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‘जबरन धर्म परिवर्तन’ संघ का ईसाई विरोधी सांप्रदायिक एजेंडा

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पिछले एक दशक से ‘जबरन धर्म परिवर्तन’ के नाम पर भारत में रहने वाले मुस्लिम और ईसाई समुदायों को संघियों द्वारा निशाना बनाया जा रहा है. ‘लव-जिहाद’ के झूठे आरोप के तहत 2014 से पहले भी संघ-भाजपा द्वारा मुसलमानों के ख़िलाफ़ सांप्रदायिक अभियान चलाया जा रहा था. यह प्रचार किया जाता था कि मुस्लिम नौजवानों द्वारा हिंदू लड़कियों को ‘फंसाकर’ उनका धर्म परिवर्तन किया जा रहा है और यह अभियान संगठित रूप से विदेशी मुस्लिम संगठनों द्वारा चलाया जा रहा है.

इसी सांप्रदायिक प्रचार के तहत 2013 में मुज़फ़्फ़रनगर के मुस्लिम विरोधी क़त्लेआम को अंजाम दिया गया, जिसमें दर्जनों मुस्लिमों को क़त्ल किया गया, महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया और 50 हज़ार से ज़्यादा को उनके घरों से उजाड़ दिया गया. ‘जबरन धर्म परिवर्तन’ का यह प्रचार न केवल मुसलमानों के ख़िलाफ़ किया जाता है, बल्कि ईसाइयों के ख़िलाफ़ भी यह अभियान बड़े पैमाने पर चलाया जा रहा है. अकेले 2021 के नौ महीनों में ही भारत के विभिन्न राज्यों में ईसाइयों के ख़िलाफ़ हिंसा की 300 से अधिक घटनाओं को संघियों द्वारा अंजाम दिया गया.

इस तथाकथित ‘जबरन धर्म परिवर्तन’ के ख़िलाफ़ 11 राज्यों में क़ानून भी बन चुके हैं लेकिन तथ्य यह है कि जब से संघियों द्वारा यह प्रचार किया जा रहा है, तबसे लेकर अब तक ऐसा कोई भी सबूत सामने नहीं आया, जो यह साबित करता हो कि ईसाइयों या मुसलमानों द्वारा जबरन धर्म परिवर्तन का संगठित अभियान चलाया जा रहा है. अब तक जितने भी धर्म परिवर्तन के मामले कोर्ट में आए हैं, उनमें से किसी में भी यह साबित नहीं हुआ है कि यह जबरन धर्म परिवर्तन है.

दूसरा ये सभी मामले संघ से जुड़े चरमपंथी संगठनों की शह पर अदालत में लाए गए थे लेकिन भारत की न्याय व्यवस्था का न्याय देखिए, जिस चीज़ का अस्तित्व आज तक सिद्ध नहीं हो पाया, उसे रोकने के लिए क़ानून भी बन चुके हैं ! अब भाजपा केंद्रीय स्तर पर भी ऐसा ही क़ानून बनाने की कोशिश कर रही है. सुप्रीम कोर्ट के जजों के हालिया बयान से तो लगता है कि उनकी ये कोशिशें जल्द ही कामयाब होने वाली हैं.

हाल ही में भारत की सर्वोच्च अदालत के जजों के एक बैंच ने ‘जबरन धर्म परिवर्तन’ के मामले के संबंध में अश्विनी कुमार उपाध्याय नाम के एक वकील द्वारा दायर एक पिटीशन की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार को यह आदेश दिया है कि वह स्पष्ट करे कि इस धर्म परिवर्तन के संबंध में वह क्या कर रही है ? इतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट के इन जजों ने तो यहां तक कह दिया कि जबरन, लालच और धोखे से किया जा रहा धर्म परिवर्तन राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है और यह बहुत ख़तरनाक है. लेकिन जिस ‘जबरन धर्म परिवर्तन’ का डर जजों के बयानों में नज़र आ रहा है, उसका पिछले लगभग एक दशक से अभी तक कोई सबूत क्यों नहीं मिला ?

