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ईवीएम का विरोध देश की जनता के जनादेश का अनादर है ?

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ईवीएम का विरोध देश की जनता के जनादेश का अनादर है ?
ईवीएम का विरोध देश की जनता के जनादेश का अनादर है ?

कुख्यात हत्यारा और देश के सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर राज्य से तड़ीपार हुआ शख्स अमित शाह आज देश को बता रहा है कि क्या गलत है और क्या सही है. अब अमित शाह लोगों को ज्ञान दे रहा है और ज्ञान न लेने पर सीधा धमका भी रहा है कि ईवीएम का विरोध देश की जनता के जनादेश का अनादर है. इस हत्यारे को यह तक नहीं पता है कि रावण से ज्ञान लेने लक्ष्मण गया था या राम, वह अब लोकतंत्र पर राय सूझा रहा है. सुन लो भाई !

लोकतंत्र में, अगर वह सचमुच में है, तो देश के हर नागरिक को देश की जिम्मेदार हर संस्थानों से सवाल करने का हक है. सवाल का जवाब न देने पर उसको बेईज्जत करने का अधिकार है और अगर तब भी वह जवाब नहीं देता है तो उसे सत्ता से उखाड़कर फेंकने का भी अधिकार है. इसमें कोई भी संस्था अपवाद नहीं है. यहां तक की न्यायपालिका भी नहीं और सेना भी नहीं. क्योंकि लोकतंत्र में हर संस्था सीधे जनता के प्रति जवाबदेह होता है न कि जनता उस संस्था के प्रति.

यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों को लगा कि लोकतंत्र खतरे में है तो उसने सीधे जनता को सम्बोधित किया, न कि किसी संस्था या संस्था प्रमुख को. हम जानते हैं कि ‘नरेन्द्र मोदी का नमक जनता खाती है और नरेन्द्र मोदी ने ही देश की जनता को पैदा किया है’, इसके बाद भी नरेन्द्र मोदी जनता के प्रति जवाबदेह है न कि जनता उसके प्रति. इसलिए लोकतंत्र में तमाम संस्था से जनता सवाल पूछ सकती है और उस संस्था को उसका जवाब देना होगा, चाहे वह ईवीएम ही क्यों न हो !

बहरहाल, हम यहां सीधे अमित शाह के ज्ञान की ओर आते हैं जिसमें उसने ईवीएम पर दो कौड़ी का अपनी ‘मूल्यवान’ लाय रखा है और लोगों को ललकारते और डराते हुए झूठ का पिटारा खोला है. बकौल अमित शाह सोशल मीडिया पर लिखते है –

ईवीएम का विरोध देश की जनता के जनादेश का अनादर है. अपनी संभावित हार से बौखलाई विपक्ष की यह 22 पार्टियां देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवालिया निशान उठाकर विश्व में देश और अपने लोकतंत्र की छवि को धूमिल कर रही है. इन सभी दलों की मांगों का कोई तार्किक आधार नहीं है और वह सिर्फ निजी स्वार्थ से प्रेरित है. मैं इन सभी पार्टियों से कुछ प्रश्न पूछना चाहता हूं.

प्रश्न-1: ईवीएम की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाने वाली कांग्रेस, बसपा, सपा, तृणमूल कांग्रेस, एनसीपी, आप, तेलगुदेशम पार्टी, वाम दल, राजद इत्यादि अधिकांश विपक्षी पार्टियों ने कभी न कभी ईवीएम द्वारा हुए चुनावों में विजय प्राप्त की है. जब आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में 70 में से 67 सीटों पर विजय प्राप्त की और हाल के पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 4 राज्यों में सरकार बनायी, तब तो हमने ईवीएम पर प्रश्न नहीं उठाये. तो क्या यह माना जाए कि जब विपक्ष की विजय हो तो उन्होंने चुनाव जीता और जब हार हो तो उन्हें ईवीएम ने हरा दिया ? यदि उन्हें ईवीएम पर विश्वास नहीं है तो इन दलों ने चुनाव जीतने पर सत्ता के सूत्र को क्यों सम्भाला ?

प्रश्न-2: देश की सर्वाेच्च अदालत ने तीन से ज्यादा पीआईएल का संज्ञान लेने के बाद चुनावी प्रक्रिया को अंतिम स्वरूप दिया है, जिसमें की हर विधानसभा क्षेत्र में पांच डब्ल्यूपीएटी को गिनने का आदेश दिया है, तो क्या आप लोग सर्वाेच्च न्यायालय के आदेश पर भी प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं ?

प्रश्न-3: मतगणना के सिर्फ दो दिन पूर्व 22 विपक्षी दलों द्वारा चुनावी प्रक्रिया में परिवर्तन की मांग पुर्णतः असंवैधानिक है क्योंकि इस तरह का कोई भी निर्णय सभी दलों की सर्वसम्मति के बिना सम्भव नहीं है.

