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हिन्दी को बांटकर कमजोर करने की साजिश

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सम्पूर्ण देश की एकता का भाषाई आधार हिन्दी है. अंग्रेजों की भाषा को आज सबसे ज्यादा चुनौती हिन्दी से ही मिल रही है. इसका सबसे बड़ा कारण हिन्दी बोलने, समझने और पढ़ने वाले की देश में सबसे ज्यादा संख्या है, जिस कारण हिन्दी पिछले सौ सालों में काफी समृद्ध हुई है. यही कारण है कि हिन्दी के विकास ने अंग्रेजीदां को चिंतित कर दिया है.

‘फूट डालो और राज करो’ वाली अंग्रेजों की पुरानी नीतियों को अमल में लाकर आज देश में हिन्दी भाषा को विखंडित कर देश की एकता के एक मजबूत आधार पर कुल्हाड़ी चलाई जा रही है. संसद में सांसदों द्वारा हिन्दी भाषा के मुकाबले हिन्दी के ही अन्य क्षेत्रीय सहयोगी भाषाओं (भोजपुरी, ब्रजी, अवधी, छत्तीसगढ़ी, राजस्थानी, बुंदेली, मगही, अंगिका आदि) को खड़ा किया जा रहा है, मैथिली को तो पहले ही 8वीं अनुसूची में शामिल कर मैथिली को हिन्दी के मुकाबले खड़ा कर दिया गया है. इससे हिन्दी की मजबूत चुनौती को कमजोर कर अंग्रेजी के वर्चस्व को बदस्तूर कायम रखने में मदद ही मिलेगी.

भाषाई एकता की मजबूती राष्ट्रीय एकता की दिशा में एक जरूरी आधार है वरना, राष्ट्र के एक हिस्से में क्या चल रहा है, दूसरे हिस्से को पता भी नहीं चल पायेगा, और देश अपनी एकता को अनेकता में बदल कर अपनी गुलामी की जंजीरों को और मजबूत ही करेगा.

यही कारण है कि हमें हिन्दी के तमाम सहयोगी बोलचाल की भाषा को अलग भाषाई दर्जा देकर अंग्रेजी को मजबूत करने के बजाय हिन्दी के तमाम सहयोगी भाषाओं को एकजुट करने की मांग मजबूती से उठानी चाहिए क्योंकि हिन्दी प्रतिरोध की भाषा है, वंचितों, शोषितों की भाषा है, यही कारण है कि हिन्दी विद्रोह की भाषा है. हिन्दी को कमजोर करने का सीधा मतलब है लोगों को कमजोर कर देश को गुलामी की जंजीरों में जकड़ना.

हिन्दी को कदम दर कदम कमजोर करने की भारतीय शासकों की साजिश और उसके झूठे मनगढंत दावों की पड़ताल करता प्रो. अमरनाथ शर्मा का यह प्रस्तुत लेख.

हिन्दी को बांटकर कमजोर करने की साजिश

एक ओर जहांं देश में ‘हिन्दी दिवस’ और ‘हिन्दी सप्ताह’ मनाया जा रहा था तो दूसरी ओर हिन्दी दिवस के दिन ही लोकसभा में एक माननीय सांसद हिन्दी की जड़ में मट्ठा डाल रहे थे. माननीय जगदंबिका पाल जी खुद भी भोजपुरी क्षेत्र के नहीं हैं लेकिन उन्होंने संसद में हिन्दी की एक बोली भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग की.

इसी तरह कुछ माह पहले पूर्व सांसद माननीय आर. के. सिन्हा ने राज्य सभा में भी यही मांग दुहराई थी. इस मांग के पीछे इन सांसदों का क्या स्वार्थ हो सकता है ? बिहार के चुनाव से इसका क्या और कितना संबंध है ? मेरी समझ से परे है यह विषय. राजनीति मेरा क्षेत्र नहीं किन्तु इसका हिन्दी पर कितना दूरगामी दुष्प्रभाव पड़ेगा- इस बात को लेकर मेरी चिन्ता बढ़ गई है.

