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भारतीय सत्ता का चरित्र जनविरोधी क्यों है ?

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यह एक शोध का महत्वपूर्ण विषय होना चाहिए कि आखिर विपक्ष में बैठा हरेक दल या सख्श प्रगतिशील क्यों लगता है, और जब वही दल या सख्श सत्तारूढ़ हो जाता है तब वह प्रतिक्रियावादी और जनविरोधी चरित्र क्यों अपना लेता है ?

विदित हो कि 2014 में सत्ता पाने के लिए संघर्ष कर रही भारतीय जनता पार्टी बेहद ही प्रगतिशील और जनपक्षी लग रहा था, वहीं सत्तारूढ़ कांग्रेस प्रतिक्रियावादी और जनविरोधी लग रहा था. परन्तु ज्यों ही कांग्रेस को सत्ता से हटाकर नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने सत्ता हासिल किया, उसका प्रगतिशील और जनपक्षी चेहरा पल भर में विलुप्त हो गया और घोर प्रतिक्रियावादी और जनविरोधी चेहरा लेकर देश के सामने निर्लज्जतापूर्वक आ गया.

भाजपा सत्ता में आते ही न केवल अपने तमाम वादे ही भूल गये बल्कि देश के संविधान व उसके तमाम संवैधानिक ढांचे को तबाह कर दिया. उन तमाम संवैधानिक ढांचों में अपने मंजे हुए ऐजेंटों को घुसेरना शुरु किया बल्कि ‘घर में घुसकर मारना’ जैसी मोदी की प्रसिद्ध उक्ति का यही असली मतलब देश और दुनिया के सामने आया.

अब जब भारतीय जनता पार्टी अपने तमाम विकृत चेहरा लेकर सतारूढ़ है, तब वही ‘प्रतिक्रियावादी और भ्रष्ट’ कांग्रेस अपेक्षाकृत प्रगतिशील लगने लगा है. इस तरह यही प्रक्रिया बार-बार देश में दोहरायी जा रही है. इससे एक चीज जो पूरी तरह स्पष्ट दीखने लगता है वह है सत्ता का प्रतिक्रियावादी और जनविरोधी चरित्र का होना.

इससे एक और चीज जो पूरी तरह साफ होता है वह यह है निश्चित तौर पर देश की संचालक नीतियों का निर्धारण करने में देश के जनता की कोई भागीदारी नहीं होना और न ही इस देश के नागरिकों की इच्छाओं या जरुरतों से सत्ता का कोई मतलब होना. अगर जनता को कुछ सहुलियतें मिल जाती है तो वह सत्ता की भलमनसाहत है, जनता की जरूरत नहीं. ठीक यही बात नरेन्द्र मोदी ने संसद में बताया था और अनेक कानूनों का उदाहरण पेश किया था.

कांग्रेस का राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने एक प्रेस कान्फ्रेंस करके देश के सामने तमाम ज्वलंत और बुनियादी राजनीतिक मुद्दों को रखा. उन्होंने कहा –

देश में मुद्दों की राजनीति होनी चाहिए, राजनीति का मुद्दा नहीं. देश में राजनीति का धर्म होना चाहिए, धर्म की राजनीति नहीं. देश में एकीकरण की राजनीति होनी चाहिए, तुष्टिकरण की नहीं. देश में प्रेम और सद्भाव की राजनीति होनी चाहिए, नफ़रत और बंटवारे की नहीं परंतु, भाजपा ने इसमें भी उत्तर और दक्षिण के विभाजन का टूलकिट जारी कर दिया है.

आज देश का मुद्दा क्या है ? मुद्दा है कि देश में डीजल 90 रुपये और पेट्रोल 100 रुपये लीटर क्यों बिक रहा है ? देश का मुद्दा है चीन, वह आज भी पैंगोंग, डेप्सांग प्लेन, गोगरा और हॉटस्प्रिंग में घुसपैठ करके क्यों बैठा हुआ है और मोदी सरकार चुप क्यों है ? प्रधानमंत्री चीन से डरते क्यों हैं ? ये भी बताना पड़ेगा देश का मुद्दा है आम जनमानस महंगाई की मांर से त्रस्त क्यों है ? मुद्दा ये है कि पेट्रोल और डीजल पर टैक्स लगाकर मोदी सरकार ने साढ़े 21 लाख करोड़ तो कमा लिए पर मध्यम वर्ग और किसान को राहत क्यों नहीं है ?

देश का मुद्दा ये है कि लाखों किसान दिल्ली की सीमाओं पर बैठे हैं. ढाई सौ से अधिक किसान वीरगति को प्राप्त हो गए परंतु दिल्ली की सरकार पसीजती क्यों नहीं ? देश का मुद्दा ये है कि जीडीपी औंधे मुंह क्यों गिर रही है ? देश का मुद्दा ये है कि स्टॉफ सेलेक्शन कमीशन में 14,000 पदों के लिए एक करोड़ 30 लाख लोग रोजगार के लिए आवेदन क्यों करते हैं ? बेरोज़गारी इतनी गहरी क्यों है ? नौजवान दर-दर की ठोकरें क्यों खाते हैं ? चपरासी के पद के लिए एमबीए, पीएचडी और इंजीनियर नौकरी की लाइन में खड़े हैं ये देश का मुद्दा है. देश में पिछले साढ़े छह साल में इतने सैनिक वीरगति को क्यों प्राप्त हो रहे हैं ? ये देश का मुद्दा है.

