Home ब्लॉग संघियों का आत्मनिर्भर भारत यानी शिक्षामुक्त, रोजगारमुक्त, अस्पतालमुक्त भारत

संघियों का आत्मनिर्भर भारत यानी शिक्षामुक्त, रोजगारमुक्त, अस्पतालमुक्त भारत

5 second read
0
0
453

संघियों का आत्मनिर्भर भारत यानी शिक्षामुक्त, रोजगारमुक्त, अस्पतालमुक्त भारत

भारत का शासक संघी एजेंट नरेन्द्र मोदी भारत को शिक्षामुक्त, रोजगारमुक्त, अस्पतालमुक्त भारत बनाने का जो सपना देख रहा है, वह बीते आठ सालों में सच साबित होने जा रहा है. पिछले तीन सालों से कोरोना जैसी फर्जी महामारी के नाम पर स्कूल-कॉलेजों को बंद कर अगली पीढ़ी को लगभग शिक्षामुक्त कर ही दिया है. 2 करोड़ प्रतिवर्ष रोजगार देने के नाम पर करीब 20 करोड़ लोगों को रोजगारमुक्त कर चुका है. इसी तरह अस्पतालों को भी विलासिता की सामग्री में शामिल कर इसे भी खत्म करने की कवायद की जा रही है.

बहरहाल, नरेन्द्र मोदी कैबिनेट के एक केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता कपिल पाटिल ने ऐसा ही दावा किया है. बकौल कपिल पाटिल महाराष्ट्र के ठाणे जिले के कल्याण शहर में शनिवार रात आयोजित एक कार्यक्रम में पंचायती राज मामलों के राज्य मंत्री कपिल पाटिल ने यह भी कहा कि मोदी आलू और प्याज के दाम नीचे लाने के लिए प्रधानमंत्री नहीं बने हैं. बल्कि वे प्रधानमंत्री इसीलिए बने हैं कि पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर भारत में आ जाये. इसके लिए हम सभी को आलू, प्याज, तुअर दाल और मूंग दाल आदि की बढ़ती कीमतों पर हमें बात नहीं करनी चाहिए.

भारत की करोड़ों जनता का मजाक उड़ाते हुए इस बहियात केंद्रीय मंत्री ने व्याख्यान के दौरान कहा कि लोग 700 रुपये में मटन और 500-600 रुपये में पिज्जा खरीद सकते हैं, लेकिन ‘10 रुपये का प्याज और 40 रुपये का टमाटर हमें भारी लगता है.’ सवाल उठता है ये 700 रूपये का मटन और पिज्जा कौन खाता है ? क्या यह 80 करोड़ वे लोग खाते हैं जिसे नरेन्द्र मोदी की भोगी सरकार हर महीना 5 किलो आटा-चावल भीख में देता है ? अगर ये 80 करोड़ लोग सच में मटन और पिज्जा खाता है तो मोदी सरकार आखिर मोदी झोला में 5 किलो आटा-चावल क्यों देता है ?

भारतीय नागरिकता को लात मारकर भागते भारतीय

क्या मोदी सरकार देश को भिखारियों, अनपढों और बीमार लोगों का देश बनाना चाहता है ? आखिर क्यों पाकिस्तान से अपनी प्रतिद्वंद्विता कर खुद को बंगलादेश भी से बुरी हालत में ले आया है ? कभी बंगलादेशी घुसपैठियों को भगाने के नाम पर लोगों को मारने-काटने और भगाने का प्रपंच रचने वाली यह सरकार आखिर यह क्यों नहीं बताना चाहती है कि अब बंगलादेशी नहीं, बल्कि भारतीय बंगलादेश की ओर भाग रहा है. भारतीय सारी दुनिया में हर साल पलायन कर रहा है. सरकारी आंकड़े ही बता रहे हैं कि हर साल लाखों भारतीय भारत की नागरिकता को लात मारकर विदेशों में भाग रहे हैं. यहां तक अंबानी घराना भी, जिसकी नौकरी यह सरकार कर रही है, वह भी इस देश को छोड़कर इंगलैंड में पनाह ले लिया है.

भारत का गृह मंत्रालय ने 2014 के बाद से भारत की नागरिकता को लात मारकर विदेशों में शरण लेने वाले भारतीयों का आंकड़ा जारी किया है, इसके अनुसार – साल 2015 में 1,41,656 भारतीयों ने भारत की नागरिकता को लात मार कर विदेशों में शरण लिया. इसी तरह साल 2016 में कुल 1,44,942 भारतीयों ने भारतीय नागरिकता को लात मारी. 2017 में भारतीय नागरिकता छोड़ने वाले लोगों का आंकड़ा 1,27,905 रहा. साल 2018 में 1,25,130 और साल 2019 में 1,36,441 लोगों ने भारतीय नागरिकता को लात मारी. आंकड़ों में यह भी बताया गया है कि भारत की नागरिकता को लात मारकर विदेशों में शरण लेने वाले कुल भारतीयों की संख्या 1,24,99,395 है.

