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साम्प्रदायिकता की आग में अंधी होती सामाजिकता

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साम्प्रदायिकता की आग में अंधी होती सामाजिकता

प्रसिद्ध गांधीवादी कार्यकर्ता हिमांशु कुमार लिखते हैं कि  हमारे हैदराबाद के वकील दोस्त याकूब रेड्डी को वकीलों के एक धरने से पुलिस ने तीन अन्य वकीलों के साथ पकड़ा.
पुलिस ने चारों के नाम पूछे. तीनों को दो-चार डंडे मार कर छोड़ दिया, लेकिन याकूब को खूब अच्छे से ठोका. अंत में पुलिस ने याकूब को फर्जी मामले में फंसाने का निर्णय लिया. इंस्पेक्टर ने याकूब से नाम पूछा, फिर बाप का नाम पूछा. याकूब तो हिंदू ही है. बाप का हिंदू नाम सुन कर इंस्पेक्टर उछल पड़ा और बोला ‘तू हिंदू है क्या ?’ याकूब बोला ‘हाओ साब हिंदू हूंं.’, इंस्पेक्टर बोला ‘अबे तेरे नाम से धोखा हुआ न, तू तो हिंदू निकला यार. पहले बता देता तो काय को इतनी मार खाता ? जा घर जा.’

बहुत समय नहीं बीता है जब मॉबलिंचिंग में एक ऐसी ही हत्या हुई थी, जब नाम के आधे शब्द से लोगों को मुस्लिम होने का एहसास हुआ. फलतः उसकी पीट-पीट कर हत्या कर दी गई. बीबीसी हिन्दी की एक रिपोर्ट के अनुसार मृतक के परिजन बताते हैं कि ‘उनके बेटे का नाम साहिल था और इसी नाम की वजह से उसे मुसलमान समझकर मारा गया.’ साहिल के पिता सुनील सिंह कहते हैं, ‘उसका नाम साहिल था, हमें लगता है कि उसकी मौत की मुख्य वजह यही है. हमने सुना है कि हमलावर बार-बार उससे कह रहे थे कि ये पंडितों की गली है.’

साहिल की मां संगीता कहती हैं, ‘मेरे बेटे को मुसलमान समझकर मारा है. मेरा बेटा दूसरों की ग़लती की माफ़ी मांग रहा था. उस गली के लोगों ने हमें बताया है कि साहिल नाम की वजह से उसे मारा.’ क्या साहिल की मौत की वजह नफ़रत थी. संगीता कहती हैं, ‘किसी के बच्चे को मार दिया. इससे ज़्यादा नफ़रत क्या होगी. इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि वो हिंदू था या मुसलमान था.’

संगीता को दिलासा देने आईं गली नंबर पांच में रहने वाली एक महिला ने बताया कि ‘गली में यह अफ़वाह उड़ी थी कि एक मुसलमान लड़के को मार दिया है.’ वो कहती हैं, ‘मैं उसी गली में रहती हूं. हम जब सुबह उठे तो पता चला कि मुसलमान लड़का मरा है. बाद में पता चला कि वो तो हमारा ही बच्चा था.’ हलांकि बाद में यह आरोप कि साहिल सिंह को मुसलमान नाम होने की वजह से मारा गया है, विवादित हो गया, फिर भी एक सवालों की एक टीस तो रह ही जाती है, जहां मॉबलिंचिंग मुख्य तौर पर मुसलमान या दलित होने पर रह जाता है.

देश में लगातार मुसलमानों और दलितों पर हमले बढ़ रहे हैं. यह हमले न केवल केन्द्र और राज्य की भाजपा सरकार की मौन व खुली सहमति से हो रही है बल्कि इसमें भारतीय न्यायपालिका और प्रशासनिक तंत्र की भी खुली भागीदारी सुनिश्चित है अन्यथा मॉबलिंचिंग करने वाले न तो खुलेआम घूम पाते, न सम्मानित किये जाते और न ही उसके मारे जाने पर उसकी याद में ‘मंदिर’ ही बनाया जाता.

