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कोरोना पर कोहराम और लॉकडाऊन 2.0

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कोरोना पर कोहराम और लॉकडाऊन 2.0

भारत की मोदी सरकार के पास कोरोना से लड़ने का एकमात्र विजन है झूठ बोलना, थाली बजाना, बत्ती बुझाना और सबसे बढ़कर वगैर किसी तैयारी के लॉकडाऊन करना और उसे लगातार आगे बढ़ाते जाना. न तो कोराना जांंच का संख्या बढ़ाना, न ही स्वास्थ्यकर्मियों के लिए जरुरी सुरक्षा कीट की व्यवस्था करना और न ही संक्रमित व्यक्ति के लिए क्वारंटाईन हेतु उचित व्यवस्था करना.

विदित हो कि दिसंबर, 2019 में कोराना वायरस की मौजूदगी की सूचना मिलने और 30 जनवरी, 2020 में कोरोना वायरस से संक्रमित व्यक्ति की पहचान होने और 15 फरवरी को राहुल गांधी के द्वारा चेतावनी दिये जाने के वाबजूद केन्द्र की मोदी सरकार ने 24 मार्च को देश को एकबारगी लॉकडाऊन में डाल दिया, इसके बाद भी 25 मार्च की रात तक विदेशों से हवाई जहाज में भर भर कर कोराना मरीजों को देश में लाया गया, जिसकी कोई जांच तक नहीं की गई अथवा जांच के नाम पर खानापूर्ति की गई.

विमानों में भर कर विदेश से लाये गये यात्री

हिमाचल विधानसभा में ठियोग के विधायक राकेश सिंघा एक सवाल के जवाब में कहते हैं  कि चीन के वुहान में जब कोरोना वायरस फैल रहा था, उस वक़्त हिमाचल में 27 फरवरी तक 175 लोग वुहान से पहुंच चुके थे जिनका कोई खून की जांच नहीं किया गया. हां, इनको होम क्वारंटाइन में रखा गया. राकेश सिंघा ने सरकार पर आरोप लगाया कि सरकार कोविड -19 को लेकर कभी गंभीर नहीं रही और न ही अब गंभीर है. वहीं कैबिनेट सचिव के अनुसार 8 जनवरी से 23 मार्च तक कुल 15 लाख के लगभग यात्री विदेशो से विमानों में भर कर लाये गये थे.

क्वारंटाईन की स्थिति 

देश में आम आदमी के लिए बनाये गये क्वारंटाईन केन्द्र अत्यंत ही भयावह है. भारत के रामराज्य कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में होम क्वारैंटाइन में ही बुजुर्ग (82 साल) ने दम तोड़ दिया. दुर्गंध आने पर गांववालों ने पुलिस को सूचना दी. इसके बाद रविवार को जब अधिकारी मौके पर पहुंचे तो शव पूरी तरह से सड़ चुका था और उस पर कीड़े रेंग रहे थे.

वहीं बिहार के गया जिले में कोरोना संदिग्ध एक महिला को आईसोलेशन वार्ड में रखा गया जहां उसके साथ छेड़खानी और यौन प्रताड़ना की गई. लेकिन अस्पताल प्रबंधन ने महिला के आरोपों की कोई जांच नहीं कराई और आनन-फानन में उसे अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया. जिससे उसकी मौत हो गई.

स्वास्थ्यकर्मियों की उपेक्षा

कोरोना संक्रमण से ईलाज हेतु कार्यरत स्वास्थ्य कर्मियों को जरूरी सुरक्षा किट (पीपीई) नहीं दिया गया, जिस.कारण हजारों की तादाद में स्वास्थ्यकर्मी संक्रमित हुए और कुछ तो मर भी गये. वहीं जब स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा सुरक्षा किट की मांग की गई तो उन्हें न केवल हाथ पैर तोड़ने की धमकी दी गई बल्कि सैलरी काटने और जेल में बंद करने, नौकरी से निकलने की भी कोशिश की गई.

वहीं, क्विंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रिवेंटिव वियर मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (PWMAI) के अध्यक्ष संजीव ने बताया कि पीपीई की कमी की मुख्य वजह इसको लेकर सरकार की लेट प्रतिक्रिया है.

