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चीनी अर्थव्यवस्था के संकट

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चीनी अर्थव्यवस्था के संकट

चीन इस वक़्त दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और पिछले समय में 2008 की महामंदी के बाद यह लगातार अपने और संयुक्त राज्य अमरीका की अर्थव्यवस्था में मौजूद फ़र्क़ ख़त्म करती आई है और अर्थव्यवस्था के कई पक्षों से तो यह दुनिया में सबसे अग्रणी देश बन गया है. मसलन, इस वक़्त चीन दुनिया में से सबसे बड़ा औद्योगिक और सबसे ज़्यादा व्यापार करने वाला देश है. इसके साथ ही इसके पास दुनिया में सबसे अधिक विदेशी मुद्रा के भंडार पड़े हैं.

पिछले वक़्त में ख़ासकर 21वीं सदी में यहां बेहद तेज़ शहरीकरण हुआ है, इतना तेज़ कि पूरे विश्व इतिहास में ऐसी कोई अन्य मिसाल देखने को नहीं मिलती. ऐसे देश में जहां 70 फ़ीसदी के क़रीब लोग गांवों में रहते हैं, पलक झपकते ही 60 फ़ीसदी आबादी पक्के तौर पर शहरों में बस चुकी है और कितने ही और लोग कच्चे तौर पर शहरों में रह रहे हैं या शहरों में अपनी रोज़ी-रोटी कमाने हर रोज़ आते हैं.

शहरीकरण की यह अप्रत्याशित गति पिछले समय में चीनी अर्थव्यवस्था की तेज़ रफ़्तार विकास का ही एक इज़हार है. चीन के इस तेज़ रफ़्तार विकास ने ही पिछले समय में विश्व अर्थव्यवस्था की मंद पड़ी आर्थिक वृद्धि दर को थोड़ा बहुत धक्का मारा है और यह चीनी अर्थव्यवस्था ही थी, जो कोरोना काल में भी कुछ हद तक अपने कुल घरेलू उत्पादन बढ़ाने में कामयाब रही.

मुख्यधारा के बहुतेरे अर्थशास्त्रियों ने कोरोना काल के बाद जो विश्व अर्थव्यवस्था के जल्द ही फिर से स्वस्थ होने की भविष्यवाणियां की थीं, वे अधिकतर इस उम्मीद पर आधारित थीं कि चीनी अर्थव्यवस्था ना केवल इसी रफ़्तार पर बढ़ती रहेगी, बल्कि और अधिक तेज़ी से बढ़ेगी जिससे विश्व अर्थव्यवस्था को फिर से पैरों पर खड़ा होने के लिए ज़रूरी मदद मिलेगी.

लेकिन अब हाल ही में चीन के रिएल एस्टेट क्षेत्र में आए संकट से, जिसमें रिएल एस्टेट की दो बड़ी कंपनियों एवरग्रांदे और फैंटासीया तो अपने क़र्ज़े लौटाने से साफ़ तौर पर असमर्थ हो चुकी हैं, विश्व अर्थव्यवस्था के जल्द ही फिर से स्वस्थ होने के ख़्याली सपनों पर पानी फिर गया है. और मुख्यधारा में भी बड़ी संख्या में अर्थशास्त्री अब विश्व स्तर पर आर्थिक संकट की बात को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर कबूल रहे हैं. यहां आर्थिक संकट की ज़्यादा व्याख्या ना करते हुए हम चीन की मौजूदा हालत पर एक नज़र डालने की कोशिश करेंगे और इसकी अर्थव्यवस्था के मूंहबाए खड़े संकट के बारे कुछ चर्चा करेंगे.

