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अविश्वसनीय चुनाव से विश्वसनीय सरकार कैसे बन सकती है ?

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अभी-अभी पांच राज्यों में सम्पन्न हुये चुनावी नतीजों ने अपनी असली रंगत दिखा दी है. एक तरफ निर्दोष युवाओं की हत्याओं केे खिलाफ खड़ी इरोम शर्मिला का 16 वर्षों का संघर्ष था, जो महज 90 वोट पर आकर सिमट गई तो वहीं दूसरी तरफ युवाओं को नशे की ओर धकेलने वाला नशे का व्यापारी मजीठिया और लफ्फाजों की सरकार भारतीय जनता पार्टी की विशालतम जीत.

लफ्फाजों की सरकार ने जो शुद्धरूप से अमीर अंबानी-अदानी की चरणवंदना में मशगुल है, वहीं आम जनता मंहगाई, बेरोजगारी, भूखमरी, किसानों और छात्रों की आत्महत्या, पलायन से जूझ रही है. दक्षिण भारत से तमिलनाडु के किसान अपने हाथों में आत्महत्या कर चुके किसानों के कब्र को खोदकर उनकी खोपड़ियां लेकर नंगे बदन और महिलाऐं महज पेटीकोट लपेटे दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास की ओर अपनी पीड़ा को लेकर जाने को मजबूर हैं.

हम भारत को महाशक्ति बनाने की सोचते हैं पर सामने आ रही हकीकत की ओर देखना भी नहीं चाहते. भारतीय जनता पार्टी ने तो अपनी विशाल जीत को दिखाते हुए एक मुश्त कह दिया है कि जनता उससे प्रसन्न है, कि जनता को कोई परेशानी नहीं है. क्या सचमुच जनता प्रसन्न है ? जनता को कोई परेशानी नहीं है ?

जानकार बताते हैं भारतीय जनता पार्टी अपनी जिस विशालतम जीत का हवाला देकर देश को सभी समस्याओं से मुक्त और खुद को एकमात्र मुक्तिदाता मान बैठे हैं, दरअसल वह पूरी तरीके से फर्जी है. कौन जानता है जब चुनावी प्रणाली ही जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता खो रही है तब कैसे वह सरकार अपनी विश्वसनीयता कायम रख सकती है ?

ROHIT SHARMA

BLOGGER INDIA ‘प्रतिभा एक डायरी’ का उद्देश्य मेहनतकश लोगों की मौजूदा राजनीतिक ताकतों को आत्मसात करना और उनके हितों के लिए प्रतिबद्ध एक नई ताकत पैदा करना है. यह आपकी अपनी आवाज है, इसलिए इसमें प्रकाशित किसी भी आलेख का उपयोग जनहित हेतु किसी भी भाषा, किसी भी रुप में आंशिक या सम्पूर्ण किया जा सकता है. किसी प्रकार की अनुमति लेने की जरूरत नहीं है.

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