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बस ढाई सौ बरस में किसानों को खा गया अंग्रेज़ी क़ानून

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अंग्रेज़ों की वैज्ञानिक और आधुनिक देन से इन्कार नहीं, पर भारत के खाते कमाते गांवों और किसानों को भूखा नंगा व कंगाल भी वही बना कर गए. याद रखना, यदि किसान पराजित हुआ तो यह उसकी निर्णायक पराजय होगी. भारत के गाँवों की दुर्गति जो ढाई सौ बरस पहले कम्पनी राज से शुरू हुई, वह घटिया दर्जे के शहरीकरण और शोचनीय मज़दूरीकरण पे जा कर ख़त्म होगी.

बस ढाई सौ बरस में किसानों को खा गया अंग्रेज़ी क़ानून

राजीव कुमार मनोचा

किसान कभी बहुत ऊपर न उठा, पर कभी इतना नीचे भी न डाला गया. और यह भी सच है कि किसान को सामंतों से भी अधिक बनियों ने मारा. बात पेशे की है, जाति की नहीं.

भारत हो अथवा यूरोप का कोई भी देश. पुरातन युग से मध्यकाल तक किसानों की दशा एक सी रही न सावन सूखे, न भादों हरे. खा कमा लो, गुज़र बसर किये चलो. यद्यपि भूखनंग जैसी लानत न के बराबर रही. रोटियों के लाले बहुत कम पड़े. वह अगर सुखी नहीं तो कोई बहुत दुखी भी नहीं था. उसके जीवन को बुरा नहीं कहा जा सकता. उसका स्वभाव इसकी गवाही देता है. वह शहरियों से अधिक सीधा, सरल, मज़बूत और दयाधर्मी ही नहीं, सैन्य गुणों से परिपूर्ण भी रहा है

भारत में मध्यकालीन किसान सामंतों जागीरदारों के हवाले था. वे ही बादशाहों की ओर से तमाम उगाहियां करते. प्राचीन भारत में भी किसान राजा को विभिन्न माध्यमों से कर अदा किया करता. साधारण किसान सदा यों ही खाता कमाता गुज़र बसर करता रहा लेकिन मैगस्थनीज़ से लेकर फाह्यान और हुएनसांग तक, और अलबेरुनी से लेकर शुरुआती अंग्रेज़ इतिहास साक्षियों तक किसी ने कभी उसकी दुर्दशा अथवा शोचनीय हालात जैसी कोई बात न की.

यहाँ तक कि नानक, कबीर जैसे आमजन से जुड़े ग्रामीण संतों तक ने ऐसे किसी दोहे छंद की रचना न की जिसमें किसान भूखों मरता, दर दर फिरता उजागर हुआ हो. मध्यकाल के इतिहास में आक्रांताओं द्वारा हमलों और प्राकृतिक आपदा, महामारी आदि के चलते ग्रामीण आबादी के शिफ़्ट होने की घटनाएं ज़रूर मिलती हैं.

यह एक कटु सत्य है कि दवाएं ही बीमारी का इलाज होती हैं और वही फिर नई बीमारियां भी ले कर आती हैं. किसानी दुर्दशा का भी कारण भारत में यही दवा थी जिसे अंग्रेज़ी क़ानून कहते हैं. वह जो व्यवस्था हित लाए गए किन्तु जिनकी संवेदनहीनता और चतुराई भरे इस्तेमाल ने एक नई व्यवस्था को जन्म दिया, जिसे महाजनी कहते हैं.

वैश्य, वणिक या बनिया जो भी आप उसे कहें, सदा मौजूद थे. इनमें बहुत से मालदार व प्रभावशाली वणिक भी हमेशा वजूद में आते रहे, किन्तु शहरों नगरों में. गाँव का औसत बनिया वहाँ के पंसारी, तेली या सामान विक्रेता से अधिक कुछ न था. वह छोटा मोटा क़र्ज़ भी देता और लोग रामायण गीता पर हाथ रख चुकाने का वादा कर जाते, जैसे तैसे चुका भी देते.

लेकिन ईस्ट इंडिया कम्पनी और उसके द्वारा लाये अंग्रेज़ी क़ानून भारतीय बनियागिरी के लिए इंक़लाबी परिवर्तन ले कर आए. इनमें कुछ ऐसे प्रावधान थे जो पहले कभी देखे सुने न गए. बनिया महाजन अब क़ानून से लैस हो गए थे. यही नहीं, वे बड़े ज़मींदार जो पहले ही बहुत रौब दाब रखते थे अब क़ानून की मदद से अत्याचारी भी बन उठे. वे क़र्ज़ के बदले बैल खोल ले जाते, ज़मीनों पर चढ़ बैठते.