चीनी अर्थव्यवस्था का मौजूदा संकट

चीनी अर्थव्यवस्था के मौजूदा संकट के बारे में बात करने से पहले चीन की अर्थव्यवस्था के बारे में कुछ बुनियादी तथ्यों के बारे में स्पष्टता ज़रूरी है. मुख्यधारा के अर्थशास्त्र और मीडिया का एक अच्छा-ख़ासा हिस्सा अभी भी चीन को समाजवादी और यहां तक कि कम्युनिस्ट देश की तरह लेते हैं और चीनी अर्थव्यस्था के मौजूदा संकट को इस तरह पेश कर रहे हैं, जैसे यह समाजवादी अर्थव्यवस्था का संकट हो.

इस तरह लोगों में यह भी प्रचार किया जा रहा है कि देखो पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की भांति समाजवादी अर्थव्यवस्था भी गंभीर संकट का शिकार होती है, और समाजवाद और पूंजीवाद में कुछ बहुत अधिक बुनियादी अंतर नहीं होता (इनके मुताबिक़ तो पूंजीवादी अर्थव्यवस्था अधिक जनपक्षधर होती है !).

इस प्रसंग में यह बात साफ़ करनी ज़रूरी है कि चीन 1976 में माओ की मौत के बाद ही समाजवाद से पूंजीवादी देश बन चुका था और इसके बाद इसकी अर्थव्यवस्था का विकास पूंजीवादी मार्ग पर हुआ है और इसके संकटों के कारणों और हल को भी पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के संकटों के चौखटे में ही समझने की ज़रूरत है.

1976 के बाद शुरुआत में राजकीय पूंजीवादी प्रबंध के अधीन और बाद में निजी पूंजीवाद के अधीन चीनी अर्थव्यवस्था एक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ही रही है और इस समय चाहे एक हद तक राजकीय पूंजीवाद बचा हुआ है, लेकिन अर्थव्यवस्था में मुख्य भूमिका निजी क्षेत्र की हो चुकी है.

चीनी अर्थव्यवस्था के समाजवादी होने का एक भ्रम वहां की शासक पार्टी के नाम से होता है, जिसका अभी भी नाम कम्युनिस्ट पार्टी ही है लेकिन जैसे कुत्ते का नाम यदि शेर रख दें, तो वह वास्तव में शेर नहीं बन जाता, वैसे ही चीन की शासक कम्युनिस्ट पार्टी नाम की ही कम्युनिस्ट है, लेकिन असल में यह वहां के पूंजीपतियों (दोनों निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के) की ही पार्टी है और उनके हितों को ही समर्पित है.

भारत में इस भ्रम को कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी असल में कम्युनिस्ट है, को और दृढ़ करने का काम यहां की नक़ली कम्युनिस्ट पार्टियां ख़ासकर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) करती है. चीनी अर्थव्यवस्था को लेकर बाक़ी बात करने से पहले यह बात साफ़ करनी ज़रूरी थी कि चीनी अर्थव्यवस्था एक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था है, क्योंकि फिर ही इसके मौजूदा संकट को सही तरीक़े से समझा जा सकता है.

चीनी अर्थव्यवस्था की मौजूदा हालत को समझने के लिए यहां एक संक्षेप-सा पुनरावलोकन ज़रूरी है. चीनी अर्थव्यवस्था के इतिहास के इस वर्णन के लिए ‘ललकार’ के सितंबर 2015 के संपादकीय की मदद ली गई है. 1976 में चीनी क्रांति के रहनुमा कॉमरेड माओ-त्से-तुङ की मौत के बाद एक तख्तापलटे के ज़रिए देंग सियाओ पिंग पंथी संशोधनवादी (यानी नक़ली कम्युनिस्ट) चीन की राज्य सत्ता पर क़ाबिज़ हो गए और चीन को पूंजीवादी रास्ते पर डाल दिया. उसके बाद वहां वे सभी समस्याएं सामने आने लगीं जो किसी भी पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में अंतर्निहित होती हैं.

