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डाॅक्टर काफील खान का जेल से लिखा मार्मिक पत्र

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[डाॅक्टर काफील खान उत्तर प्रदेश की सरकार के आंख में खटकता वह शख्स हैं, जिन्होंने अपनी जिम्मेदारी का भरपूर परिचय देते हुए अस्पताल में आॅक्सीजन की कमी से मरते नौनिहालों की जान बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था. यही उनका सबसे बड़ा अपराध था, जिसका खामियाजा उत्तर प्रदेश की भाजपाई जोगी सरकार उनसे निकाल रही है और इस डाॅक्टर काफील खान को जेल की सीखचों में बंद कर दिया है.

दरअसल उत्तर प्रदेश की जोगी सरकार डाॅक्टर काफील खान को जेल की सीखचों में बंद इसलिए किया ताकि वह और ज्यादा बच्चों की मौत चाह रही थी, जिसे डाॅक्टर काफील ने अपने प्रयास से विफल कर दिया था. इस बात से बौखलाई भाजपाई जोगी सरकार उन्हें पिछले 8 माह से जेल की सीखचों में बंद कर रखा है ताकि उसके कब्रिस्तान और श्मशानघाट के लिए ज्यादा से ज्यादा लाशें मिल सके

अनगिनत बच्चों के मौत का जिम्मेदार अधिकारी और मंत्री जहां मौज कर रहे हैं, वहीं जेल में कैद डाॅक्टर काफील खान अमानवीय यातना का शिकार हो रहे हैं. उन्होंने जेल के अंदर से अपना यह मार्मिक पत्र,जिसे उन्होंने एक नोटबुक के पन्ने पर तारीख 18.4.18 को लिखा है, जिसे हम सभी को पढ़ना चाहिए और जोगी सरकार के इस अनर्थ के खिलाफ सवाल खड़ा करना चाहिए.]

डाॅक्टर काफील खान का जेल से लिखा मार्मिक पत्र

आठ महीने से जेल में यातना, अपमान के बाद भी आज सब कुछ मेरे यादों में जिंदा है. कभी-कभी मैं अपने आप से सवाल पूछता हूं, ‘क्या मैं सच मे दोषी हूं ? तो दिल के गहराई से जवाब मिलता है नहीं, नहीं, नहीं. 10 अगस्त को व्हाट्सएप पर जब मुझे खबर मिली तो मैं वो सब किया जो एक डॉक्टर, एक पिता और देश के एक ज़िम्मेदार नागरिक को करना चाहिए. मैंने सभी बच्चों को बचाने की कोशिश की, जो ऑक्सीजन के कमी के वजह से खतरे में थे. ऑक्सीजन की कमी के वजह से मासूम बच्चों को बचाने के लिए मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश की.

मैंने सबको कॉल किया, विनती की, मैं भागा, मैंने ड्राइव किया,  मैंने ऑक्सीजन का आर्डर किया,  मैं रोया, मैंने वो सब कुछ किया, जो मुझसे हो सकता था. मैंने अपने HOD को कॉल किया, अपने दोस्तों को कॉल किया, BRD अस्पताल के प्रिंसिपल को कॉल किया, BRD के एक्टिंग प्रिंसिपल को कॉल किया, गोरखपुर के DM को फ़ोन किया और सबको ऑक्सीजन के कमी के वजह से अस्पताल में खड़े हुए गंभीर स्थिति के बारे में बताया. हज़ारों बच्चों को बचाने के लिए मैं गैस-सप्लायर के पास गिड़गिड़ाया भी.

मैंने उन लोगों को कैश दिया और कहा कि ‘सिलिंडर डिलीवर होने के बाद बाकी पेमेंट हो जाएगा.’ लिक्विड सिलिंडर टैंक पहुंचने तक हम 250 सिलिंडर जुगाड़ करने में सफल हुए. एक जंबो सिलिंडर का दाम 250 रुपया था. मैं एक वार्ड से दूसरे वार्ड भाग रहा था. यह भी नज़र रख रहा था कि ऑक्सीजन सप्लाई की कमी न हो. आस-पास के अस्पताल से सिलिंडर लाने के लिए मैं खुद ड्राइव करके गया. जब मुझे लगा यह ज्यादा नहीं है तब मैं ड्राइव करके एस. एस. बी. पहुंचा और इसके डी. आई. जी. से मिला और स्थिति के बारे में बताया. डी. आई. जी. के तरफ से तुरंत मदद की गयी. बी. आर. डी. अस्पताल से गैस एजेंसी तक खाली सिलिंडर टैंक पहुंचाने और इन्हें भरकर अस्पताल पहुंचाने के लिए एक बड़े ट्रक के साथ कई सैनिक तुरंत भेज दिए गए. वो लोग 24 घंटे तक इस काम मे लगे रहे. मैं एस. एस. बी. को सैल्यूट और उनके मदद के लिए उन्हें धन्यवाद देता हूं.