दरअसल, अंग्रेजी के वर्चस्व को बनाए रखने के लिए अंग्रेजी के बलपर शासन में बैठे शासक वर्ग की यह सुनियोजित साजिश है, जिसके द्वारा वे अंग्रेजी के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा, हिन्दी को टुकड़े-टुकड़े करके नष्ट कर देना चाहते हैं.

भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग पहले भी होती रही है. जो मांग करते हैं उनके अपने बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ते हैं लेकिन हमें ये भोजपुरी पढ़ने और गंवार बने रहने की नसीहत देते हैं. उनमें से अनेक तो भोजपुरी बोल भी नहीं पाते.

पश्चिम बंगाल के तृणमूल कांग्रेस के सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय उन्हीं में से हैं, जिनकी जबान से हिन्दी के शब्द सुनने को कान तरसते रह गए. उन्हीं पी. चिदंबरम ने संसद में ‘हम रउआ सबके भावना समझतानीं’ कहकर भोजपुरी भाषियों का दिल जीत लिया था. सच है, भोजपुरी वाले दिल से ही काम लेते हैं, दिमाग से नहीं, तभी तो ये अंग्रेजीदांं हमें बेवकूफ बनाने में तनिक भी नहीं हिचकते. हिन्दी का घर बंटने से सबसे ज्यादा फायदा पी. चिदंबरम जैसे अंग्रेजीदां को ही होगा.

भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए उक्त दोनो सांसदो ने जो दलीलें दी हैं, उनमें सबसे पहली और मजबूत दलील यह है कि भोजपुरी बोलने वालों की सख्या 20 करोड़ से ज्यादा है, जबकि भारत की ही जनगणना रिपोर्ट- 2011 के अनुसार भोजपुरी भाषियों की कुल संख्या पांच करोड़ पांच लाख उन्यासी हजार चार सौ सैंतालीस (50579447) है.

संसद में इस तरह झूठ बोल कर उन्होंने संसद को ही नहीं, पूरे देश की जनता को गुमराह किया है. इस संबंध में यह भी उल्लेखनीय है कि हिन्दी समाज की प्रकृति द्वि-भाषिकता की है. हमलोग एक साथ अपने घरों में भोजपुरी, अवधी, ब्रजी आदि बोलते हैं और लिखने-पढ़ने का सारा काम हिन्दी में करते हैं. पूरे हिन्दी क्षेत्र में प्राथमिक शिक्षा का माध्यम हिन्दी है. ऐसी दशा में हमें केवल भोजपुरी भाषी या केवल हिन्दी भाषी कहना गलत है इसीलिए राजभाषा नियम, 1976 के अनुसार हमें ‘हिन्दी भाषी’ कहा गया है और ‘क’ श्रेणी में रखा गया है.

आर. के. सिन्हा ने बड़े उत्साह के साथ मारीशस का हवाला देते हुए कहा है कि उस देश में 2011 में ही भोजपुरी को मान्यता मिल चुकी है और वहां के स्कूलों में भोजपुरी पढ़ाई जाती है. उन्होंने उत्साह के साथ जिस मारीशस का जिक्र किया है उस मारीशस की कुल आबादी 2011 की ही जनगणना रिपोर्ट के अनुसार बारह लाख छत्तीस हजार (1236000) है, जिनमें से सिर्फ 5.3 प्रतिशत लोग भोजपुरी बोलते हैं यानी, किसी भी तरह यह संख्या एक लाख नहीं होगी.

उन्होंने ही बताया कि मारीशस के सभी सरकारी स्कूलों में भोजपुरी पढ़ाई जाती है. किन्तु उन्हीं के शब्दों में इन स्कूलों की कुल संख्या 250 है. इसी तरह उन्होंने भोजपुरी को एक हजार साल पुरानी भाषा कहा है. उन्हें मैं विनम्रतापूर्वक बताना चाहता हूं कि हिन्दी की कोई भी बोली एक हजार साल से कम पुरानी नहीं है. उन्होंने दो दर्जन देशों में भोजपुरी के बोले जाने की बात कही है. मेरा सुझाव है कि वे यह संख्या और बढ़ा लें. पूर्वी उत्तर प्रदेश के मेरे दो परिचित मोरक्को में रहते हैं. इस दृष्टि से मोरक्को को भी उस लिस्ट में शामिल होना चाहिए.