1976 में चीन की राज्यसत्ता पर क़ाबिज़ हुए देंगपंथियों ने चीनी अर्थव्यवस्था को देशी-विदेशी लूटेरों के लिए खुली चरागाह में बदल दिया. विकसित देशों की अर्थव्यवस्थाओं में मुनाफ़े की दर घटने से अतिरिक्त उत्पादन और अतिरिक्त पूंजी से फूले साम्राज्यवादी देशों की पूंजी का बहाव चीन की ओर तेज़ी से बढ़ा. इससे लगभग दो दशक तक चीन की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर क़ाफ़ी ऊंची रही, जिससे पूंजीवाद के बुनियादी नियमों से अनजान बुद्धिजीवियों में कई तरह के भ्रम पैदा हुए.

1976 के बाद पूंजीवादी राह पर चलकर चीन ने जो आर्थिक वृद्धि दर हासिल की, यह समाजवादी चीन (1949-76) से बुनियादी तौर पर ही भिन्न थी. समाजवादी चीन ने जो आर्थिक वृद्धि दर हासिल की थी, उसकी दिशा अंतर-क्षेत्रीय, अंतर-व्यक्ति, गांव और शहर के अंतर मिटाने की ओर थी. समाजवादी चीन में बेरोज़गारी का नामोनिशान तक नहीं था. शिक्षा, सेहत सुविधाओं और जीवन की अन्य बुनियादी ज़रूरतों तक समाजवादी चीन के सब नागरिकों की समान पहुंच थी.

यहां तक कि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि यह घरेलू तकनीक आदि के क्षेत्र में समाजवादी चीन की विरासत ही थी, जिसने एक हद तक पूंजीवादी चीन को तकनीकी क्षेत्र में साम्राज्यवादी देशों के साथ मुक़ाबला करने में सक्षम बनाया. लेकिन पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के अवाम पर हानिकारक परिणाम जल्द ही देखने को मिलने लगे और 1976 में पूंजीवादी पुनर्स्थापना के बाद चीन में अंतर-व्यक्ति, अंतर-क्षेत्रीय, गांव और शहर के बीच अंतर तेज़ी से बढ़ने लगे.

बेरोज़गारी और असमानता विस्फोटक रूप धारण कर गई. इस सदी के शुरू से ही पूंजीवादी चीन की आर्थिक उन्नति का भी रोगन उतरना शुरू हो गया था. मुनाफ़ों के सिकुड़ने से यहां भी बाक़ी पूंजीवादी देशों की तरह मुनाफ़ाखोरी का संकट उभरा और इसका अर्थव्यवस्था संकट का शिकार होने लगी.

चीन की आर्थिक वृद्धि दर में एक बड़ा सहायक कारक धड़ा-धड़ हो रहा निर्माण (मकान आदि) था. 2008 के संकट के बाद चीनी सरकार ने अर्थव्यवस्था को धक्का मारने के लिए इसमें 500 अरब डॉलर का निवेश किया और यह निवेश अधिकतर निर्माण क्षेत्र में ही किया गया. मकान इतने ज़्यादा बनाए गए कि उनके लिए ख़रीदार मिलने मुश्किल हो गए. आज के चीन में करोड़ों मकान ख़ाली पड़े हैं. मकान निर्माण ने चीनी अर्थव्यवस्था को तेज़ी दी थी. यह गुबारा पहली बार 2015 में फटा.

चीन का बाक़ी उद्योग (ख़ासकर ऑटो उद्योग) एक दशक से भी अधिक समय पहले ही मुनाफ़ाखोरी के संकट से जूझ रहा था और अब भी जूझ रहा है. 2015 और ख़ासकर कोरोना काल के बाद चीन के शासक क़र्ज़ विस्तार के ज़रिए, जिसका मुख्य लाभ रिएल एस्टेट कंपनियों को मिल रहा था, जोकि इन क़र्ज़ों को उत्पादन क्षेत्र से भी अधिक सट्टेबाजी के लिए इस्तेमाल कर रहे थे, किसी-ना-किसी तरह गाड़ी को धक्का मारे जा रहे थे, लेकिन अब 2008 जैसे गुबारे के डर से जब चीनी सरकार ने एक हद से अधिक क़र्ज़दार कंपनियों को और क़र्ज़ा देने पर रोक लगाई तो इसका फ़ौरी परिणाम एवरग्रांदे और फैंटासीया के संकट में देखने को मिला.

