट में नहीं लड़ी जाती है

मानवता के शत्रु के प्रति
असीम घृणा का उदय
सबसे पहले दिमाग़ में होता है
और इन शत्रुओं के नाश के लिए
अगर बंदूक़ उठाना ज़रूरी है तो है

हमें अपनी फसल उगाती खेतों को बचाने के लिए
अपने खिलखिलाते हुए बच्चों को बचाने के लिए
फूल से लदी वादियों को बचाने के लिए
अपने घरों को ज़मींदोज़ होने से बचाने के लिए
अपनी नदियों को सूखने से बचाने के लिए
अपने पशु धन को अकाल के मुंह से बचाने के लिए
अगर बंदूक़ उठाना ज़रूरी है तो है

मुझे टीवी स्क्रीन पर उभरते
युद्ध की तस्वीरें उद्वेलित नहीं करतीं हैं
और न ही युद्ध की विभीषिका
हतोत्साहित करतीं हैं

मेरा लक्ष्य जिस दुनिया को पाने के लिए है
उसमें सारे जीव जंतुओं की उचित भागीदारी है
इस दुनिया को पाने के लिए
अगर बंदूक़ उठाना ज़रूरी है तो है

  • सुब्रतो चटर्जी

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ROHIT SHARMA

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