माननीय सांसदों ने अपनी इन्ही दलीलों के आधार पर भोजपुरी को संवैधानिक दर्जा देने की मांग की है किन्तु इसका हिन्दी पर कितना दूरगामी दुष्प्रभाव पड़ेगा, इस ओर उन्होंने तनिक भी ध्यान नहीं दिया. मैं हिन्दी प्रेमियों का ध्यान इस ओर दिलाना चाहता हूंं.

उल्लेखनीय है कि मैथिली भी भोजपुरी की ही तरह हिन्दी की एक बोली थी. 2003 में उसे हिन्दी से अलग करके संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिया गया. अब वह बांग्ला, तमिल, तेलुगू आदि की तरह हिन्दी से अलग स्वतंत्र भाषा बन गई है. इससे निश्चित रूप से मैथिली के कुछ साहित्यकारों को साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिल गया होगा, किन्तु इसका दुष्परिणाम यह हुआ है कि वर्ष 2011 की जनगणना में मैथिली को हिन्दी से अलग किया जा चुका है और मैथिली भाषियों की जनसंख्या हिन्दी में से घट चुकी है. यदि भोजपुरी भी आठवीं अनुसूची में शामिल हो जाती है तो भोजपुरी भाषियों की जनसंख्या भी हिन्दी भाषियों की जनसंख्या में से घट जाएगी.

स्मरणीय है कि सिर्फ संख्या बल के कारण ही हिन्दी इस देश की राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठित है. यदि यह संख्या घटी तो राजभाषा का दर्जा हिन्दी से छिनते देर नहीं लगेगी. भोजपुरी के अलग होते ही ब्रजी, अवधी, छत्तीसगढ़ी, राजस्थानी, बुंदेली, मगही, अंगिका आदि सब अलग होंगी. उनका दावा भोजपुरी से कम मजबूत नहीं है.

‘रामचरितमानस’, ‘पद्मावत’ या ‘सूरसागर’ जैसे एक भी ग्रंथ भोजपुरी में नहीं है. इसी तरह माननीय सांसद अर्जुन राम मेघवाल वर्षों से राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग कर रहे हैं. छत्तीसगढ़ ने भी 28 नवंबर 2007 को अपने प्रदेश की राजभाषा छत्तीसगढ़ी घोषित कर दिया है और अपनी विधान सभा में इस आशय का प्रस्ताव पास करके केन्द्र को भेज दिया है कि छत्तीसगढ़ी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाय.

कुछ लोगों को यह भ्रम है कि यदि भोजपुरी को मान्यता मिलती है तो उससे हिन्दी का ही लाभ होगा. ऐसे लोगों को मैथिली से सबक लेना चाहिए.

भोजपुरी की समृद्धि से हिन्दी को और हिन्दी की समृद्धि से भोजपुरी को तभी फायदा होगा जब दोनो साथ रहेंगी. आठवीं अनुसूची में शामिल होना अपना अलग घर बांंट लेना है. आठवीं अनुसूची में शामिल होने के बाद हिन्दी का भी अहित होगा और भोजपुरी का भी. तब हम भोजपुरी के कबीर को हिन्दी के कोर्स में कैसे शामिल कर पाएंगे ? क्योंकि तब कबीर हिन्दी के नहीं, सिर्फ भोजपुरी के कवि होंगे. क्या कोई कवि चाहेगा कि उसके पाठकों की दुनिया सिमटती जाय ?

भोजपुरी, राजस्थानी, ब्रजी आदि हिन्दी के अभिन्न अंग हैं. हम सभी विश्वविद्यालयों के हिन्दी पाठ्यक्रमों में इन सबको पढ़ते-पढ़ाते हैं. हम कबीर, तुलसी, सूर, चंदबरदाई, मीरा आदि को भोजपुरी, अवधी, ब्रजी, राजस्थानी आदि में ही पढ़ सकते हैं. हिन्दी साहित्य के इतिहास में ये सभी शामिल है. इनकी समृद्धि और विकास के लिए और भी प्रयास किए जाने चाहिए.