देश के हुक्मरानों के लिए सही मुद्दे क्या हैं ? जब प्रधानमंत्री हिमाचल के चुनाव में ‘50 करोड़ की गर्लफ्रैंड’ का मुद्दा बनाएंगे तो ये मुद्दा है. जब देश के प्रधानमंत्री विपक्षी नेताओं को जर्सी गाय और हाईब्रिड बछड़ा बताकर मुद्दा बनाते हैं. प्रधानमंत्री कहते हैं लड़कियां इसलिए कुपोषण का शिकार हैं क्योंकि वो फीगर कांशियस हैं. देश का प्रधानमंत्री देहज प्रथा को बढ़ावा देने वाला बयान देकर कहता है कि बेटी के जन्म पर पेड़ लगाइए और बेटी विवाह योग्य हो जाए तो वो पेड़ बेचकर दहेज दीजिए.

प्रधानमंत्री द्वारा श्मशान और कब्रिस्तान इस देश का मुद्दा बना दिए जाते हैं. जब हमारे देश के प्रधानमंत्री चुनाव में वीरगति प्राप्त सैनिकों की फोटो लगाकर उनकी वीरगति के आधार पर वोट मांगेंगे तो क्या ये देश का मुद्दा हो सकता है ? जब व्यापारियों के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री कहते हैं, सेना का साहस कुछ भी नहीं व्यापारियों का साहस सेना से भी बड़ा है. गृह मंत्री महात्मा गांधी को चतुर बनिया कह देंगे तो क्या ये सही बात है ? जब देश के प्रधानमंत्री 15-15 लाख का वादा कर देंगे और गृह मंत्री उसे जुमला बता देंगे तो क्या ये सही मुद्दा है ? नहीं.

देश के मुद्दे हैं महंगाई, बेरोज़गारी, औंधे मुंह गिरी जीडीपी, किसानों की शहादत, भारतीय सरजमीं पर चीन का कब्ज़ा, भारतीय सैनिकों की शहादत, ये हमारे देश के आज के मुद्दे हैं. जब असहमति रखने वाले लेखक, पत्रकार को देशद्रोही बताकर जेल में डाल देते हैं तब ये देश का मुद्दा है. कोरोना से डेढ़ लाख लोग मर गए, क्या ये देश का मुद्दा नहीं है ? पर देश के स्वास्थ्य मंत्री फर्जी दवाई ‘कोरोनिल’ बेचने के लिए पत्रकार वार्ता करते फिरते हैं. ये सही मुद्दे हैं ? इसलिए इस देश में इन मुद्दों को लाने की ज़रूरत है, लेकिन इसे भी उत्तर और दक्षिण में बांटकर इस देश का अपमान मत करिए. संविधान पर यदि हमला होगा तो ये देश का मुद्दा है. अगर आपके अधिकार छीने जाएंगे तो ये देश का मुद्दा है और इन पर चर्चा अवश्य होगी.

 इस देश में करोड़ों मछुआरे हैं. हजारों किलीमोटर की कोस्टल लाइन है, जो महाराष्ट्र से पश्चिम बंगाल तक फैली है. हमारे मछुआरे भाई अपनी जान जोखिम में डालकर एक छोटी-सी कश्ती के सहारे अपनी रोटी कमाते हैं. क्या उनके लिए एक मंत्रालय नहीं होना चाहिए ? शायद अहंकारी पार्टी को ये पता नहीं है.

भारत सरकार ने चीन को सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर बना लिया है. ख़बरें तो यहां तक आ रही हैं कि अब चीन 25 प्रतिशत निवेश भारतीय कंपनियों में ऑटोमेटिक कर पाएगा किसी की इज़ाज़त नहीं लेनी पड़ेगी. चीन को मोदी सरकार राहत दे रही है, क्योंकि न तो वो चीन को आंख दिखा सकते हैं, न वो चीन को भारत की सरजमीं से पीछे धकेल सकते हैं. यही सच्चाई है और इसका जवाब देश के प्रधानमंत्री को देना चाहिए.

देश के गृह मंत्री यदि लाल किले की सुरक्षा नहीं कर सकते तो उन्हें तुरंत इस्तीफा देना चाहिए. आप उनसे पूछिए कि कैसे इतने उपद्रवी लाल किले में घुसते चले गए. उन्हें वहां तक जाने का रास्ता और गली किसने मुहैया करवाई ? उनके लिए लाल किले का एक-एक दरवाजा किसने खोला, जिससे वो लाल किले के हर जगह पर जहां चाहें वहां जा सकें ? उन्हें पकड़ा क्यों नहीं दिल्ली पुलिस ने ? लाल किले की घटना खुद गृह मंत्री की विफलता है, लेकिन जिम्मेदारी लेने के बजाय गृह मंत्री अपने पपेट संस्थाओं सीबीआई, ईडी, इनकम टैक्स का इस्तेमाल करके विरोधियों, विपक्षियों और आंदोलनकारी किसानों को डराने में लगे हैं.

कांग्रेस के प्रवक्ता के द्वारा गिनाये गये ये सारे मुद्दे आज के मुद्दे हैं, आज के जनता की जरूरत है. जिस तरह आज ये मुद्दे गिना कर जनता का समर्थन हासिल करना चाह रही है, ठीक यही काम भाजपा नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में गिनाया करती थी, बल्कि कहा जाय तो पूरी तरह आक्रामक होकर. वही नरेन्द्र मोदी जो गरज गरज कर और लाल लाल आंखें दिखा दिखा कर कांग्रेस पर आरोप लगाती थी और लोग तालियां पीटते थे, आज सतारूढ़ है और बिना किसी लज्जा के वह तमाम काम कर रही है, जो पहले कांग्रेस करती थी और सत्ताच्युत कांग्रेस आज वही कर रही है जो कल भाजपा कर रही थी.

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