जिस आधार पर सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा’ खड़ा हो सकता है, वह अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा ‘बड़े पैमाने पर जबरन धर्म परिवर्तन’ के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश किए गए ‘तथ्य’ हैं. इन तथ्यों का खुलासा एनडीटीवी के पत्रकार श्रीनिवासन जैन ने अपने कार्यक्रम ‘ट्रूथ वर्सेज हाइप’ में किया है.

एनडीटीवी की इस जांच के अनुसार अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा जो तथ्य अदालत में पेश किए गए हैं, उनमें ‘जबरन धर्म परिवर्तन’ का एक भी मामला नहीं है. इतना ही नहीं इसमें से दो घटनाएं जिनका ज़िक्र ‘जबरन धर्म परिवर्तन’ के सबूत के तौर पर किया गया है, झूठी हैं. जैसे कि इसमें एक वीडियो के हवाले से यह दावा किया गया है कि एक ईसाई स्कूल अध्यापक एक हिंदू छात्र की इसलिए पिटाई करता है, क्योंकि उसने रुद्राक्ष पहना हुआ है, लेकिन एनडीटीवी की पड़ताल के अनुसार हिंदू छात्र को पीटने वाला अध्यापक स्वयं हिंदू है और उसे इसलिए पीटा गया क्योंकि छात्र ने अपना स्कूल का काम नहीं किया !

जहां तक अश्वनी कुमार उपाध्याय का संबंध है, वह ख़ुद एक ऐलानिया संघी है, जिसे दिल्ली में मुस्लिम विरोधी नारे लगाने के आरोप में एक बार गिरफ़्तार भी किया जा चुका है. इसने सुप्रीम कोर्ट से पहले दिल्ली हाईकोर्ट में भी इस मामले संबंधी एक अर्जी दायर की थी, लेकिन दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह कहते हुए अर्जी ख़ारिज़ कर दी कि इसमें दिया गया एक भी तथ्य ‘जबरन धर्म परिवर्तन’ को साबित नहीं करता.

और यह भी कहा गया कि यदि उसने दोबारा यह अर्जी लगाई तो उस पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट इसी झूठ के आधार पर पूरी बेशर्मी से केंद्र सरकार को आदेश जारी कर रहा है. यह इस बात का एक और सबूत है कि भारत में ‘न्याय’ की सर्वोच्च संस्था कैसे भगवा रंग में रंगी जा चुकी है.

इस मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से ‘सॉलिसिटर जनरल’ तुषार मेहता ने कहा कि एक ‘निष्पक्ष अथॉरिटी’ यह देखेगी कि धर्म परिवर्तन करने वाला व्यक्ति ‘हृदय के दार्शनिक या धार्मिक परिवर्तन’ के कारण धर्म बदल रहा है या किसी लालच में ! इस ‘भद्रपुरुष’ से यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि ‘हृदय’ के ऐसे परिवर्तन को किस यंत्र से नापा जाएगा ? लाज़िमी ही, इसे संघवादी सांप्रदायिक राजनीति के चश्मे से देखा जाएगा, जैसा कि विभिन्न राज्यों में पारित हो चुके इस तथाकथित धर्म परिवर्तन रोकथाम क़ानून और इस क़ानून के लागू होने में हो रहा है.

ये कानून संघ की अल्पसंख्यक विरोधी, विशेष रूप से मुस्लिम विरोधी और ईसाई विरोधी राजनीति को क़ानूनी आधार मुहैया करने के अलावा और कुछ नहीं हैं. इन क़ानूनों के अनुसार अगर कोई हिंदू किसी दूसरे धर्म को अपनाता है तो उसे पूरी क़ानूनी प्रक्रिया से गुज़रना होगा, लेकिन अगर कोई अन्य धर्म को छोड़कर मूल धर्म (यानी हिंदू धर्म) को अपनाता है, तो उसे इन क़ानूनों के अनुसार धर्म परिवर्तन ही नहीं माना जाएगा और यह धर्म परिवर्तन इसलिए नहीं है क्योंकि आरएसएस इसे ‘घर वापसी’ मानती है. यह है भारत की न्याय व्यवस्था का दोगलापन.