प्रश्न-4: विपक्ष ने ईवीएम के विषय पर हंगामा छः चरणों का मतदान समाप्त होने के बाद ही शुरू किया है. यह हंगामा विशेषकर एक्जिट पोल के परिणाम आने के बाद और तीव्र हो गया. मैं विपक्ष को बताना चाहता हूं कि एक्जिट पोल ईवीएम के आधार पर नहीं बल्कि मतदान के पश्चात मतदाता से प्रश्न पूछ कर किया जाता है. अतः एक्जिट पोल के आधार पर आप ईवीएम की विश्वसनीयता पर कैसे प्रश्न उठा सकते हैं ?

प्रश्न-5: कुछ समय पूर्व ईवीएम में गड़बड़ी के विषय पर प्रोएक्टिव कदम उठाते हुए चुनाव आयोग ने सभी को सार्वजनिक रूप से चुनौती देकर इसके प्रदर्शन का आमंत्रण दिया था, परन्तु उस चुनौती को किसी भी विपक्षी दल ने स्वीकार नहीं किया. इसके बाद चुनाव आयोग ने ईवीएम को डब्ल्यूपीएटी से जोड़ कर चुनावी प्रक्रिया को और पारदर्शी किया. वीवीपैट प्रक्रिया के आने के बाद मतदाता मत देने के बाद देख सकता है कि उसका मत किस पार्टी को रजिस्टर हुआ. प्रक्रिया के इतने पारदर्शी होने के बाद इस पर प्रश्न उठाना कितना उचित है ?

प्रश्न-6: कुछ विपक्षी दल चुनाव के परिणाम अनुकूल न आने पर हथियार उठाने और ‘खून की नदिया बहाने’ जैसे आपत्तिजनक बयान दे रहे हैं. मैं कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों को बताना चाहता हूं कि लोकतंत्र में ऐसी हिंसात्मक सोच और भाषा का कोई स्थान नहीं है. विपक्ष बताये कि ऐसे हिंसात्मक और अलोकतांत्रिक बयान के द्वारा वह किसे चुनौती दे रहा हैं ?

सभी को पता है कि पश्चिम बंगाल को छोड़ कर सारे देश में मतदान पूरी तरह शान्तिपूर्वक संपन्न हुआ है. भारत के लोकतंत्र का इतिहास है कि 1977 से 2014 के सभी आम चुनावों में भारी परिवर्तन शांतिपूर्वक हुए जिससे देश के लोकतंत्र पर सारे विश्व की आस्था मजबूत हुई और देश का गौरव भी बढ़ा. अपने निहित स्वार्थ और पराजय को न मानने की मानसिकता के कारण विपक्ष चुनाव आयोग और देश के लोकतंत्र की छवि को धूमिल कर रहा है.

मेरा मानना है कि इस चुनाव का जो भी परिणाम आये उसे सभी को स्वीकार करना चाहिए क्योंकि यह देश के 90 करोड़ मतदाताओं का जनादेश होगा. मैं देश की जनता से भी अपील करना चाहता हूं कि ईवीएम पर विपक्ष द्वारा उठाए जा रहे प्रश्न सिर्फ भ्रान्ति फैलाने का प्रयास है, जिससे प्रभावित हुए बिना हम सबको हमारे प्रजातांत्रिक संस्थानों को और मजबूत करने का प्रयास करना चाहिए.

एक हत्यारा जब झूठा प्रलाप करता है और देश की कोई भी संस्था उसका जवाब देने में खुद को सक्षम नहीं पाती है तो यह समझ जाना चाहिए कि देश में लोकतंत्र खतरे में नहीं, बल्कि लोकतंत्र खत्म हो चुका है. जैसाकि भाजपा के बड़े बड़े नेता देश के धर्मनिरपेक्षता की छवि को खत्म कर हिन्दू राष्ट्र बनाने की वकालत करता है और प्रधानमंत्री मंद-मंद मुस्कुराते हुए खामोश रहता है. जाहिर है देश में अब संविधान निर्मित लोकतंत्र का वजूद खत्म हो गया है और जैसा कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अजय सिंह बिष्ठा ने अपने भाषण में कहा है कि अब बुलडोजर चलेगा, कानून और न्यायपालिका ताक पर रख दिये गये हैं.

बहरहाल, हत्यारा अमित शाह के लिए तो लोकतंत्र एक मजाक की चीज है, अगर किसी में कहीं लोकतंत्र का जमीर जिन्दा हो तो वे इस विडियो को देख सकते हैं कि ईवीएम पर सवाल उठाने वाले एक पत्रकार को अमित शाह कि पुलिस किस हद तक लोकतंत्र का पाठ थाने के लॉकअप में पढ़ाया, इसे देखिए –

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