संजीव और पीपीई के अन्य निर्माताओं का कहना है कि उन्होंने फरवरी में स्वास्थ्य मंत्रालय से संपर्क किया था और सरकार से पीपीई किट को स्टॉक करने का आग्रह किया था लेकिन तब स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना था कि इस मामले में उन्हें केंद्र से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है. हमें 21 मार्च तक सरकार की तरफ से कोई मेल नहीं मिला. अगर सरकार ने 21 फरवरी तक मेल का जवाब या विनिर्देश प्रदान किये होते तो अबतक पीपीई किट की हम पर्याप्त व्यवस्था कर पाते.

भूखमरी और अपमान की पीड़ा

देश की सत्ता पर पहली बार एक ऐसी कृतघ्न सरकार बैठी है जो छाती ठोक कर कॉरपोरेट घरानों का नौकर होने की बात करता है. पिछले 6 सालों में देश के कॉरपोरेट घरानों को तकरीबन 36 लाख करोड़ रुपरे की रेबड़ी बांट चुका यह मोदी सरकार गरीबों को लॉकडाऊन के नाम पर मौत के घाट उतार रही है.

बेरोजगारी का दंश झेलते देश के दूरस्थ राज्यों में मामूली नौकरी कर अपना जीविका पालने वाले मजदूर जीविका खत्म होने के साथ ही भूख से मर रहे हैं अथवा हजारों किलोमीटर की लंबी पैदल यात्रा के कारण रास्ते में ही दम तोड़ रहे हैं या भूख से बदहाल होकर आत्महत्या कर रहे हैं. जो इससे भी बच जा रहे हैं देश की दुर्दांत पुलिस पीट पीट कर उसकी हत्या कर रहे हैं या बेरहमी से पीट रहे हैं.

आंकड़ों की हेराफेरी

कोरोना से मरनेवालों की संख्या महज सैकड़ा में हैं. हालत यह हो गई है कि किसी भी बीमारी से मरने के बाद उसे कोरोना का नाम दे दिया जा रहा है और समाज में एक आतंक फैलाया जा रहा है. मसलन, बिहार में मरे एकमात्र सख्श की मौत किडनी फेल होने के कारण एम्स, पटना में हो गई. उसकी मौत, शव सुपुर्दगी और उनके अंतिम संस्कार के बाद यह खबर प्रसारित की गई कि उसकी मौत कोराना वायरस के कारण हुई, जबकि कुछ दिन पहले ही उसको कोरोना निगेटिव पाया गया था.

परिणाम यह हो गया है कि एक ट्रेड से चल पड़ा है कि जब भी किसी की किसी भी बीमारी से मौत हो रही है तो उसे कोरोना से हुई मौतों की संख्या में जोड़ दिया जा रहा है. इंदौर प्रकरण भी इसका एक उदाहरण है, परन्तु यह बिडंबना ही कहा जायेगा कि लॉकडाऊन के कारण होने वाले भूख, अपमान जनित आत्महत्या और पुलिस की पिटाई के कारण मर जा रहे लोगों की संख्या अब कहीं दिखाई नहीं दे रही है. 10 दिन पहले यह आंकड़ा भी 100 की संख्या को पार कर चुका था, परन्तु अब तो वह गिनती भी नहीं छिपा लिया जा रहा है. यदि इसकी ठीक ठीक गणना की जाये तो यह आंकड़ा कोरोना की मौतों की तुलना में कई गुना अधिक हो जायेगा.

कोरोना के जांंच पर सवाल

कहा जाता है कि कोरोना जांच के लिए जिस किट का प्रयोग किया जाता है, उसकी विश्वसनीयता भी काफी हद तक संदिग्ध है. कुछ माह पूर्व पटना के एक मेडिकल कॉलेज व हॉस्पिटल के एक अधिकारी ने नाम न बताने के शर्त पर बताया कि लैबोरेटरी में कार्यरत सभी टेक्निशियन का खून जांंच कराया गया ताकि उसके स्वास्थ्य को जाना जा सके.