यह किसी भी व्यक्ति की आज़ादी है कि वह किसी भी धर्म को माने, एक धर्म को छोड़कर दूसरे धर्म को अपनाए या किसी भी धर्म को ना माने. इसमें राज्य का कोई दख़ल नहीं होना चाहिए. किसी भी प्रकार का क़ानूनी दख़ल व्यक्ति के निजी मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है. जहां तक जबरन धर्म परिवर्तन की बात है तो यह संघ-भाजपा द्वारा योजनाबद्ध सांप्रदायिक प्रचार के अलावा और कुछ नहीं है.

यहां तक की अगर भारत में ईसाई धर्म को मानने वालों के आंकड़ों पर भी नज़र डालें, तो संघ-भाजपा द्वारा खड़े किए गए इस हौवे की हवा निकल जाती है कि भारत में बड़े पैमाने पर लोगों को ईसाई बनाया जा रहा है या हिंदू जल्द ही अल्पसंख्यक हो जाएंगे. भारत की जनगणना के आंकड़े ही यह साबित करते हैं कि 1971 के बाद से भारत में ईसाइयों की संख्या या तो स्थिर बनी हुई है या घट रही है.

1971 की जनगणना के अनुसार, ईसाई भारत की कुल आबादी का 2.6% थे, 2011 की जनगणना तक यह गिनती घटकर 2.3% पर आ गई. ‘पीओ रिसर्च सेंटर’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में ऐसा बहुत कम होता है कि कोई व्यक्ति एक धर्म को छोड़कर दूसरे धर्म को अपनाए. इस रिपोर्ट में भारत में हिंदू धर्म को छोड़कर अन्य धर्मों को अपनाने और अन्य धर्मों से हिंदू धर्म में आने के तुलनात्मक सर्वेक्षण का भी जि़क्र है. यह रिपोर्ट विभिन्न धार्मिक पृष्ठभूमि के 30,000 लोगों के सर्वेक्षण पर आधारित है.

रिपोर्ट के अनुसार, 0.7% लोगों ने कहा कि उनका पालन-पोषण एक हिंदू के रूप में हुआ था, लेकिन अब उनकी एक अलग धार्मिक पहचान है. लगभग इतने ही लोगों 0.8% ने कहा कि उनका पालन-पोषण हिंदू के रूप में नहीं हुआ था, लेकिन अब उनकी पहचान हिंदू के रूप में है. इसका मतलब है कि हिंदू धर्म छोड़कर दूसरे धर्मों में जाने और दूसरे धर्मों से हिंदू धर्म अपनाने वालों की संख्या लगभग बराबर है. यदि किसी की आंखों पर सांप्रदायिक नफ़रत का चश्मा ना चढ़ा हो तो वह साफ़ देख सकता है कि ‘धर्म परिवर्तन’ के नाम पर धार्मिक कट्टरपंथियों द्वारा चीख़ने-चिल्लाने का कोई वास्तविक आधार नहीं है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मुसलमानों और ईसाइयों को विदेशी मानता है और सिखों को हिंदू धर्म का हिस्सा मानते हुए उनके अलग अस्तित्व को नकारता है. संघ-भाजपा ‘जबरन धर्म परिवर्तन’ के पूरी तरह से झूठे प्रचार के आधार पर अपने सांप्रदायिक एजेंडे को लागू कर रहे हैं और राज्यों के बाद अब इसे केंद्रीय स्तर पर क़ानूनी हथियार उपलब्ध कराने की कोशिशें की जा रही हैं. सुप्रीम कोर्ट में चल रहा ताज़ा मामला भी ऐसी ही एक कोशिश है.

  • तजिंदर (मुक्ति संग्राम)

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