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देशवासियों के नाम सोनिया का पत्र : ‘…आज ही लौट जाऊंगी…बस, राजीव लौटा दीजिए’

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देशवासियों के नाम सोनिया का पत्र : '...आज ही लौट जाऊंगी...बस, राजीव लौटा दीजिए'
देशवासियों के नाम सोनिया का पत्र : ‘…आज ही लौट जाऊंगी…बस, राजीव लौटा दीजिए’

जब से देशद्रोहियों ने देशभक्ति का चोंगा ओढ़ कर सत्ता हथियाया है, तब से वे तमाम लोग अपमानित और बेईज्जत किये जा रहे हैं, जिन्होंने देश की आजादी के आन्दोलन में भागीदारी किये थे और अंग्रेजों की यातना झेले थे. महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू के खिलाफ इन देशद्रोहियों का हमला सबसे ज्यादा निर्मम और कुत्सित है. महात्मा गांधी की तो इन देशद्रोहियों ने गोली मार कर हत्या ही कर दिया था, परन्तु, नेहरू और उनके वंशजों पर उनका हमला बेहद खतरनाक रुप लेता जा रहा है.

मौजूदा काल में नेहरू और उनके बचे हुए वंशज इन देशद्रोहियों के सर्वाधिक निशाने पर हैं, जो अब मुख्यधारा की तलबाचाटु मीडिया और सोशल मीडिया पर मौजूद देशद्रोही गुंडे बेहद ही कुत्सित और सफेद झूठ फैला रहा है. जवाहर लाल नेहरू के वशंज पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पुत्रवधू और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पत्नी सोनिया गांधी और उनके पुत्र राहुल गांधी के खिलाफ झूठी अफवाहों का बौछारे इन देशद्रोही गुंडों ने फैला रखा है. इसमें अश्लील गालियों को छोड़ भी दें तो एक बेहद झूठी अफवाहों पर अवश्य ही ध्यान देना चाहिए.

सोनिया गांधी के ‘बार बाला’ वाला झूठ किसने फैलाया ?भाजपा की घटिया आईटीसेल ने. सच्चाई यह है कि सोनिया गांधी के पिता का अपना होटल था और वो एक अमीर परिवार से संबंध रखती थी. स्कूल खत्म होते ही वो इंग्लैंड आगे की पढ़ाई करने चली गयी. उसी कालेज में राजीव गांधी भी पढते थे. वहीं दोनों का प्यार हुआ और दोनोें ने शादी कर ली.

फिर बार डांसर की बात कहां से आयी ? ये अफवाहें पैदा हुई एक सडे हुए संघी दिमाग में क्योंकि संघी दिमाग को अपने सब विरोधी चरित्रहीन ही लगते हैं.

सोनिया गांधी को ‘बार डांसर’ साबित करने के लिए भाजपा आईटी सेल ने सोनिया गांधी की आल्टर्ड तस्वीरें सोशल मीडिया के माध्यम से फैलाई. मर्लिन मुनरो की पुरानी फिल्म के डांस सीन को फोटोशॉप कर सोनिया गांधी का दिखाया. जेम्स बांड सीरीज की पुरानी फिल्म की एक्ट्रेस की बिकीनी में फोटो को फोटोशॉप कर के सोनिया गांधी की बताया गया. मशहूर एक्ट्रेस रीस़ विदरस्पून की अपने बॉय फ्रेंड के साथ फोटो को आल्टर कर के सोनिया गांधी का बता दिया गया. रीज विदरस्पून की ही बिकीनी में फोटोज़ को सोनिया गांधी का बताया गया.

यही वो भाजपा की सड़ी मानसिकता वाली राजनीति है, जो कहती है कि अपने विरोधियों के खिलाफ इतना झूठ फैलाओ कि एक दिन लोग उस पर यकीन करने लगें. एक झूठ को अगर बार बार, हजार बार बोला जाता है तो वो झूठ भी सच लगने लगता है.

