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जेल प्रशासन और सरकार ने ली वयोवृद्ध माओवादी नेता की जान

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प्रसिद्ध वयोवद्ध प्रतिबन्धित संगठन सीपीआई-माओवादी के नेता शिवशंकर रजक उर्फ त्यागी जी उर्फ शिवाजी उर्फ बाबा का कल रात पीएमसीएच में इलाज के दौरान मौत हो गई. वे डायबीटिज, किडनी, मोतियाबिन्द समेत कई गंभीर रोगों से ग्रसित थे. विगत चार वर्षों से वे विभिन्न कांडों के सिलसिले में जेल में बंद थे. कई केस में जमानत मिल गई थी और कुछ में सुनवाई चल रही थी.

विदित हो कि पूर्व में जब वे जहानाबाद जेल में बंद थे तब माओवादियों ने जेल ब्रेक कर उन्हें छुड़ा लिया था. उनके दामाद उदय रजक ने बताया कि वे कई गंभीर रोगों से ग्रसित थे, जिसका जेल प्रशासन की ओर से कभी समुचित इलाज नहीं किया गया. जेल प्रशासन और सरकार की मिलीभगत ने उनकी जान ले ली. उन्होंने मानवाधिकार आयोग से इस मामले का संज्ञान लेने तथा जेल प्रशासन पर मानवाधिकार उल्लंघन की जांच की मांग की है.

इससे पहले भी प्रतिबन्धित संगठन सीपीआई-माओवादी के केन्द्रीय कमिटी के नेता किसान दा, उनकी पत्नी समेत कई अन्य लोगों को पुलिस ने तब पकड़कर जेल में डाल दिया जब वे इलाज कराने के लिए जा रहे हैं. प्रतिबन्धित उग्रवादी संगठन सीपीआई-माओवादी ने पर्चे जारी कर बार-बार उनके इलाज के लिए सरकार से मांग किया, लेकिन सरकार के कान पल जूं तक नहीं रेंग रही है.

इसी तरह 84 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता फादर स्टेन स्वामी जिनकी जबान लड़खड़ाती थी, कांपते हाथों से सही से खाना-पानी तक नहीं पी पाते थे, प्रतिक्रियावादी संघी दलाल कुत्ते जजों ने उनको पानी पीने तक के लिए एक स्ट्रॉ तक नहीं दिया, फलतः जेल में तड़प-तड़प कर फादर स्टेन स्वामी मौत को गले लगा लिये.

कहना न होगा मानवताशून्य न्याय के ये कठपुतले जजों की संवेदना तभी जागती है जब हत्यारों और बलात्कारियों का मामला हो. जब अर्नब गोस्वामी जैसे संघी दलाल का मामला हो, बांकी तो एक जज ने कह ही दिया है कि हत्यारा और बलात्कारी ही देश का भविष्य है. संवेदनशून्य राजसत्ता की नीचता देखिये जिन पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को वह जेलों डालकर मौत के घाट उतारने को तत्पर रहती है, उन्हें ही बाद में देश का शान भी बताती है.

कल ही प्रतिबन्धित संगठन सीपीआई-माओवादी के सदस्य जी. एन. साईबाबा की किताब का लोकार्पण ब्रिटेन के बुकर पुरस्कार से पुरस्कृत इंडियन इंग्लिश राइटर अरुंधति राय ने दिल्ली के लुटियंस जोन के रायसीना रोड स्थित जवाहर भवन में किया. साईबाबा नागपुर की जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं. उन्हें अदालत ने यूएपीए के तहत दोषी पाया था.

यूएपीए के तहत सजा काट रहे ‘उग्रवादी’ की किताब के विमोचन की खबर देश की सबसे बड़ी न्यूज एजेंसी पीटीआई ने चलायी और साईबाबा के परिचय में लिखा – जेल में बन्द मानवाधिकार कार्यकर्ता ! कॉपी के अन्त में बताया गया कि भाईसाहब यूएपीए के सजायाफ्ता हैं. साईबाबा दिल्ली यूनिवर्सिटी में इंग्लिश का प्रोफेसर रहे हैं. उनकी किताब सम्मानित प्रकाशक स्पीकिंग टाइगर ने छापी है.

इससे पहले एक अन्य माओवादी विचारक माने जाने वाले कोबाद गांधी की किताब रोली बुक्स ने छापी थी. कोबाद गांधी ने किताब आने के बाद जितने इंटरव्यू दिए उन सबमें उसने जोर दिया कि उसे भारत की पांच अदालतों ने माओवादी पार्टी से किसी तरह का सम्बन्ध होने के आरोप से बरी किया है. हलांकि बाद में कोबाद गांधी को सीपीआई-माओवादी ने बकायदा प्रेस विज्ञप्ति जारी कर पार्टी से निष्कासित कर दिया है.

दलित कैमरा डॉट काम के अनुसार साईबाबा साल 2009 में चले ऑपरेशन ग्रीनहंट के खिलाफ प्रमुख आवाज थे. यह अभियान माओवादियों के सफाए के लिए चलाया गया था. उस समय देश में कांग्रेस नीत गठबंधन की सरकार थी और गृहमंत्री पी. चिदम्बरम थे, जिनके मातहत यह अभियान चलाया गया. कल उसी जी. एन. साईबाबा की किताब का विमोचन कांग्रेस की मांद जवाहर भवन में हुआ.

इसी तरह लंबे समय तक जेल में बंद बरबरा राव को भी जेल में डालकर मौत के मूंह में पहुंचा दिया गया था और अभी भी हजारों की तादाद में देश के जानेमाने पत्रकार, वकील, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता, संघर्ष करने और न्याय के लिए आवाज बुलंद करने वाले लोग जेलों में बंद हैं. तथाकथित न्यायालय और उसके जजों की आंखें फूट गई है. वह या तो मौत (जज लोया) के साये में जी रहे हैं, अथवा दलाली (गोगोई) कर रहे हैं. ऐसे डरे हुए दलालों से न्याय की कैसी उम्मीद !

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ROHIT SHARMA

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