इन सबके हाथ अंग्रेज़ी क़ानून लग गया था जो केवल काग़ज़ की बात पढ़ता और किसान के अंगूठे का मिलान करता था. अंगूठे के ऊपर ख़ाली सफ़े पर क़र्ज़ का विवरण किसने, कितना और क्यों लिखा, उसे कोई ग़रज़ न थी. न ही उसे गीता रामायण की क़सम से कोई मतलब था, न किसी ग्रामीण संवेदना से कोई सरोकार.

नालिश, कुर्की, नीलामी, बेदख़ली, डिक्री जैसे अंग्रेज़ी फ़रमान किसान की आफ़त बने और वह महाजनों के हाथ की कठपुतली बनता गया. कम्पनी राज के बाद बाक़ायदा तौर पर ब्रिटिश हुकूमत आने पर कई सुधारक क़ानून भी बने पर आम किसान को बनियों, ज़मींदारों से मुक्त करने की बजाय इन्हीं के सहायक बनते गए. महाजनी व्यवस्था मज़बूत होती गई, महाजन बनिया किसान का माईबाप बनता गया. वह बेचारा कोरे काग़ज़ पर अंगूठे लगाता गया, जीवन भर ब्याज चुकाता गया.

बड़े ज़मींदार कभी ख़ुद तो कभी महाजनों के साथ मिलीभगत कर उसकी ज़मीनें हड़पते गए, उसे बर्बाद करते गए. अंग्रेज़ी व्यवस्थागत क़ानून ने साधारण सी बनिया जाति को देश के सबसे अमीर वर्ग में ला खड़ा किया. बीसवीं सदी का भारतीय साहित्य इस बनिया कुचक्र की अनगिनत दास्तानों से भरा है.

आज भी वही क़ानूनबाज़ियाँ हैं जो संसदों में चलती हैं. बनिया अब कोई जाति नहीं एक वर्ग है जिसकी जीभ पर ख़ून लगा हुआ है. उसी अंग्रेज़ी सिस्टम के गर्भ से वह नई नई जुगतें निकाल किसान को बेदख़ल करने के प्रपंच रच रहा है. इस बार उसके पुराने साथी ‘ज़मींदार’ भी उसके निशाने पर हैं क्योंकि अब वह केवल बनिया महाजन नहीं ‘कॉरपोरेट’ बन चुका है. वह जो अपने अकूत धनबल पर ज़मींदार तो क्या राजाओं, क्षत्रपों को भी अपना दलाल बनाने में सक्षम है.

ईस्ट इंडिया कम्पनी से शुरू हुआ, अंग्रेज़ी क़ानूनों की मदद से परवान चढ़ा ‘बनिया’ सिस्टम अब देश को लील जाने के फेर में है. बाक़ायदा क़ानूनसाज़ी के मान्य अंग्रेज़ी तरीक़ों से और हम सब निर्लिप्त हो कर सोए हैं. शहरी लोगों को ज्ञान ही नहीं कि किसान के ज़रिये ये बनिये उनकी किचन और पॉकेट दोनों में घुस रहे हैं और वह दिन दूर नहीं जब उनकी रसोई के अधिष्ठाता हो जाएंगे ये लोग.

यह कॉरपोरेट बनिया आमजन की कमाई और बचत सबको दो कौड़ी का बनाने की फ़िराक में है. उधर देश के स्वनामधन्य क्रांतिद्रष्टा इस घातक क़ानूनसाज़ी को कुलकों की समस्या बता पल्ला झाड़ रहे हैं.

अंग्रेज़ी राज ने आधुनिक व्यवस्था दी, शिक्षा प्रशिक्षा दी, क़ानूनी ढांचा दिया. राजतंत्र से पीछा छुड़वाया, अपना राज दिया. इन सबसे कोई इन्कार नहीं लेकिन सब कुछ इतना भी अच्छा नहीं रहा क्योंकि इन्हीं के दिये क़ानूनी ढांचे ने पहले खाते कमाते किसान बर्बाद किये, कुटीर उद्योग चौपट किये, मज़बूत बनिया सिस्टम खड़ा किया और आज इन्हीं के दिये इस बदमाश सिस्टम की भूखी नज़र पूरे देश की आर्थिकता लील जाने को बेताब है.

याद रखना, यदि किसान पराजित हुआ तो यह उसकी निर्णायक पराजय होगी. भारत के गाँवों की दुर्गति जो ढाई सौ बरस पहले कम्पनी राज से शुरू हुई, वह घटिया दर्जे के शहरीकरण और शोचनीय मज़दूरीकरण पे जा कर ख़त्म होगी.

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