सोनिया गांधी, जिन्हें विदेशी साबित करने के लिए संघियों ने एड़ी चोटी का जोड़ लगा दिया है, इस कोशिश में उसने भारतीय संस्कृति को ही अपनी गंदी मानसिकता का शिकार बना दिया है. भारतीय संस्कृति में विवाह एक ऐसी परम्परा है, जिसमें दो परिवार जो दो भिन्न जगहों के होते हैं, एक साथ जुड़ते हैं और दुल्हन बनी लड़की सदा के लिए अपने पति के घर, परिवार, शहर या देश की हो जाती है. दुनिया भर में नागरिकता का नियम भी विवाह के इस संबंध को मान्यता प्रदान करता है, सिवा सड़े हुए संघी अंडों के.

यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि सोनिया गांधी को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए जवाब देना पड़ रहा है और निर्लज्ज संघी गुंडों ठहाका लगा रहा है. इससे पहले कि सोनिया गांधी की नागरिकता पर संघियों द्बारा सबाल उठाया जाये, उसे राजीव, इंदिरा, नेहरू की नागरिकता से जूझना होगा क्योंकि कोई भी अपनी बहन से शादी नहीं करता. ऐसे में सोनिया गांधी द्वारा लिखा गया देशवासियों के नाम प्रेषित इस पत्र को संघी गुंडों और समस्त देशवासियों को अवश्य पढ़ना चाहिए. याद रखिये, जिससे प्रेम किया हो, उसकी लाश देखकर जो दु:ख होता है, इसके बाद दु:ख नहीं होता : अज्ञात

‘आपने देखा है न उन्हें !!

चौड़ा माथा, गहरी आंखेंं, लम्बा कद … और वो मुस्कान. जब मैंने भी उन्हें पहली बार देखा – तो बस देखते रह गयी. साथी से पूछा- कौन है ये खूबसूरत लड़का. हैंडसम !! हैंडसम कहा था मैंने.

साथी ने बताया वो इंडियन है. पण्डित नेहरू की फैमिली से है. मैं देखती रही … पंडित नेहरू की फैमिली के लड़के को.

कुछ दिन बाद, यूनिवर्सिटी कैंपस के रेस्टोरेन्ट में लंच के लिए गयी. बहुत से लड़के थे वहां. मैंने दूर एक खाली टेबल ले ली. वो भी उन दूसरे लोगों के साथ थे. मुझे लगा कि वह मुझे देख रहे हैंं. नजरें उठाई, तो वे सचमुच मुझे ही देख रहे थे. क्षण भर को नजरें मिली, और दोनों सकपका गए. निगाहें हटा ली, मगर दिल जोरों से धड़कता रहा.

अगले दिन जब लंच के लिए वहीं गयी, वो आज भी मौजूद थे. कहीं मेरे लिए इंतजार … ! मेरी टेबल पर वेटर आया, एक वाइन की बॉटल लेकर … और साथ मेंं एक नैपकिन, जिस पर एक कविता लिखी थी. ‘द वन’…

वो पहली नजर का प्यार था. वो दिन खुशनुमा थे. वो स्वर्ग था. हम साथ घूमते, नदियों के किनारे, कार में दूर ड्राइव, हाथों में हाथ लिए सड़कों पर घूमना, फिल्में देखना. मुझे याद नहीं की हमने एक दूसरे को प्रोपोज भी किया हो. जरूरत नहीं थी, सब नैचुरल था, हम एक दूसरे के लिए बने थे. हमें साथ रहना था. हमेशा …

उनकी मां प्रधानमंत्री बन गयी थी. जब इंग्लैंड आयी तो राजीव ने मिलाया. हमने शादी की इजाजत मांगी. उन्होंने भारत आने को कहा.