कई जानकारों का मानना है कि भारत से बड़ी संख्या में हो रहे पलायन की वजह आमतौर पर बेहतर करियर, आर्थिक संपन्नता और बच्चों का भविष्य बड़े कारण रहते हैं. रिपोर्ट्स के अनुसार, बीते कुछ सालों में देखा गया है कि विदेश पढ़ाई के लिए जाने वाले लोगों में से करीब 80 फीसदी लोग वापस भारत लौटते ही नहीं हैं और विदेशों में ही बस जाते हैं. माना जा रहा है कि आने वाले सालों में इस पलायन में और बढ़ोत्तरी देखने को मिल सकती है. इसकी वजह ये है कि अब बड़ी संख्या में भारतीय पढ़ाई के लिए विदेश जा रहे हैं. ऐसे में भारतीय नागरिकता छोड़ने वाले लोगों की संख्या में बढ़ोत्तरी की आशंका है.

शिक्षामुक्त, रोजगारमुक्त, अस्पतालमुक्त भारत में कौन रहना चाहेगा ?

यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है. शिक्षामुक्त, रोजगारमुक्त और अस्पतालमुक्त भारत में भारत की वह बदनसीब लोग रहेंगे जो इस देश को छोड़कर भाग पाने की हैसियत में नहीं है. इस देश में वह बदनसीब लोग रहेंगे और अपने मालिकों के ऐशोआराम का बोझ अपने झुके हुए कंधों पर उठायेंगे जो ‘देश-देश’ के फर्जी मायाजाल में फंसकर खुद को और अपने आने वाली पीढ़ियों को गुलाम बनाने के लिए कृतसंकल्पित हैं.

दूसरे इस देश में वे थोड़े से लोग रहेंगे जो मालिक कहें जायेंगे. इन मालिकों की हिफाजत और सुरक्षा के लिए करोड़ों की तादाद में सेना और पुलिस रहेगी, जो गुलाम बनने से विरोध करने वाले लोगों को कत्ल करेगी, उसकी सम्पत्ति लूट लेगी, उसकी बहन-बेटियों की इज्जतें सरेआम लूटेगी. सिर्फ यही मालिक, उसके गुलाम और उसके कारिन्दे ही इस देश में रहेगा या बचेगा.

रास्ता क्या बचता है ?

जो लोग भारत में अब किसी भविष्य की संभावना की तलाश किसी संसदीय राजनीतिक दलों के उत्थान-पतन में ढूंढ़ रहे हैं, और यह उम्मीद कर रहे हैं कि फासिस्ट आरएसएस समर्थित भाजपा को चुनावों के माध्यम से पराजित कर सत्ता से बेदखल कर एक नये भारत का निर्माण कर सकेंगे तो कहना होगा यह केवल से मुगालता है. चुनाव हो अथवा न हो भाजपा को अब कभी भी सत्ता से बेदखल नहीं किया जा सकता है. ऐसा क्यों ?

इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमें एक बार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के महज चार साल बाद शासनकाल के बाद हुए चुनाव में देखना चाहिए. ट्रंप चुनाव में हारने के बचने के लिए तमाम हथकंडे अपनाये. चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट, अखबार, सोशल मीडिया आदि को खरीदने या उसमें अपने एजेंट घुसाने का (राष्ट्रपति पद का दुरूपयोग करते हुए) भरपूर प्रयास किया. लेकिन जब बात इससे भी नहीं बनी तब ट्रंप ने अपने बंदुकधारी समर्थकों को उकसाकर जबरन सत्ता पर कब्जा करना चाहा, जिसे अमेरिकी प्रशासक ने विफल कर दिया. इस परिघटना को सारी दुनिया ने सहमते हुए देखा.

एक बार सोचने की जरूरत है, जब महज 4 सालों के शासनकाल में डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के प्रशासन और आम लोगों को बीच जब एक प्रतिक्रियावादी ताकतों को इकट्ठा कर सत्ता पर कब्जा करने के लिए हथियारबंद ताकतों को जुटा सकता है, तब तो भारत जैसे ‘मंदबुद्धि’ लोगों के देश में पिछले सौ साल से कार्यरत आरएसएस के हथियारबंद प्रतिक्रियावादी गुण्डों का तो कहना ही क्या. इसके अलावा आरएसएस के इस प्रतिक्रियावादी गुंडों ने न केवल 2014 तक में देश की सत्ता पर ही कब्जा जमा लिया अपितु देश के तमाम संवैधानिक संस्थाओं (सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग, जांच एजेंसियों) समेत देश की सेना और पुलिस के बीच भी अपने प्रतिक्रियावादी संघी गुण्डों को न केवल नीचे स्तर पर बल्कि सर्वोच्च स्तर पर भी घुसा दिया है, जो आरएसएस के द्वारा सत्ता पर बलपूर्वक कब्जा जमाने की किसी भी कोशिश का मददगार हिस्सा होगा.

ऐसे में आरएसएस को सत्ता से हटाने के लिए किसी भी चुनावी या संवैधानिक कोशिशें तबतक संभव नहीं हो सकेगी, जब तक कि आम जनता अपनी सुरक्षा के लिए अपना हथियारबंद सेना का गठन कर आरएसएस जैसे प्रतिक्रियावादी गुंडों का मुकाबला कर सफाया नहीं कर देती क्योंकि फासिस्ट गुंडों किसी तरह के बहस में भाग नहीं लेता, उसको केवल खत्म ही किया जा सकता है.

प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें]

Load More Related Articles
Load More By ROHIT SHARMA
Load More In ब्लॉग

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also

‘Coup pour Coup’ (Blow for Blow) : फ्रांस के टेक्सटाइल महिला मजदूरों की कहानी

‘Coup pour Coup’ (Blow for Blow). यह फिल्म फ्रांस के टेक्सटाइल महिला मजदूरों की कहानी है. …