विदित हो कि उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में कथित रूप से गोहत्या को लेकर हुई हिंसा के दौरान मारे गए युवक सुमित के परिजनों ने उसकी प्रतिमा बनवाकर मंदिर का रूप दिया है. बुलंदशहर जिले के स्याना कोतवाली में 3 दिसंबर, 2018 को कथित गोहत्या को लेकर हिंसा भड़की थी, इस दौरान स्याना थाने के प्रभारी इंस्पेक्टर सुबोध कुमार की हत्या कर दी गई थी. वहीं हिंसा के दौरान गोली लगने से 20 साल के सुमित की मौत हो गई थी. हिंसा के मामले में पुलिस ने मृतक सुमित को भी आरोपी बनाया था, जिसका अब वहां मंदिर बना दिया गया है.

सुमित के घरवालों ने चिंगरावठी में उसकी मूर्ति लगाई है, जिस पर ‘गोरक्षक वीर शहीद चौ. सुमित दलाल धाम’ लिखा है. इस पर न तो सरकार की नजर जा रही है और न ही प्रशासन की. उल्टे इसे ‘शहीद’ का तगमा पहनाने की साजिश रची जा रही है.

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि आखिर मॉबलिंचिंग या यों कहे समाज को साम्प्रदायिकता और जातिवाद के कुंऐ में क्यों धकेला जा रहा है ? इसका जवाब देते हुए राजस्थान की तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे कहती है, ‘मॉबलिंचिंग की ये समस्या जनसंख्या विस्फोट के कारण से उत्पन्न हुई है. लोगों को रोजगार चाहिए. वे इस बात से निराश हैं कि वो रोजगार के लिए काबिल नहीं बन पा रहे हैं. एक निराशा का भाव है जो लोगों और समुदायों में फैल रहा है. ऐसा लोगों की स्थितियों के कारण उनके गुस्से के तौर पर बाहर आ रहा है.’ मॉबलिंचिंग की लगातार बढ़ती घटनाओं पर वसुंधरा राजे का यह बयान काफी हद तक सही प्रतीत होता है.

2014 में केन्द्र की सत्ता में बड़े-बड़े वादे लेकर आई भाजपा केवल औद्योगिक घरानों की कठपुतली मात्र बन कर रह गये हैं. हर साल दो करोड़ युवाओं को रोजगार देने की बात तो दूर, 6 साल के शासनकाल में करोड़ों की तादाद में रोजगार प्राप्त लोगों का रोजगार छीन लिया गया है. देश के 14 लाख करोड़ से अधिक की विशाल धनराशि को गायब कर दिया है. नोटबंदी और जीएसटी बिल के माध्यम से लाखों की तादाद में छोटे-छोटे उद्योग-धंधे ठप्प हो गये. व्यवसाय पूरी तरह घोर मंदी में चला गया. हजारों की संख्या में किसान आत्महत्या कर रहे हैं. सीमाओं और देश के अंदर सैनिकों की लगातार हत्यायें की जा रही है. देश में भूख से मरनेवालों की तादाद लगातार बढ़ रही है. ऐसे वक्त में निराश और धर्मांध लोगों के बीच इन तमाम समस्याओं का कारण मुसलमान और दलितों को बताया जा रहा है, ताकि युवाओं की विशाल तादाद के गुस्सों को एक विकृत दिशा देकर शासनव्यवस्था को बचाया जा सके. इस घृणित काम में देश की मुख्यधारा की मीडिया लगातार घृणा का प्रचार-प्रसार कर रही है.

भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति मार्कन्डेय काटजू जब कहते हैं कि 90 प्रतिशत भारतीय ‘बेवकूफ’ होते हैं, जिन्हें शरारती तत्वों द्वारा धर्म के नाम पर आसानी से गुमराह किया जा सकता है, तो धर्म के नाम पर पिछले सौ सालों से लगातार साम्प्रदायिक जहर को फैला रही संघ और भाजपा इस देश के अंदर धर्मांंध और मूूू्र्खों की विशाल और मजबूत फौज बना चुकी है, जिसका असर मुसलमानों और दलितों के साथ घृणा आधारित मॉबलिंचिंग और महिलाओं के खिलाफ बलात्कार व हिंसा के अलावा और क्या हो सकता है ?

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