मैंने अपने जूनियर और सीनियर डॉक्टर से बात किया, अपने स्टाफ को पैनिक न होने के लिए कहा, नाराज़ परिवारों से गुस्सा न करने के लिए कहा. सबकी ज़िंदगी बचाने के लिए एक टीम के रूप में हम सब काम किये. जो परिवार अपने बच्चे खोये थे, मैंने उन्हें सांत्वना दिया. मैंने उन परिवारों को भी समझाया जो अपने बच्चा खोने के वजह से परेशान और गुस्से में थे. मैंने उनको समझाया कि लिक्विड O2 खत्म हो गया है और हम जंबो ऑक्सीजन सिलिंडर से काम चला रहे हैं. लिक्विड ऑक्सीजन टैंक पहुंचने तक हम अपने कोशिश जारी रखे.

13 तारीख की सुबह मुख्यमंत्री योगी महाराज अस्पताल पहुंचे और मुझे पूछा, “क्या आप डॉक्टर कफील है और आप ने सिलिंडर जुगाड़ किये हैं ?” तो मैंने “हां” में जवाब दिया. योगी गुस्से में आ गए और कहा कि “आप को लगता है सिलिंडर जुगाड़ करने से आप हीरो बन जाएंगे. मैं इसे देखता हूं.” योगी जी इस घटना के मीडिया में आ जाने की वजह से गुस्से में थे. मैं अल्लाह  के नाम पर कसम खाकर कह रहा हूं कि किसी भी मीडिया को मैंने उस रात इन्फॉर्म नहीं किया था. मीडिया अपने आप वहां पहुंचा था.

पुलिस हमारे घर आने लगी, टॉर्चर के साथ-साथ मेरे परिवार को धमकी देने लगी. लोगों ने मुझे कहा कि पुलिस मुझे एनकाउंटर में भी मरवा सकती है. मेरा परिवार पूरी तरह डरा हुआ था. अपने परिवार को बचाने के लिए मैंने यह सोचकर सरेंडर किया कि मैंने कुछ गलत नहीं किया है और मुझे न्याय मिलेगा, लेकिन नहीं.  दिन बीत गए, हफ्ते बीत गए,  महीने बीत गए,  अगस्त 17 से लेकर अप्रैल 18 तक होली आई,  दशहरा आया, क्रिश्मस चला गया, नया साल आया,  दीवाली आई मुझे लगता था कि बेल मिल जाएगी, लेकिन अब लगने लगा है कि न्यायपालिका भी दबाव में काम कर रही है. ज़िंदगी सिर्फ मेरे लिए नहीं, मेरे परिवार के लिए भी नरक और तुच्छ बन गया है. जस्टिस के लिए मेरे परिवार एक जगह से दूसरे जगह भाग रहा है. पुलिस स्टेशन से कोर्ट, गोरखपुर से इलाहाबाद लेकिन कोई फायदा नहीं हो रहा है. मेरी बेटी का पहला जन्मदिन मैं सेलिब्रेट नहीं कर पाया. अब वो एक साल और सात महीने की हो गयी है.

10 अगस्त को मैं छुट्टी पर था और (छुट्टी मेरे एच. ओ. डी. ने सैंक्शन किया था) लेकिन फिर भी अपना ड्यूटी निभाने के लिए मैं अस्पताल पहुंचा. मैं अस्पताल का सबसे जूनियर डॉक्टर था. मैंने 8/8/2016 को अस्पताल जॉइन किया था. मैं NHRM में नोडल अफ़सर के रूप में काम करता था और padiatrics के लेक्चरर के रूप में छात्रों को पढ़ाता था. मैंने कहीं भी सिलिंडर खरीदने,  टेंडर में, ऑर्डर, पेमेंट में शामिल नहीं था. अगर पुष्पा सेल्स ने सिलिंडर देना बंद कर दिया तो उस के लिए मैं कैसे ज़िम्मेदार हूं ? मेडिकल फील्ड के बाहर के एक आदमी भी कह देगा कि डॉक्टर का काम इलाज करना है ना कि सिलिंडर खरीदना. दोषी तो गोरखपुर के डीएम, डीजीएमई, हेल्थ और एजुकेशन के प्रिंसिपल सेक्रेटरी हैं क्योंकि पुष्पा सेल्स के द्वारा 68 लाख बकाया राशि पेमेंट करने के लिए 14 रिमाइंडर के बात भी कोई कदम नहीं उठाया.

यह उच्चस्तर पर प्रशासनिक लेवल की बहुत बड़ी विफलता है. हम लोगों को बलि का बकरा बनाया गया और हम लोगों को जेल के अंदर डाला, ताकि सच्चाई गोरखपुर जेल में ही रह जाए. जब मनीष को बेल मिला, तो हमें भी लगा कि जस्टिस मिलेगा और हम अपने परिवार के साथ रहने के साथ-साथ दोबारा सेवा कर सकेंगे. लेकिन हम लोग अभी भी इंतज़ार कर रहे हैं. मैं उम्मीद करता हूं कि समय आएगा जब मैं फ्री हो जाऊंगा और अपने बेटी और परिवार के साथ रहने लगूंगा. न्याय जरूर मिलेगा.

एक असहाय टूटा दिल पिता, पति, भाई, बेटा और दोस्त”

डॉ. काफील खान

18.04.18

[डॉक्टर काफील के नोटबुक पर लिखे पत्र के मूल प्रति का स्कैन प्रति –

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