वास्तव में केवल ये कंपनियां या केवल यह क्षेत्र ही नहीं, बल्कि कई कंपनियां बग़ैर क़र्ज़े और सट्टेबाजी से अपने कारोबारों से और मुनाफ़ा कमाने में समर्थ नहीं हैं. साफ़ है कि चाहे चीनी अर्थव्यवस्था अन्य साम्राज्यवादी देशों की अर्थव्यवस्थाओं से अपेक्षाकृत मज़ूबत स्थिति में है, लेकिन इसके बावजूद यह ख़ुद मुनाफ़ाखोरी के गहरे संकट का शिकार है और इसकी सांस भी क़र्ज़े के सहारे ही चल रही है.

चीनी सरकार आर्थिक संकट को टालने के लिए कोई भी नीति, कोई भी तरीक़ा क्यों ना अपनाए, देर-सवेर इसका फटना तय है, यह पूंजीवाद का अटल नियम है. कुछ आर्थिक ‘विशेषज्ञों’ की भविष्यवाणी के उलट चीन विश्व अर्थव्यवस्था का संकटमोचक नहीं खु़द आर्थिक संकट की उसी नाव में सवार है, जिसमें बाक़ी देश सवार हैं.

अंत में

इस पूरे संकट के माहौल में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का सरगना ज़ी जिनपिंग कई निजी पूंजीपतियों, कॉर्पोरेट कंपनियों, अन्य हस्तियों पर सख़्ती करने, इन पर कर बढ़ाने और आम लोगों की हालत बेहतर करने के झूठे दावे कर रहा है. कुछ लोग, जिनमें कई ईमानदार लोग भी आते हैं, इस बात में समाजवाद जैसा कुछ देख रहे हैं, पूंजीवादी असामनता के उलट समानता भरे समाज का निर्माण देख रहे हैं, लेकिन भेड़िए का भेड़-सा रूप धारण करने से उसका ख़ूंखारपन ख़त्म नहीं हो जाता, बल्कि वह भोली-भाली भेड़ों के लिए और ख़तरनाक़ साबित होता है.

वास्तव में ज़ी जिनपिंग जो कह रहा है और जो करने की कोशिश कर रहा है उसके पीछे मुख्य मक़सद इस पूंजीवादी ढ़ांचे की जनाक्रोश से रक्षा ही है. चाहे चीन के निजी पूंजीपतियों पर जो रोके लग रही हैं, कम्युनिस्ट पार्टी के कुछ आला नेताओं को भ्रष्टाचार के लिए सख्ती की जा रही है, उसके पीछे एक कारण वहां के अलग-अलग पूंजीवादी धड़ों का आपसी अंतर्विरोध का परिणाम है.

लेकिन ज़ी जिनपिंग और कम्युनिस्ट पार्टी की हाल की नीतियों की लुभाने वाली भाषा के पीछे असल मंशा आर्थिक संकट के कारण अवाम में बढ़ रहे ग़ुस्से पर ठंडे छींटे मारना है. यह शासक अपने दमन और चालाकी दोनों से हर तरीक़े से इस लूटेरे पूंजीवादी ढ़ांचे को बचाकर रखना चाहते हैं, लेकिन समाजवादी चीन की विरासत संभाले हुए चीन की मेहनतकश अवाम लाज़िमी ही देर-सवेर इन नक़ली कम्युनिस्टों को नेस्तेनाबूद करके वहां समाजवाद की, एक जनपक्षधर व्यवस्था का पुनर्निर्माण करेगी.

  • ‘मुक्ति संग्राम’ से साभार

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