भारत … ?? ये दुनिया के जिस किसी कोने में हो. राजीव के साथ कहीं भी रह सकती थी तो आ गयी. गुलाबी साड़ी, खादी की, जिसे नेहरू ने बुना था, जिसे इंदिरा ने अपनी शादी में पहना था, उसे पहन कर इस परिवार की हो गयी। मेरी मांग में रंग भरा, सिन्दूर कहते हैं उसे. मैं राजीव की हुई, राजीव मेरे, और मैं यही की हो गयी.

दिन पंख लगाकर उड़ गए. राजीव के बड़े भाई नहीं रहे. इंदिरा को सहारा चाहिए था. राजीव राजनीति में जाने लगे. मुझे नहीं था पसंद, मना किया. हर कोशिश की, मगर आप हिंदुस्तानी लोग, मां के सामने पत्नी की कहां सुनते हैंं. वो गए, और जब गए तो बंट गये. उनमें मेरा हिस्सा घट गया.

फिर एक दिन इंदिरा निकली. बाहर गोलियों की आवाज आई. दौड़कर देखा तो खून से लथपथ. आप लोगों ने छलनी कर दिया था. उन्हें उठाया, अस्पताल दौड़ी, उनके खून से मेरे कपड़े भीगते रहे. मेरी बांहों में दम तोड़ा. आपने कभी इतने करीब से मौत देखी है ?

उस दिन मेरे घर के एक नहींं, दो सदस्य घट गए. राजीव पूरी तरह देश के हो गए. मैंने सहा, हंसा, साथ निभाया. जो मेरा था … सिर्फ मेरा, उसे देश से बांटा और क्या मिला ? एक दिन उनकी भी लाश लौटी. कपड़े से ढंका चेहरा. एक हंसते, गुलाबी चेहरे को लोथड़ा बनाकर लौटा दिया आप सबने.

उनका आखिरी चेहरा मैं भूल जाना चाहती हूं. उस रेस्टोरेंट में पहली बार की वो निगाह, वो शामें, वो मुस्कान … बस वही याद रखना चाहती हूं.

इस देश में जितना वक्त राजीव के साथ गुजारा है, उससे ज्यादा राजीव के बगैर गुजार चुकी हूं. मशीन की तरह जिम्मेदारी निभाई है. जब तक शक्ति थी, उनकी विरासत को बिखरने से रोका. इस देश को समृद्धि के सबसे गौरवशाली लम्हेंं दिए. घर औऱ परिवार को संभाला है. एक परिपूर्ण जीवन जिया है. मैंने अपना काम किया है. राजीव को जो वचन नहीं दिए, उनका भी निबाह मैंने किया है.

राजनीति है, सरकारें आती जाती है. आपको लगता है कि अब इन हार जीत का मुझ पर फर्क पड़ता है ? आपकी गालियां, विदेशी होने की तोहमत, बार बाला, जर्सी गाय, विधवा … इनका मुझे दु:ख होता है ? किसी टीवी चैनल पर दी जा रही गालियों का दु:ख होता है, ट्विटर और फेसबुक पर अनर्गल ट्रेंड का दुख होता है ?? नहीं, तरस जरूर आता है.

याद रखिये, जिससे प्रेम किया हो, उसकी लाश देखकर जो दुःख होता है, इसके बाद दु:ख नहीं होता. मन पत्थर हो जाता है. मगर आपको मुझसे नफरत है, बेशक कीजिये. आज ही लौट जाऊंगी. बस, राजीव लौटा दीजिए.

औऱ अगर नहीं लौटा सकते तो शांति से, राजीव के आसपास, यहीं कहीं इसी मिट्टी में मिल जाने दीजिए. इस देश की बहू को इतना तो हक मिलना चाहिए शायद …

सोनिया गांधी का यह पत्र निर्लज्ज देशवासियों के बेशर्म गाल पर करारा तमाचा है, अगर कहीं भी लाज बची हो तो सोनिया गांधी को अपमानित करने वाले कुत्सित षड्यंत्रकारियों को चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए.

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