सभी टेक्निकल और उससे जुड़े गैर टेक्निकल कर्मचारियों के खून का सैम्पल ले कर जांच किया गया. उसमें से एक कर्मचारी का सैम्पल HIV पॉजिटिव आ गया. हड़कंप मच गया. दुबारा फिर उसका जांच किया गया, उसमें भी पॉजिटिव रिजल्ट आ गया. फिर तो उसकी बर्खास्तगी वगैरह की तैयारी होने लगी. लेकिन अधिकारी ने एक बार फिर HIV जांच की मुख्य मशीन में उसका खून का सैम्पल भेजा, जहां उसका रिपोर्ट निगेटिव आ गया. परन्तु, महत्वपूर्ण सवाल यह है कि प्रथम रिपोर्ट से लेकर अंतिम रिपोर्ट आने के बीच उसकी मनस्थिति की जिम्मेदार कौन लेगा ??

इसमें महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि HIV जांच की बहुत सारी व्यवस्थाएं है, उसके लिए पर्याप्त समय व प्रक्रियायें हैं, तब उसमें इतनी त्रुटि हो सकती है, परन्तु कोरोना के जांच किट भी अभी अपरिष्कृत व संदिग्ध है, ऐसे में उस जांच की पक्की विश्वसनीयता कैसे सिद्ध की जा सकती है ?

मौतों का आंकड़ा

बेहतर इलाज और अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं देने के मामले में भारत की स्थिति बेहद दयनीय है. मेडिकल जर्नल लैंसेट के अनुसार एक सौ सैंतीस देशों पर किए गए सर्वे के मुताबिक भारत में महज खराब इलाज के कारण हर वर्ष तकरीबन 24 लाख लोगों को मौत के मुंह में जाना पड़ रहा है. रिपोर्ट में दर्शाए गए आंकड़ों पर गौर करें तो दो साल पहले यानी 2016 में मरने वालों का आंकड़ा 16 लाख था, जो कि 2018 में बढ़ कर 24 लाख हो गया है. जिस प्रकार देश की स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह बदहाल होती जा रही है, यह आंकड़ा 2019 में बढ़कर 30 लाख की संख्या को भी पार कर लिया होगा.

यह भयावह आंकड़ा तो केवल खराब इलाज के कारण होने वाली मौतों का है. अन्य बीमारियों से हौने वाली मौंते तो और भी ज्यादा और भयावह है :

बीमारी                        मरने वाले की संख्या

ह्रदय संबंधी[1]              3 करोड़ प्रतिवर्ष

भूख जनित[2]               3000 बच्चे प्रतिदिन

आत्महत्या[3]               12936 बेरोजगार (वर्ष 2018)

13149 स्वरोजगार   “

10349 कृषि क्षेत्र से   “

सड़क दुर्घटना[4]           1,47,913 व्यक्ति (वर्ष 2017)

कैंसर[5]                         7,36,000 (वर्ष 2016)

टीबी[6]                        4,23,000 (वर्ष 2016)

ये उपरोक्त आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि इस देश में करोडों लोग इन बीमारियों से हर साल मर जाते हैं, परन्तु अब तक मात्र 300 के करीब मरे कोरोना से संदिग्ध लोगों के नाम पर पूरे देश को लॉकडाऊन में डाल देना, एक गहरे संदेह को जन्म देता है. कहना नहीं होगा लॉकडाऊन का यह तमाशा एक रिपोर्ट के अनुसार सितम्बर के मध्य तक चलने वाला है. बस देखना यह है कि मोदी के इस सनक की कीमत कितने लोग अपनी खून से चुकाते हैं.

सन्दर्भ :

[1] https://www.punjabkesari.in/national/news/heart-538735

[2] https://www.bhopalsamachar.com/2015/04/3000-ghi.html?m=1

[3] http://thewirehindi.com/108706/ncrb-data-suicide-rate-in-2018-unemployed-self-employed-farmers-housewives/

[4] https://hindi.news18.com/news/auto/how-unsafe-indian-roads-are-53-roads-accidents-and-17-deaths-yearly-deaths-data-2247604.html

[5] https://www.amarujala.com/lifestyle/fitness/world-cancer-day-special-cancer-rate-doubles-in-india

[6] https://aajtak.intoday.in/story/tb-patient-in-india-who-report-tpra-1-961501.html

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