हमारी बोलियों में लिखे जाने वाले उत्कृष्ट साहित्य को पाठ्यक्रमों में रखे जाने की मांग अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण और स्वागतयोग्य है न कि घर बांंटने की मांग. भोजपुरी घर में बोली जाने वाली एक बोली है. उसके पास न तो अपनी कोई लिपि है और न मानक व्याकरण. उसके पास मानक गद्य तक नहीं है. किस भोजपुरी के लिए मांग हो रही है ? गोरखपुर की, बनारस की या छपरा की ? भोजपुरी के माध्यम से मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई का सब्जबाग दिखाने वाले सांसद पहले हिन्दी को तो पढ़ाई का माध्यम बनाकर दिखाएं.

ज्ञान के सबसे बड़े स्रोत विकीपीडिया ने बोलने वालों की संख्या के आधार पर दुनिया के सौ भाषाओं की जो सूची जारी की है, उसमें हिन्दी को चौथे स्थान पर रखा है. इसके पहले हिन्दी का स्थान दूसरा रहता था. हिन्दी को चौथे स्थान पर रखने का कारण यह है कि सौ भाषाओं की इस सूची में भोजपुरी, अवधी, मारवाड़ी, छत्तीसगढ़ी, ढूंंढाढी, हरियाणवी और मगही को शामिल किया गया है.

साम्राज्यवादियों द्वारा हिन्दी की एकता को खंडित करने के षडयंत्र का यह ताजा उदाहरण है और इसमें विदेशियों के साथ कुछ स्वार्थांध देशी जन भी शामिल हैं.

हमारी मुख्य लड़ाई अंग्रेजी के वर्चस्व से है. अंग्रेजी हमारे देश की सभी भाषाओं को धीरे-धीरे लीलती जा रही है. उससे लड़ने के लिए हमारी एकजुटता बहुत जरूरी है. उसके सामने हिन्दी ही तनकर खड़ी हो सकती है क्योंकि बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से वह आज भी देश की सबसे बड़ी भाषा है और यह संख्या बल बोलियों के जुड़े रहने के नाते है. ऐसी दशा में यदि हम बिखर गए और आपस में ही लड़ने लगे तो अंग्रेजी की गुलामी से हम कैसे लड़ सकेंगे ?

कमजोर की सर्वत्र उपेक्षा होती है. घर बंटने से लोग कमजोर होते हैं, दुश्मन भी बन जाते हैं. पड़ोसी बोलियों से भी रिश्तों में कटुता आएगी और हिन्दी का इससे बहुत अहित होगा. मैथिली का अपने पड़ोसी अंगिका से विरोध सर्वविदित है. संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को स्थान दिलाने की मांंग आज भी लंबित है. यदि हिन्दी की संख्या ही नहीं रहेगी तो उस मांग का क्या होगा ?

स्वतंत्रता के बाद हिन्दी की व्याप्ति हिन्दीतर भाषी प्रदेशों में भी हुई है. हिन्दी की संख्या और गुणवत्ता का आधार केवल हिन्दी भाषी राज्य ही नहीं, अपितु हिन्दीतर भाषी राज्य भी हैं. अगर इन बोलियों को अलग कर दिया गया और हिन्दी का संख्या-बल घटा तो वहांं की राज्य सरकारों को इस विषय पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है कि वहांं हिन्दी के पाठ्यक्रम जारी रखे जायं या नहीं. इतना ही नहीं, राजभाषा विभाग सहित केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय अथवा विश्व हिन्दी सम्मेलन जैसी संस्थाओं के औचित्य पर भी सवाल उठ सकता है.

भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांंग भयंकर आत्मघाती है. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और स्व. चंद्रशेखर जैसे महान राजनेता तथा महापंडित राहुल सांकृत्यायन और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे महान साहित्यकार ठेठ भोजपुरी क्षेत्र के ही थे किन्तु उन्होंने भोजपुरी को मान्यता देने की मांग का कभी समर्थन नहीं किया. आज थोड़े से लोग, अपने निहित स्वार्थ के लिए ‘बीस करोड़ के प्रतिनिधित्व’ का झूूठा दावा करके देश को धोखा दे रहे है.

अपने सांसदों और हिन्दी प्रेमी मित्रों से अनुरोध है कि कृपया हिन्दी की किसी भी बोली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग न करें और इस विषय में अपने सांसदों से भी यथास्थिति बनाए रखने की अपील करें.

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